महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 886, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाण्डाल उवाच
ब्राह्मणस्य गवां राजन् ह्रियतीनां रजः पुरा । सोममुध्वंसयामास तं सोमं येऽपिबन् द्विजाः ॥ ५ ॥ दीक्षितश्च स राजापि क्षिप्रं नरकमाविशत् । सह तैर्याजकैः सर्वैर्ब्रह्मस्वमुपजीव्य तत् ॥ ६ ॥ **चाण्डालने कहा—**राजन्! पहलेकी बात है—एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था। जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया। उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे। उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए ॥ ५-६ ॥
येऽपि तत्रापिबन् क्षीरं घृतं दधि च मानवाः । ब्राह्मणाः सहराजन्याः सर्वे नरकमाविशन् ॥ ७ ॥ जहाँ वे गौएँ हरकर लायी गयी थीं, वहाँ जिन मनुष्योंने उनके दूध, दही और घीका उपभोग किया, वे सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि नरकमें पड़े ॥ ७ ॥
जघ्नुस्ताः पयसा पुत्रांस्तथा पौत्रान् विधुन्वतीः । पशूनवेक्षमाणाश्च साधुवृत्तेन दम्पती ॥ ८ ॥ वे अपहृत हुई गौएँ जब दूसरे पशुओंको देखतीं और अपने स्वामी तथा बछड़ोंको नहीं देखती थीं, तब पीड़ासे अपने शरीरको कँपाने लगती थीं। उन दिनों सद्भावसे ही दूध देकर उन्होंने अपहरणकारी पति-पत्नीको तथा उनके पुत्रों और पौत्रोंको भी नष्ट कर दिया ॥ ८ ॥
अहं तत्रावसं राजन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । तासां मे रजसा ध्वस्तं भैक्षमासीन्नराधिप ॥ ९ ॥ राजन्! मैं भी उसी गाँवमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक जितेन्द्रियभावसे निवास करता था। नरेश्वर! एक दिन उन्हीं गौओंके दूध एवं धूलके कणसे मेरा भिक्षान्न भी दूषित हो गया ॥ ९ ॥
चाण्डालोऽहं ततो राजन् भुक्त्वा तदभवं नृप । ब्रह्मस्वहारी च नृपः सोऽप्रतिष्ठां गतिं ययौ ॥ १० ॥ महाराज! उस भिक्षान्नको खाकर मैं चाण्डाल हो गया और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले वे राजा भी नरकगामी हो गये ॥ १० ॥
तस्माद्धरेन्न विप्रस्वं कदाचिदपि किंचन । ब्रह्मस्वं रजसा ध्वस्तं भुक्त्वा मां पश्य यादृशम् ॥ ११ ॥