महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
यथा च गृहिणस्तोषो भवेद् वै बलिकर्मणि । तथा शतगुणा प्रीतिर्देवतानां प्रजायते ॥ ७ ॥ बलिकर्म करनेपर गृहस्थको जितना संतोष होता है, उससे सौगुनी प्रीति देवताओंको होती है ॥ ७ ॥ एवं धूपप्रदानं च दीपदानं च साधवः । प्रयच्छन्ति नमस्कारैर्युक्तमात्मगुणावहम् ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अपने लिये लाभदायक समझकर देवताओंको नमस्कारसहित धूपदान और दीपदान करते हैं ॥ ८ ॥ स्नानेनाद्भिश्च यत् कर्म क्रियते वै विपश्चिता । नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीयन्ति देवताः ॥ ९ ॥ पितरश्च महाभागा ऋषयश्च तपोधनाः । गृह्याश्च देवताः सर्वाः प्रीयन्ते विधिणार्चिताः ॥ १० ॥ विद्वान् पुरुष जलसे स्नान करके देवता आदिके लिये नमस्कारपूर्वक जो तर्पण आदि कर्म करते हैं, उससे देवता, महाभाग पितर तथा तपोधन ऋषि संतुष्ट होते हैं तथा विधिपूर्वक पूजित होकर घरके सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ९-१० ॥ इत्येतां बुद्धिमास्थाय नहुषः स नरेश्वरः । सुरेन्द्रत्वं महत् प्राप्य कृतवानेतदद्भुतम् ॥ ११ ॥ इसी विचारधाराका आश्रय लेकर राजा नहुषने महान् देवेन्द्रपद पाकर यह अद्भुत पुण्यकर्म सदा चालू रखा था ॥ ११ ॥ कस्यचित् त्वथ कालस्य भाग्यक्षय उपस्थिते । सर्वमेतदवज्ञाय कृतवानिदमीदृशम् ॥ १२ ॥ किंतु कुछ कालके पश्चात् जब उनके सौभाग्य-नाशका अवसर उपस्थित हुआ, तब उन्होंने इन सब बातोंकी अवहेलना करके ऐसा पापकर्म आरम्भ कर दिया ॥ १२ ॥ ततः स परिहीणोऽभूत् सुरेन्द्रो बलदर्पतः । धूपदीपोदकविधिं न यथावच्चकार ह ॥ १३ ॥ बलके घमण्डमें आकर देवराज नहुष उन सत्कर्मोंसे भ्रष्ट हो गये। उन्होंने धूपदान, दीपदान और जलदानकी विधिका यथावत्रूपसे पालन करना छोड़ दिया ॥ १३ ॥ ततोऽस्य यज्ञविषयो रक्षोभिः पर्यबध्यत । अथागस्त्यमृषिश्रेष्ठं वाहनायाजुहाव ह ॥ १४ ॥ द्रुतं सरस्वतीकूलात् स्मयन्निव महाबलः । ततो भृगुर्महातेजा मैत्रावरुणिमब्रवीत् ॥ १५ ॥ उसका फल यह हुआ कि उनके यज्ञस्थलमें राक्षसोंने डेरा डाल दिया। उन्हींसे प्रभावित होकर महाबली नहुषने मुसकराते हुए-से मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको सरस्वतीतटसे तुरंत अपना
रथ ढोनेके लिये बुलाया। तब महातेजस्वी भृगुने मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजीसे कहा — ॥ १४-१५ ॥
निमीलय स्वनयने जटां यावद् विशामि ते ।
स्थाणुभूतस्य तस्याथ जटां प्राविशदच्युतः ॥ १६ ॥
भृगुः स सुमहातेजाः पातनाय नृपस्य च ।
ततः स देवराट् प्राप्तस्तमृषिं वाहनाय वै ॥ १७ ॥
‘मुने! आप अपनी आँखें मूँद लें, मैं आपकी जटामें प्रवेश करता हूँ।' महर्षि अगस्त्य आँखें मूँदकर काष्ठकी तरह स्थिर हो गये। अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले महातेजस्वी भृगुने राजाको स्वर्गसे नीचे गिरानेके लिये अगस्त्यजीकी जटामें प्रवेश किया। इतनेहीमें देवराज नहुष ऋषिको अपना वाहन बनानेके लिये उनके पास पहुँचे ॥ १६-१७ ॥
ततोऽगस्त्यः सुरपतिं वाक्यमाह विशाम्पते ।
योजयस्वेति मां क्षिप्रं कं च देशं वहामि ते ॥ १८ ॥
यत्र वक्ष्यसि तत्र त्वां नयिष्यामि सुराधिप ।
इत्युक्तो नहुषस्तेन योजयामास तं मुनिम् ॥ १९ ॥
प्रजानाथ! तब अगस्त्यने देवराजसे कहा—‘राजन्! मुझे शीघ्र रथमें जोतिये और बताइये मैं आपको किस स्थानपर ले चलूँ। देवेश्वर! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपको ले चलूँगा।' उनके ऐसा कहनेपर नहुषने मुनिको रथमें जोत दिया ॥ १८-१९ ॥
भृगुस्तस्य जटान्तस्थो बभूव हृषितो भृशम् ।
न चापि दर्शनं तस्य चकार स भृगुस्तदा ॥ २० ॥
यह देख उनकी जटाके भीतर बैठे हुए भृगु बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भृगुने नहुषका साक्षात्कार नहीं किया ॥ २० ॥
वरदानप्रभावज्ञो नहुषस्य महात्मनः ।
न चुकोप तदागस्त्यो युक्तोऽपि नहुषेण वै ॥ २१ ॥
अगस्त्यमुनि महामना नहुषको मिले हुए वरदानका प्रभाव जानते थे, इसलिये उसके द्वारा रथमें जोते जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए ॥ २१ ॥
तं तु राजा प्रतोदेन चोदयामास भारत ।
न चुकोप स धर्मात्मा ततः पादेन देवराट् ॥ २२ ॥
अगस्त्यस्य तदा क्रुद्धो वामेनाभ्यहनच्छिरः ।
भारत! राजा नहुषने चाबुक मारकर हाँकना आरम्भ किया तो भी उन धर्मात्मा मुनिको क्रोध नहीं आया। तब कुपित हुए देवराजने महात्मा अगस्त्यके सिरपर बायें पैरसे प्रहार किया ॥ २२ १/२ ॥
तस्मिन् शिरस्यभिहते स जटान्तर्गतो भृगुः ॥ २३ ॥
शशाप बलवत्क्रुद्धो नहुषं पापचेतसम् ।
