महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपस्य दायकः ।
इसलिये गृहस्थोंको सायंकालमें अवश्य दीपदान करने चाहिये। दीपदान करनेवाला पुरुष परलोकमें दिव्य नेत्र प्राप्त करता है ।। ३९½ ।।
पूर्णचन्द्रप्रतीकाशा दीपदाश्च भवन्त्युत ।। ४० ।।
यावदक्षिनिमेषाणि ज्वलन्ते तावतीः समाः ।
रूपवान् बलवांश्चापि नरो भवति दीपaction... दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपaction? दीपदः ।। ४१ ।।
दीपदान करनेवाले मनुष्य निश्चय ही पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् होते हैं। जितने पलकोंके गिरनेतक दीपक जलते हैं, उतने वर्षोंतक दीपदान करनेवाला मनुष्य रूपवान् और बलवान् होता है ।। ४०-४१ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्यभृगुसंवादो नाम शततमोऽध्यायः ।। १०० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भृगुका संवादनामक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।