भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 885, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 885

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एकाधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति

युधिष्ठिर उवाच

ब्राह्मणस्वानि ये मंदा हरन्ति भरतर्षभ ।
नृशंसकारिणो मूढाः क्व ते गच्छन्ति मानवाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जो मूर्ख और मंदबुद्धि मानव क्रूरतापूर्ण कर्ममें संलग्न रहकर ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करते हैं, वे किस लोकमें जाते हैं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

(पातकानां परं ह्येतद् ब्रह्मस्वहरणं बलात् ।
सान्वयास्ते विनश्यन्ति चण्डालाः प्रेत्य चेह च ॥)
भीष्मजीने कहा— राजन्! ब्राह्मणोंके धनका बलपूर्वक अपहरण—यह सबसे बड़ा पातक है। ब्राह्मणोंका धन लूटनेवाले चाण्डाल-स्वभावयुक्त मनुष्य अपने कुल-परिवारसहित नष्ट हो जाते हैं ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
चाण्डालस्य च संवादं क्षत्रबंधोश्च भारत ॥ २ ॥
भारत! इस विषयमें जानकार मनुष्य एक चाण्डाल और क्षत्रियबंधुका संवादविषयक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

राजन्य उवाच

वृद्धरूपोऽसि चाण्डाल बालवच्च विचेष्टसे ।
श्वखराणां रजःसेवी कस्मादुद्विजसे गवाम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियने पूछा— चाण्डाल! तू बूढ़ा हो गया है तो भी बालकों-जैसी चेष्टा करता है। कुत्तों और गधोंकी धूलिका सेवन करनेवाला होकर भी तू इन गौओंकी धूलिसे क्यों इतना उद्विग्न हो रहा है ॥ ३ ॥

साधुभिर्गर्हितं कर्म चाण्डालस्य विधीयते ।
कस्माद् गोरजसा ध्वस्तमपां कुण्डे निषिञ्चसि ॥ ४ ॥
चाण्डालके लिये विहित कर्मकी श्रेष्ठ पुरुष निंदा करते हैं। तू गोधूलिसे ध्वस्त हुए अपने शरीरको क्यों जलके कुण्डमें डालकर धो रहा है? ॥ ४ ॥