यस्मात् पदाऽऽहतः क्रोधाच्छिरसीमं महामुनिम् ॥ २४ ॥ तस्मादाशु महीं गच्छ सर्पो भूत्वा सुदुर्मते । उनके मस्तकपर चोट होते ही जटाके भीतर बैठे हुए महर्षि भृगु अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने पापात्मा नहुषको इस प्रकार शाप दिया—‘ओ दुर्मते! तुमने इन महामुनिके मस्तकमें क्रोधपूर्वक लात मारी है, इसलिये तू शीघ्र ही सर्प होकर पृथ्वीपर चला जा’ ॥ इत्युक्तः स तदा तेन सर्पो भूत्वा पपात ह ॥ २५ ॥ अदृष्टेनाथ भृगुणा भूतले भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! भृगु नहुषको दिखायी नहीं दे रहे थे। उनके इस प्रकार शाप देनेपर नहुष सर्प होकर पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २५ १/२ ॥ भृगुं हि यदि सोऽद्रक्ष्यन्नहुषः पृथिवीपते ॥ २६ ॥ न च शक्तोऽभविष्यद् वै पातने तस्य तेजसा । पृथ्वीनाथ! यदि नहुष भृगुको देख लेते तो उनके तेजसे प्रतिहत होकर वे उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरानेमें समर्थ न होते ॥ २६ १/२ ॥ स तु तैस्तैः प्रदानैश्च तपोभिर्नियमैस्तथा ॥ २७ ॥ पतितोऽपि महाराज भूतले स्मृतिमानभूत् । प्रसादयामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति ॥ २८ ॥ महाराज! नहुषने जो भिन्न-भिन्न प्रकारके दान किये थे, तप और नियमोंका अनुष्ठान किया था, उनके प्रभावसे वे पृथ्वीपर गिरकर भी पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वंचित नहीं हुए। उन्होंने भृगुको प्रसन्न करते हुए कहा—‘प्रभो! मुझको मिले हुए शापका अंत होना चाहिये’ ॥ ततोऽगस्त्यः कृपाविष्टः प्रासादयत तं भृगुम् । शापान्तार्थं महाराज स च प्रादात् कृपान्वितः ॥ २९ ॥ महाराज! तब अगस्त्यने दयासे द्रवित होकर उनके शापका अंत करनेके लिये भृगुको प्रसन्न किया। तब कृपायुक्त हुए भृगुने उस शापका अंत इस प्रकार निश्चित किया ॥ २९ ॥
भृगुरुवाच
राजा युधिष्ठिरो नाम भविष्यति कुलोद्वहः । स त्वां मोक्षयिता शापादित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ ३० ॥ भृगुने कहा—राजन्! तुम्हारे कुलमें सर्वश्रेष्ठ युधिष्ठिर नामसे प्रसिद्ध एक राजा होंगे, जो तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे—ऐसा कहकर भृगुजी अंतर्धान हो गये ॥ ३० ॥ अगस्त्योऽपि महातेजाः कृत्वा कार्यं शतक्रतोः । स्वमाश्रमपदं प्रायात् पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ ३१ ॥
महातेजस्वी अगस्त्य भी शतक्रतु इन्द्रका कार्य सिद्ध करके द्विजातियोंसे पूजित होकर अपने आश्रमको चले गये ।। ३१ ।। नहुषोऽपि त्वया राजंस्तस्माच्छापात् समुद्धृतः । जगाम ब्रह्मभवनं पश्यतस्ते जनाधिप ।। ३२ ।। राजन्! तुमने भी नहुषका उस शापसे उद्धार कर दिया। नरेश्वर! वे तुम्हारे देखते-देखते ब्रह्मलोकको चले गये ।। ३२ ।। तदा स पातयित्वा तं नहुषं भूतले भृगुः । जगाम ब्रह्मभवनं ब्रह्मणे च न्यवेदयत् ।। ३३ ।। भृगु उस समय नहुषको पृथ्वीपर गिराकर ब्रह्माजीके धाममें गये और उनसे उन्होंने यह सब समाचार निवेदन किया ।। ३३ ।। ततः शक्रं समानाय्य देवानाह पितामहः । वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान् ।। ३४ ।। स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गतः । तब पितामह ब्रह्माने इन्द्र तथा अन्य देवताओंको बुलवाकर उनसे कहा—'देवगण! मेरे वरदानसे नहुषने राज्य प्राप्त किया था। परंतु कुपित हुए अगस्त्यने उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरा दिया। अब वे पृथ्वीपर चले गये ।। न च शक्यं विना राज्ञा सुरा वर्तयितुं क्वचित् ।। ३५ ।। तस्मादयं पुनः शक्रो देवराज्येऽभिषिच्यताम् । 'देवताओ! बिना राजाके कहीं भी रहना असंभव है। अतः अपने पूर्व इन्द्रको पुनः देवराजके पदपर अभिषिक्त करो' ।। ३५ १/२ ।। एवं सम्भाष्यमाणं तु देवाः पार्थ पितामहम् ।। ३६ ।। एवमस्त्विति संहृष्टाः प्रत्यूचुस्तं नराधिप । कुन्तीनन्दन! नरेश्वर! पितामह ब्रह्माका यह कथन सुनकर सब देवता हर्षसे खिल उठे और बोले—'भगवन्! ऐसा ही हो' ।। ३६ १/२ ।। सोऽभिषिक्तो भगवता देवराज्ये च वासवः ।। ३७ ।। ब्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्वं व्यरोचत । राजसिंह! भगवान् ब्रह्माके द्वारा देवराजके पदपर अभिषिक्त हो शतक्रतु इन्द्र फिर पूर्ववत् शोभा पाने लगे ।। ३७ १/२ ।। एवमेतत् पुरावृत्तं नहुषस्य व्यतिक्रमात् ।। ३८ ।। स च तैरेव संसिद्धो नहुषः कर्मभिः पुनः । इस प्रकार पूर्वकालमें नहुषके अपराधसे ऐसी घटना घटी कि वे नहुष बार-बार दीपदान आदि पुण्यकर्मोंसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे ।। ३८ १/२ ।। तस्माद् दीपाः प्रदातव्याः सायं वै गृहमेधिभिः ।। ३९ ।।
दिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपस्य दायकः ।
इसलिये गृहस्थोंको सायंकालमें अवश्य दीपदान करने चाहिये। दीपदान करनेवाला पुरुष परलोकमें दिव्य नेत्र प्राप्त करता है ।। ३९½ ।।
पूर्णचन्द्रप्रतीकाशा दीपदाश्च भवन्त्युत ।। ४० ।।
यावदक्षिनिमेषाणि ज्वलन्ते तावतीः समाः ।
रूपवान् बलवांश्चापि नरो भवति दीपaction... दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपदः ।। ४१ ।।
