महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 880, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा च गृहिणस्तोषो भवेद् वै बलिकर्मणि । तथा शतगुणा प्रीतिर्देवतानां प्रजायते ॥ ७ ॥ बलिकर्म करनेपर गृहस्थको जितना संतोष होता है, उससे सौगुनी प्रीति देवताओंको होती है ॥ ७ ॥ एवं धूपप्रदानं च दीपदानं च साधवः । प्रयच्छन्ति नमस्कारैर्युक्तमात्मगुणावहम् ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अपने लिये लाभदायक समझकर देवताओंको नमस्कारसहित धूपदान और दीपदान करते हैं ॥ ८ ॥ स्नानेनाद्भिश्च यत् कर्म क्रियते वै विपश्चिता । नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीयन्ति देवताः ॥ ९ ॥ पितरश्च महाभागा ऋषयश्च तपोधनाः । गृह्याश्च देवताः सर्वाः प्रीयन्ते विधिणार्चिताः ॥ १० ॥ विद्वान् पुरुष जलसे स्नान करके देवता आदिके लिये नमस्कारपूर्वक जो तर्पण आदि कर्म करते हैं, उससे देवता, महाभाग पितर तथा तपोधन ऋषि संतुष्ट होते हैं तथा विधिपूर्वक पूजित होकर घरके सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ९-१० ॥ इत्येतां बुद्धिमास्थाय नहुषः स नरेश्वरः । सुरेन्द्रत्वं महत् प्राप्य कृतवानेतदद्भुतम् ॥ ११ ॥ इसी विचारधाराका आश्रय लेकर राजा नहुषने महान् देवेन्द्रपद पाकर यह अद्भुत पुण्यकर्म सदा चालू रखा था ॥ ११ ॥ कस्यचित् त्वथ कालस्य भाग्यक्षय उपस्थिते । सर्वमेतदवज्ञाय कृतवानिदमीदृशम् ॥ १२ ॥ किंतु कुछ कालके पश्चात् जब उनके सौभाग्य-नाशका अवसर उपस्थित हुआ, तब उन्होंने इन सब बातोंकी अवहेलना करके ऐसा पापकर्म आरम्भ कर दिया ॥ १२ ॥ ततः स परिहीणोऽभूत् सुरेन्द्रो बलदर्पतः । धूपदीपोदकविधिं न यथावच्चकार ह ॥ १३ ॥ बलके घमण्डमें आकर देवराज नहुष उन सत्कर्मोंसे भ्रष्ट हो गये। उन्होंने धूपदान, दीपदान और जलदानकी विधिका यथावत्रूपसे पालन करना छोड़ दिया ॥ १३ ॥ ततोऽस्य यज्ञविषयो रक्षोभिः पर्यबध्यत । अथागस्त्यमृषिश्रेष्ठं वाहनायाजुहाव ह ॥ १४ ॥ द्रुतं सरस्वतीकूलात् स्मयन्निव महाबलः । ततो भृगुर्महातेजा मैत्रावरुणिमब्रवीत् ॥ १५ ॥ उसका फल यह हुआ कि उनके यज्ञस्थलमें राक्षसोंने डेरा डाल दिया। उन्हींसे प्रभावित होकर महाबली नहुषने मुसकराते हुए-से मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको सरस्वतीतटसे तुरंत अपना