महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 879, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशततमोऽध्यायः
नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुनः अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा
युधिष्ठिर उवाच
कथं वै स विपन्नश्च कथं वै पातितो भुवि ।
कथं चानिन्द्रतां प्राप्तस्तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! राजा नहुषपर कैसे विपत्ति आयी? वे कैसे पृथ्वीपर गिराये गये और किस तरह वे इन्द्रपदसे वंचित हो गये? इसे आप बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
एवं तयोः संवदतोः क्रियास्तस्य महात्मनः ।
सर्वा एव प्रवर्तन्ते या दिव्या याश्च मानुषीः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! जब महर्षि भृगु और अगस्त्य उपर्युक्त वार्तालाप कर रहे थे। उस समय महामना नहुषके घरमें दैवी और मानुषी सभी क्रियाएँ चल रही थीं ॥ २ ॥
तथैव दीपदानानि सर्वोपकरणानि वै ।
बलिकर्म च यच्चान्यदुत्सेकाश्च पृथग्विधाः ॥ ३ ॥
सर्वे तस्य समुत्पन्ना देवेन्द्रस्य महात्मनः ।
देवलोके नृलोके च सदाचारा बुधैः स्मृताः ॥ ४ ॥
दीपदान, समस्त उपकरणोंसहित अन्नदान, बलिकर्म एवं नाना प्रकारके स्नान-अभिषेक आदि पूर्ववत् चालू थे। देवलोक तथा मनुष्यलोकमें विद्वानोंने जो सदाचार बताये हैं, वे सब महामना देवराज नहुषके यहाँ होते रहते थे ॥
ते चेद् भवन्ति राजेन्द्र ऋद्ध्यन्ते गृहमेधिनः ।
धूपप्रदानैर्दीपैश्च नमस्कारैस्तथैव च ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! गृहस्थके घर यदि उन सदाचारोंका पालन हो तो वे गृहस्थ सर्वथा उन्नतिशील होते हैं, धूपदान, दीपदान तथा देवताओंको किये गये नमस्कार आदिसे भी गृहस्थोंकी ऋद्धि-सिद्धि बढ़ती है ॥ ५ ॥
यथा सिद्धस्य चान्नस्य ग्रहायाग्रं प्रदीयते ।
बलयश्च गृहोद्देशे अतः प्रीयन्ति देवताः ॥ ६ ॥
जैसे तैयार हुई रसोईमेंसे पहले अतिथिको भोजन दिया जाता है, उसी प्रकार घरमें देवताओंके लिये अन्नकी बलि दी जाती है। जिससे देवते प्रसन्न होते हैं ॥ ६ ॥