दीपदान करनेवाले मनुष्य निश्चय ही पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् होते हैं। जितने पलकोंके गिरनेतक दीपक जलते हैं, उतने वर्षोंतक दीपदान करनेवाला मनुष्य रूपवान् और बलवान् होता है ।। ४०-४१ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्यभृगुसंवादो नाम शततमोऽध्यायः ।। १०० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भृगुका संवादनामक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।
ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्ष
एकाधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति
युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणस्वानि ये मंदा हरन्ति भरतर्षभ ।
नृशंसकारिणो मूढाः क्व ते गच्छन्ति मानवाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जो मूर्ख और मंदबुद्धि मानव क्रूरतापूर्ण कर्ममें संलग्न रहकर ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करते हैं, वे किस लोकमें जाते हैं? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
(पातकानां परं ह्येतद् ब्रह्मस्वहरणं बलात् ।
सान्वयास्ते विनश्यन्ति चण्डालाः प्रेत्य चेह च ॥)
भीष्मजीने कहा— राजन्! ब्राह्मणोंके धनका बलपूर्वक अपहरण—यह सबसे बड़ा पातक है। ब्राह्मणोंका धन लूटनेवाले चाण्डाल-स्वभावयुक्त मनुष्य अपने कुल-परिवारसहित नष्ट हो जाते हैं ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
चाण्डालस्य च संवादं क्षत्रबंधोश्च भारत ॥ २ ॥
भारत! इस विषयमें जानकार मनुष्य एक चाण्डाल और क्षत्रियबंधुका संवादविषयक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
राजन्य उवाच
वृद्धरूपोऽसि चाण्डाल बालवच्च विचेष्टसे ।
श्वखराणां रजःसेवी कस्मादुद्विजसे गवाम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियने पूछा— चाण्डाल! तू बूढ़ा हो गया है तो भी बालकों-जैसी चेष्टा करता है। कुत्तों और गधोंकी धूलिका सेवन करनेवाला होकर भी तू इन गौओंकी धूलिसे क्यों इतना उद्विग्न हो रहा है ॥ ३ ॥
साधुभिर्गर्हितं कर्म चाण्डालस्य विधीयते ।
कस्माद् गोरजसा ध्वस्तमपां कुण्डे निषिञ्चसि ॥ ४ ॥
चाण्डालके लिये विहित कर्मकी श्रेष्ठ पुरुष निंदा करते हैं। तू गोधूलिसे ध्वस्त हुए अपने शरीरको क्यों जलके कुण्डमें डालकर धो रहा है? ॥ ४ ॥
चाण्डाल उवाच
ब्राह्मणस्य गवां राजन् ह्रियतीनां रजः पुरा । सोममुध्वंसयामास तं सोमं येऽपिबन् द्विजाः ॥ ५ ॥ दीक्षितश्च स राजापि क्षिप्रं नरकमाविशत् । सह तैर्याजकैः सर्वैर्ब्रह्मस्वमुपजीव्य तत् ॥ ६ ॥ **चाण्डालने कहा—**राजन्! पहलेकी बात है—एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था। जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया। उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे। उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए ॥ ५-६ ॥
येऽपि तत्रापिबन् क्षीरं घृतं दधि च मानवाः । ब्राह्मणाः सहराजन्याः सर्वे नरकमाविशन् ॥ ७ ॥ जहाँ वे गौएँ हरकर लायी गयी थीं, वहाँ जिन मनुष्योंने उनके दूध, दही और घीका उपभोग किया, वे सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि नरकमें पड़े ॥ ७ ॥
जघ्नुस्ताः पयसा पुत्रांस्तथा पौत्रान् विधुन्वतीः । पशूनवेक्षमाणाश्च साधुवृत्तेन दम्पती ॥ ८ ॥ वे अपहृत हुई गौएँ जब दूसरे पशुओंको देखतीं और अपने स्वामी तथा बछड़ोंको नहीं देखती थीं, तब पीड़ासे अपने शरीरको कँपाने लगती थीं। उन दिनों सद्भावसे ही दूध देकर उन्होंने अपहरणकारी पति-पत्नीको तथा उनके पुत्रों और पौत्रोंको भी नष्ट कर दिया ॥ ८ ॥
अहं तत्रावसं राजन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । तासां मे रजसा ध्वस्तं भैक्षमासीन्नराधिप ॥ ९ ॥ राजन्! मैं भी उसी गाँवमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक जितेन्द्रियभावसे निवास करता था। नरेश्वर! एक दिन उन्हीं गौओंके दूध एवं धूलके कणसे मेरा भिक्षान्न भी दूषित हो गया ॥ ९ ॥
चाण्डालोऽहं ततो राजन् भुक्त्वा तदभवं नृप । ब्रह्मस्वहारी च नृपः सोऽप्रतिष्ठां गतिं ययौ ॥ १० ॥ महाराज! उस भिक्षान्नको खाकर मैं चाण्डाल हो गया और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले वे राजा भी नरकगामी हो गये ॥ १० ॥
तस्माद्धरेन्न विप्रस्वं कदाचिदपि किंचन । ब्रह्मस्वं रजसा ध्वस्तं भुक्त्वा मां पश्य यादृशम् ॥ ११ ॥
इसलिये कभी किंचिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण न करे। ब्राह्मणके धूल-धूसरित दुग्धरूप धनको खाकर मेरी जो दशा हुई है, उसे आप प्रत्यक्ष देख लें ।। ११ ।। तस्मात् सोमोऽप्यविक्रेयः पुरुषेण विपश्चिता । विक्रयं त्विह सोमस्य गर्हयन्ति मनीषिणः ।। १२ ।। इसीलिये विद्वान् पुरुषको सोमरसका विक्रय भी नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस जगत्में सोमरसके विक्रयकी बड़ी निंदा करते हैं ।। १२ ।। ये चैनं क्रीणते तात ये च विक्रीणते जनाः । ते तु वैवस्वतं प्राप्य रौरवं यान्ति सर्वशः ।। १३ ।। तात! जो लोग सोमरसको खरीदते हैं और जो लोग उसे बेचते हैं, वे सभी यमलोकमें जाकर रौरव नरकमें पड़ते हैं ।। १३ ।। सोमं तु रजसा ध्वस्तं विक्रीणन् विधिपूर्वकम् । श्रोत्रियो वार्धुषी भूत्वा न चिरं स विनश्यति ।। १४ ।। वेदवेत्ता ब्राह्मण यदि गौओंके चरणोंकी धूलि और दूधसे दूषित सोमको विधिपूर्वक बेचता है अथवा ब्याजपर रुपये चलाता है तो वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है ।। १४ ।। नरकं त्रिंशतं प्राप्य स्वविष्ठामुपजीवति । श्वचर्यामभिमानं च सखिदारे च विप्लवम् ।। १५ ।। तुलया धारयन् धर्ममभिमान्यतिरिच्यते । वह तीस नरकोंमें पड़कर अंतमें अपनी ही विष्ठापर जीनेवाला कीड़ा होता है। कुत्तोंको पालना, अभिमान तथा मित्रकी स्त्रीसे व्यभिचार—इन तीनों पापोंको तराजूपर रखकर यदि धर्मतः तौला जाय तो अभिमानका ही पलड़ा भारी होगा ।। १५ १/२ ।। श्वानं वै पापिनं पश्य विवर्णं हरिणं कृशम् ।। १६ ।। अभिमानेन भूतानामिमां गतिमुपागतम् । आप मेरे इस पापी कुत्तेको देखिये, यह कान्तिहीन, सफेद और दुर्बल हो गया है। यह पहले मनुष्य था। परंतु समस्त प्राणियोंके प्रति अभिमान रखनेके कारण इस दुर्गतिको प्राप्त हुआ है ।। १६ १/२ ।। अहं वै विपुले तात कुले धनसमन्विते ।। १७ ।। अन्यस्मिञ्जन्मनि विभो ज्ञानविज्ञानपारगः । अभवं तत्र जानानो ह्येतान् दोषान् मदात् सदा ।। १८ ।। संरब्ध एव भूतानां पृष्ठमांसमभक्षयम् । सोऽहं तेन च वृत्तेन भोजनेन च तेन वै ।। १९ ।। इमामवस्थां सम्प्राप्तः पश्य कालस्य पर्ययम् । तात! प्रभो! मैं भी दूसरे जन्ममें धनसम्पन्न महान् कुलमें उत्पन्न हुआ था। ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत था। इन सब दोषोंको जानता था तो भी अभिमानवश सदा सब
प्राणियोंपर क्रोध करता और पशुओंके पृष्ठका मांस खाता था; उसी दुराचार और अभक्ष्य-भक्षणसे मैं इस दुरवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। कालके इस उलट-फेरको देखिये।। आदीप्तमिव चैलान्तं भ्रमरैरिव चार्दितम् ।। २० ।। धावमानं सुसंरब्धं पश्य मां रजसान्वितम् । मेरी दशा ऐसी हो रही है, मानो मेरे कपड़ोंके छोरमें आग लग गयी हो अथवा तीखे मुखवाले भ्रमरोंने मुझे डंक मार-मारकर पीड़ित कर दिया हो। मैं रजोगुणसे युक्त हो अत्यंत रोष और आवेशमें भरकर चारों ओर दौड़ रहा हूँ। मेरी दशा तो देखिये ।। २० १/२ ।। स्वाध्यायैस्तु महत्पापं हरन्ति गृहमेधिनः ।। २१ ।। दानैः पृथग्विधैश्चापि यथा प्राहुर्मनीषिणः । गृहस्थ मनुष्य वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा तथा नाना प्रकारके दानोंसे अपने महान् पापको दूर कर देते हैं। जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है ।। २१ १/२ ।। तथा पापकृतं विप्रमाश्रमस्थं महीपते ।। २२ ।। सर्वसंगविनिर्मुक्तं छन्दांस्युत्तारयन्त्युत । पृथ्वीनाथ! आश्रममें रहकर सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्ता हो वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मणको यदि वह पापाचारी हो तो भी उसके द्वारा पढ़े जानेवाले वेद उसका उद्धार कर देते हैं ।। २२ १/२ ।। अहं हि पापयोन्यां वै प्रसूतः क्षत्रियर्षभ । निश्चयं नाधिगच्छामि कथं मुच्येयमित्युत ।। २३ ।। क्षत्रियशिरोमणे! मैं पापयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे यह निश्चय नहीं हो पाता कि मैं किस उपायसे मुक्त हो सकूँगा? ।। २३ ।। जातिस्मरत्वं च मम केनचित् पूर्वकर्मणा । शुभेन येन मोक्षं वै प्राप्तुमिच्छाम्यहं नृप ।। २४ ।। नरेश्वर! पहलेके किसी शुभ कर्मके प्रभावसे मुझे पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है, जिससे मैं मोक्ष पानेकी इच्छा करता हूँ ।। २४ ।। त्वमिमं सम्प्रपन्नाय संशयं ब्रूहि पृच्छते । चाण्डालत्वात् कथमहं मुच्येयमिति सत्तम ।। २५ ।। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! मैं आपकी शरणमें आकर अपना यह संशय पूछ रहा हूँ। आप मुझे इसका समाधान बताइये। मैं चाण्डाल-योनिसे किस प्रकार मुक्त हो सकता हूँ? ।। २५ ।।
राजन्य उवाच
चाण्डाल प्रतिजानीहि येन मोक्षमवाप्स्यसि । ब्राह्मणार्थे त्यजन् प्राणान् गतिमिष्टामवाप्स्यसि ।। २६ ।।
**क्षत्रियने कहा—**चाण्डाल! तू उस उपायको समझ ले, जिससे तुझे मोक्ष प्राप्त होगा। यदि तू ब्राह्मणकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करे तो तुझे अभीष्ट गति प्राप्त होगी ॥ २६ ॥
दत्त्वा शरीरं क्रव्यादाभ्यो रणाग्नौ द्विजहेतुकम् ।
हुत्वा प्राणान् प्रमोक्षस्ते नान्यथा मोक्षमर्हसि ॥ २७ ॥
यदि ब्राह्मणकी रक्षाके लिये तू अपना यह शरीर समराग्निमें होमकर कच्चा मांस खानेवाले जीव-जन्तुओंको बाँट दे तो प्राणोंकी आहुति देनेपर तेरा छुटकारा हो सकता है, अन्यथा तू मोक्ष नहीं पा सकेगा ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स तदा तेन ब्रह्मस्वार्थे परंतप ।
हुत्वा रणमुखे प्राणान् गतिमिष्टामवाप ह ॥ २८ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**परंतप! क्षत्रियके ऐसा कहनेपर उस चाण्डालने ब्राह्मणके धनकी रक्षाके लिये युद्धके मुहानेपर अपने प्राणोंकी आहुति दे अभीष्ट गति प्राप्त कर ली ॥ २८ ॥
तस्माद् रक्ष्यं त्वया पुत्र ब्रह्मस्वं भरतर्षभ ।
यदीच्छसि महाबाहो शाश्वतीं गतिमात्मनः ॥ २९ ॥
बेटा! भरतश्रेष्ठ! महाबाहो! यदि तुम सनातन गति पाना चाहते हो तो तुम्हें ब्राह्मणके धनकी पूरी रक्षा करनी चाहिये ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि राजन्यचाण्डालसंवादो नामैकोत्तरशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवादविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं)
भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख
द्व्यधिकशततमोऽध्यायः
भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख
युधिष्ठिर उवाच
एके लोकाः सुकृतिनः सर्वे त्वाहो पितामह ।
तत्र तत्रापि भिन्नास्ते तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! (मृत्युके पश्चात्) सभी पुण्यात्मा एक ही तरहके लोकमें जाते हैं या वहाँ उन्हें प्राप्त होनेवाले लोकोंमें भिन्नता होती है? दादाजी! यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
कर्मभिः पार्थ नानात्वं लोकानां यान्ति मानवाः ।
पुण्यान् पुण्यकृतो यान्ति पापान् पापकृतो नराः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**कुन्तीनन्दन! मनुष्य अपने कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें जाते हैं। पुण्यकर्म करनेवाले पुण्यलोकोंमें जाते हैं और पापाचारी मनुष्य पापमय लोकोंमें ॥ २ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गौतमस्य मुनेस्तात संवादं वासवस्य च ॥ ३ ॥
तात! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और गौतम मुनिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥
ब्राह्मणो गौतमः कश्चिन्मृदुर्दान्तो जितेन्द्रियः ।
महावने हस्तिशिशुं परिद्यूनममातृकम् ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा जीवयामास सानुक्रोशो धृतव्रतः ।
स तु दीर्घेण कालेन बभूवातिबलो महान् ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें गौतम नामवाले एक ब्राह्मण थे, जिनका स्वभाव बड़ा कोमल था। वे मनको वशमें रखनेवाले और जितेन्द्रिय थे। उन व्रतधारी मुनिने विशाल वनमें एक हाथीके बच्चेको अपने माताके बिना बड़ा कष्ट पाते देखकर उसे कृपापूर्वक जिलाया। दीर्घकालके पश्चात् वह हाथी बढ़कर अत्यंत बलवान् हो गया ॥
तं प्रभिन्नं महानागं प्रस्रुतं पर्वतोपमम् ।
धृतराष्ट्रस्य रूपेण शक्रो जग्राह हस्तिनम् ॥ ६ ॥
उस महानागके कुम्भस्थलसे फूटकर मदकी धारा बहने लगी। मानो पर्वतसे झरना झर रहा हो। एक दिन इन्द्रने राजा धृतराष्ट्रके रूपमें आकर उस हाथीको अपने अधिकारमें कर लिया ।। ६ ।।
ह्रियमाणं तु तं दृष्ट्वा गौतमः संशितव्रतः । अभ्यभाषत राजानं धृतराष्ट्रं महातपाः ।। ७ ।।
कठोर व्रतका पालन करनेवाले महातपस्वी गौतमने उस हाथीका अपहरण होता देख राजा धृतराष्ट्रसे कहा— ।।
मा मेऽहार्षीर्हस्तिनं पुत्रमेनं दुःखात् पुष्टं धृतराष्ट्राकृतज्ञ । मैत्रं सतां सप्तपदं वदन्ति मित्रद्रोहो मैव राजन् स्पृशेत् त्वाम् ।। ८ ।।
'कृतज्ञताशून्य राजा धृतराष्ट्र! तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ। यह मेरा पुत्र है। मैंने बड़े दुःखसे इसका पालन-पोषण किया है। सत्पुरुषोंमें सात पग साथ चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है। इस नाते हम और तुम दोनों मित्र हैं। मेरे इस हाथीको ले जानेसे तुम्हें मित्रद्रोहका पाप लगेगा। तुम्हें यह पाप न लगे, ऐसी चेष्टा करो ।। ८ ।।
इध्मोदकप्रदातारं शून्यपालं ममाश्रमे । विनीतमाचार्यकुले सुयुक्तं गुरुकर्मणि ।। ९ ।। शिष्टं दान्तं कृतज्ञं च प्रियं च सततं मम । न मे विक्रोशतो राजन् हर्तुमर्हसि कुञ्जरम् ।। १० ।।
'राजन्! यह मुझे समिधा और जल लाकर देता है। मेरे आश्रममें जब कोई नहीं रहता है, तब यही रक्षा करता है। आचार्यकुलमें रहकर इसने विनयकी शिक्षा ग्रहण की है। गुरुसेवाके कार्यमें यह पूर्णरूपसे संलग्न रहता है। यह शिष्ट, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ तथा मुझे सदा ही प्रिय है। मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहता हूँ, तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ' ।। ९-१० ।।
धृतराष्ट्र उवाच
गवां सहस्रं भवते ददानि दासीशतं निष्कशतानि पञ्च । अन्यच्च वित्तं विविधं महर्षे किं ब्राह्मणस्येह गजेन कृत्यम् ।। ११ ।।
धृतराष्ट्रने कहा—महर्षे! मैं आपको एक हजार गौएँ दूँगा। सौ दासियाँ और पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ प्रदान करूँगा और भी नाना प्रकारका धन समर्पित करूँगा। ब्राह्मणके यहाँ हाथीका क्या काम है? ।। ११ ।।
गौतम उवाच
तवैव गावो हि भवन्तु राजन् दास्यः सनिष्का विविधं च रत्नम् । अन्यच्च वित्तं विविधं नरेन्द्र किं ब्राह्मणस्येह धनेन कृत्यम् ॥ १२ ॥ **गौतम बोले—**राजन्! वे गौएँ, दासियाँ, स्वर्णमुद्राएँ, नाना प्रकारके रत्न तथा और भी तरह-तरहके धन तुम्हारे ही पास रहें। नरेन्द्र! ब्राह्मणके यहाँ धनका क्या काम है? ॥ १२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ब्राह्मणानां हस्तिभिर्नास्ति कृत्यं राजन्यानां नागकुलानि विप्र । स्वं वाहनं नयतो नास्त्यधर्मो नागश्रेष्ठं गौतमास्मान्निवर्त ॥ १३ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**विप्रवर गौतम! ब्राह्मणोंको हाथियोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। हाथियोंके समूह तो राजाओंके ही काम आते हैं। हाथी मेरा वाहन है, अतः इस श्रेष्ठ हाथीको ले जानेमें कोई अधर्म नहीं है। आप इसकी ओरसे अपनी तृष्णा हटा लीजिये ॥ १३ ॥
गौतम उवाच
यत्र प्रेतो नंदति पुण्यकर्मा यत्र प्रेतः शोचते पापकर्मा । वैवस्वतस्य सदने महात्मं- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ १४ ॥ **गौतमने कहा—**महात्मन्! जहाँ जाकर पुण्यकर्मा पुरुष आनंदित होता है और जहाँ जाकर पापकर्मा मनुष्य शोकमें डूब जाता है, उस यमराजके लोकमें मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ये निष्क्रिया नास्तिकाश्रद्दधानाः पापात्मान इन्द्रियार्थे निविष्टाः । यमस्य ते यातनां प्राप्नुवन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ १५ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो निष्क्रिय, नास्तिक, श्रद्धाहीन, पापात्मा और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त हैं, वे ही यमयातनाको प्राप्त होते हैं; परंतु राजा धृतराष्ट्रको वहाँ नहीं जाना
है ।। १५ ।।
गौतम उवाच
वैवस्वती संयमनी जनानां
यत्रानृतं नोच्यते यत्र सत्यम् ।
यत्राबला बलिनं यातयन्ति
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ।। १६ ।।
गौतम बोले— जहाँ कोई भी झूठ नहीं बोलता, जहाँ सदा सत्य ही बोला जाता है और जहाँ निर्बल मनुष्य भी बलवान्से अपने प्रति किये गये अन्यायका बदला लेते हैं, मनुष्योंको संयममें रखनेवाली यमराजकी वही पुरी संयमनी नामसे प्रसिद्ध है। वहीं मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।। १६ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
ज्येष्ठां स्वसारं पितरं मातरं च
यथा शत्रुं मदमत्ताश्चरन्ति ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ।। १७ ।।
धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो मदमत्त मनुष्य बड़ी बहिन, माता और पिताके साथ शत्रुके समान बर्ताव करते हैं, उन्हींके लिये यह यमराजका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ जानेवाला नहीं है ।। १७ ।।
गौतम उवाच
मन्दाकिनी वैश्रवणस्य राज्ञो
महाभागा भोगिजनप्रवेश्या ।
गन्धर्वयक्षैरप्सरोभिश्च जुष्टा
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ।। १८ ।।
गौतमने कहा— महान् सौभाग्यशाली मंदाकिनी नदी राजा कुबेरके नगरमें विराज रही हैं, जहाँ नागोंका ही प्रवेश होना संभव है, गंधर्व, यक्ष और अप्सराएँ उस मंदाकिनीका सदा सेवन करती हैं; वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।। १८ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
अतिथिव्रताः सुव्रता ये जना वै
प्रतिश्रयं ददति ब्राह्मणेभ्यः ।
शिष्टाशिनः संविभज्याश्रितांश्च
मंदाकिनीं तेऽपि विभूषयन्ति ।। १९ ।।
**धृतराष्ट्र बोले—**जो सदा अतिथियोंकी सेवामें तत्पर रहकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं, जो लोग ब्राह्मणको आश्रयदान करते हैं, तथा जो अपने आश्रितोंको बाँटकर शेष अन्नका भोजन करते हैं, वे ही लोग उस मंदाकिनीतटकी शोभा बढ़ाते हैं (राजा धृतराष्ट्रको तो वहाँ भी नहीं जाना है) ॥ १९ ॥
गौतम उवाच
मेरोरग्रे यद् वनं भाति रम्यं
सुपुष्पितं किन्नरीगीतजुष्टम् ।
सुदर्शना यत्र जम्बूविशाला
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २० ॥
**गौतम बोले—**मेरुपर्वतके सामने जो रमणीय वन शोभा पाता है, जहाँ सुंदर फूलोंकी छटा छायी रहती है और किन्नरियोंके मधुर गीत गूँजते रहते है, जहाँ देखनेमें सुंदर विशाल जम्बूवृक्ष शोभा पाता है, वहाँ पहुँचकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २० ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ये ब्राह्मणा मृदवः सत्यशीला
बहुश्रुताः सर्वभूताभिरामाः ।
येऽधीयते सेतिहासं पुराणं
मध्वाहृत्या जुह्वति वै द्विजेभ्यः ॥ २१ ॥
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ।
यद् विद्यते विदितं स्थानमस्ति
तद् ब्रूहि त्वं त्वरितो ह्येष यामि ॥ २२ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**महर्षे! जो ब्राह्मण कोमलस्वभाव, सत्यशील, अनेक शास्त्रोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण भूतोंको प्यार करनेवाले हैं, जो इतिहास और पुराणका अध्ययन करते तथा ब्राह्मणोंको मधुर भोजन अर्पित करते हैं; ऐसे लोगोंके लिये ही यह पूर्वोक्त लोक है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है। आपको जो-जो स्थान विदित हैं, उन सबका यहाँ वर्णन कर जाइये। मैं जानेके लिये उतावला हूँ। यह देखिये, मैं चला ॥
गौतम उवाच
सुपुष्पितं किन्नरराजजुष्टं
प्रियं वनं नंदनं नारदस्य ।
गंधर्वाणामप्सरसां च शश्वत्
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २३ ॥
गौतमने कहा— सुंदर-सुंदर फूलोंसे सुशोभित, किन्नर-राजोंसे सेवित तथा नारद, गंधर्व और अप्सराओंको सर्वदा प्रिय जो नंदननामक वन है, वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। २३ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
ये नृत्यगीते कुशला जनाः सदा
ह्ययाचमानाः सहिताश्चरन्ति ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ।। २४ ।।
धृतराष्ट्र बोले— महर्षे! जो लोग नृत्य और गीतमें निपुण हैं; कभी किसीसे कुछ याचना नहीं करते हैं तथा सदा सज्जनोंके साथ विचरण करते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह नंदनवनका जगत् है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ।। २४ ।।
गौतम उवाच
यत्रोत्तराः कुरवो भान्ति रम्या
देवैः सार्धं मोदमाना नरेन्द्र ।
यत्राग्नियोनाश्च वसन्ति लोका
अब्द्योनयः पर्वतयोनयश्च ।। २५ ।।
यत्र शक्रो वर्षति सर्वकामान्
यत्र स्त्रियः कामचारा भवन्ति ।
यत्र चेष्र्या नास्ति नारीनराणां
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ।। २६ ।।
गौतम बोले— नरेन्द्र! जहाँ रमणीय आकृतिवाले उत्तर कुरुके निवासी अपूर्व शोभा पाते हैं, देवताओंके साथ रहकर आनंद भोगते हैं, अग्नि, जल और पर्वतसे उत्पन्न हुए दिव्य मानव जिस देशमें निवास करते हैं, जहाँ इन्द्र सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करते हैं, जहाँकी स्त्रियाँ इच्छानुसार विचरनेवाली होती हैं तथा जहाँ स्त्रियों और पुरुषोंमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। २५-२६ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
ये सर्वभूतेषु निवृत्तकामा
अमांसादा न्यस्तदण्डाश्चरन्ति ।
न हिंसन्ति स्थावरं जङ्गमं च
भूतानां ये सर्वभूतात्मभूताः ।। २७ ।।
निराशिशो निर्ममा वीतरागा
लाभालाभे तुल्यनिन्दाप्रशंसाः ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ २८ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो समस्त प्राणियोंमें निष्काम हैं, जो मांसाहार नहीं करते, किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, स्थावर-जंगम प्राणियोंकी हिंसा नहीं करते, जिनके लिये समस्त प्राणी अपने आत्माके ही तुल्य हैं, जो कामना, ममता और आसक्तिसे रहित हैं, लाभ-हानि, निंदा तथा प्रशंसामें जो सदा समभाव रखते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह उत्तर कुरुनामक लोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ २७-२८ ॥
गौतम उवाच
ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगन्धा विरजा वीतशोकाः ।
सोमस्य राज्ञः सदने महात्मन-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २९ ॥
गौतमने कहा— राजन्! उससे भिन्न बहुत-से सनातन लोक हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ रजोगुण तथा शोकका सर्वथा अभाव है। महात्मा राजा सोमके लोकमें उनकी स्थिति है। वहाँ पहुँचकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २९ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ये दानशीला न प्रतिगृह्णते सदा
न चाप्यर्थांश्चाददते परेभ्यः ।
येषामदेयमर्हते नास्ति किंचित्
सर्वातिथ्याः सुप्रसादा जनाश्च ॥ ३० ॥
ये क्षन्तारो नाभिजल्पन्ति चान्यान्
सत्रीभूताः सततं पुण्यशीलाः ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३१ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो सदा दान करते हैं, किंतु दान लेते नहीं, जिनकी दृष्टिमें सुयोग्य पात्रके लिये कुछ भी अदेय नहीं है, जो सबका अतिथि-सत्कार करते तथा सबके प्रति कृपाभाव रखते हैं, जो क्षमाशील हैं, दूसरोंसे कभी कुछ नहीं बोलते हैं और जो पुण्यशील महात्मा सदा सबके लिये अन्नसत्ररूप हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह सोमलोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३०-३१ ॥
गौतम उवाच
ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातना विरजसो वितमस्का विशोकाः । आदित्यदेवस्य पदं महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३२ ॥ **गौतमने कहा—**राजन्! सोमलोकसे भी ऊपर कितने ही सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जो रजोगुण, तमोगुण और शोकसे रहित हैं। वे महात्मा सूर्यदेवके स्थान हैं। वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।।
धृतराष्ट्र उवाच
स्वाध्यायशीला गुरुशुश्रूषणे रता- स्तपस्विनः सुव्रताः सत्यसंधाः । आचार्याणामप्रतिकूलभाषिणो नित्योत्थिता गुरुकर्मस्वचोद्याः ॥ ३३ ॥ तथाविधानामेष लोको महर्षे विशुद्धानां भावितो वाग्यतानाम् । सत्ये स्थितानां वेदविदां महात्मनां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**महर्षे! जो स्वाध्यायशील, गुरुसेवापरायण, तपस्वी, उत्तम व्रतधारी, सत्यप्रतिज्ञ, आचार्योंके प्रतिकूल भाषण न करनेवाले, सदा उद्योगशील तथा बिना कहे ही गुरुके कार्यमें संलग्न रहनेवाले हैं, जिनका भाव विशुद्ध है, जो मौनव्रतावलम्बी, सत्यनिष्ठ और वेदवेत्ता महात्मा हैं, उन्हीं लोगोंके लिये यह सूर्यदेवका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ॥ ३३-३४ ॥
गौतम उवाच
ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः सुपुण्यगंधा विरजा विशोकाः । वरुणस्य राज्ञः सदने महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३५ ॥ **गौतमने कहा—**उसके सिवा दूसरे भी बहुत-से सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ न तो रजोगुण है और न शोक ही। महामना राजा वरुणके लोकमें वे स्थान हैं। वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ३५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
चातुर्मास्यैर्यै यजन्ते जनाः सदा
तथेष्टीनां दशशतं प्राप्नुवन्ति । ये चाग्निहोत्रं जुह्वति श्रद्दधाना यथाम्नायं त्रीणि वर्षाणि विप्राः ॥ ३६ ॥ सुधारिणां धर्मधुरे महात्मनां यथोदिते वर्त्मनि सुस्थितानाम् । धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३७ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो लोग सदा चातुर्मास्य याग करते हैं, हजारों इष्टियोंका अनुष्ठान करते हैं तथा जो ब्राह्मण तीन वर्षोंतक वैदिक विधिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र करते हैं, धर्मका भार अच्छी तरह वहन करते हैं, वेदोक्त मार्गपर भलीभाँति स्थित होते हैं, वे ही धर्मात्मा महात्मा ब्राह्मण वरुणलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है। यह उससे भी उत्तम लोक प्राप्त करेगा ॥ ३६-३७ ॥
गौतम उवाच
इन्द्रस्य लोका विरजा विशोका दुरन्वयाः काङ्क्षिता मानवानाम् । तस्याहं ते भवने भूरितेजसो राजन्निर्मं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३८ ॥ **गौतमने कहा—**राजन्! इन्द्रके लोक रजोगुण और शोकसे रहित हैं। उनकी प्राप्ति बहुत कठिन है। सभी मनुष्य उन्हें पानेकी इच्छा करते हैं। उन्हीं महातेजस्वी इन्द्रके भवनमें चलकर मैं आपसे अपने इस हाथीको वापस लूँगा ॥ ३८ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
शतवर्षजीवी यश्च शूरो मनुष्यो वेदाध्यायी यश्च यज्वाप्रमत्तः । एते सर्वे शक्रलोकं व्रजन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३९ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो सौ वर्षतक जीनेवाला शूरवीर मनुष्य वेदोंका स्वाध्याय करता, यज्ञमें तत्पर रहता और कभी प्रमाद नहीं करता है, ऐसे ही लोग इन्द्रलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्र उससे भी उत्तम लोकमें जायगा। उसे वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३९ ॥
गौतम उवाच
प्राजापत्याः सन्ति लोका महान्तो नाकस्य पृष्ठे पुष्कला वीतशोकाः ।
मनीषिताः सर्वलोकोद्भवानां
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४० ॥
**गौतम बोले—**राजन्! स्वर्गके शिखरपर प्रजापतिके महान् लोक हैं जो हृष्ट-पुष्ट और शोकरहित हैं। सम्पूर्ण जगत्के प्राणी उन्हें पाना चाहते हैं। मैं वहीं जाकर तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४० ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ये राजानो राजसूयाभिषिक्ता
धर्मात्मानो रक्षितारः प्रजानाम् ।
ये चाश्वमेधावभृथे प्लुतांगा-
स्तेषां लोका धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ४१ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**मुने! जो धर्मात्मा राजा राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होते हैं प्रजाजनोंकी रक्षा करते हैं तथा अश्वमेधयज्ञके अवभृथ-स्नानमें जिसके सारे अंग भीग जाते हैं, उन्हींके लिये प्रजापतिलोक हैं। धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जायगा ॥ ४१ ॥
गौतम उवाच
ततः परं भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगंधा विरजा वीतशोकाः ।
तस्मिन्नहं दुर्लभे चाप्यधृष्ये
गवां लोके हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४२ ॥
**गौतम बोले—**उससे परे जो पवित्र गन्धसे परिपूर्ण, रजोगुणरहित तथा शोकशन्य सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, उन्हें गोलोक कहते हैं। उस दुर्लभ एवं दुर्धर्ष गोलोकमें जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
यो गोसहस्री शतदः समां समां
गवां शती दश दद्याच्च शक्त्या ।
तथा दशभ्यो यश्च दद्यादिहैकां
पञ्चभ्यो वा दानशीलस्तथैकाम् ॥ ४३ ॥
ये जीर्यन्ते ब्रह्मचर्येण विप्रा
ब्राह्मीं वाचं परिरक्षन्ति चैव ।
मनस्विनस्तीर्थयात्रापरायणा-
स्ते तत्र मोदन्ति गवां निवासे ॥ ४४ ॥