महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 887, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसलिये कभी किंचिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण न करे। ब्राह्मणके धूल-धूसरित दुग्धरूप धनको खाकर मेरी जो दशा हुई है, उसे आप प्रत्यक्ष देख लें ।। ११ ।। तस्मात् सोमोऽप्यविक्रेयः पुरुषेण विपश्चिता । विक्रयं त्विह सोमस्य गर्हयन्ति मनीषिणः ।। १२ ।। इसीलिये विद्वान् पुरुषको सोमरसका विक्रय भी नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस जगत्में सोमरसके विक्रयकी बड़ी निंदा करते हैं ।। १२ ।। ये चैनं क्रीणते तात ये च विक्रीणते जनाः । ते तु वैवस्वतं प्राप्य रौरवं यान्ति सर्वशः ।। १३ ।। तात! जो लोग सोमरसको खरीदते हैं और जो लोग उसे बेचते हैं, वे सभी यमलोकमें जाकर रौरव नरकमें पड़ते हैं ।। १३ ।। सोमं तु रजसा ध्वस्तं विक्रीणन् विधिपूर्वकम् । श्रोत्रियो वार्धुषी भूत्वा न चिरं स विनश्यति ।। १४ ।। वेदवेत्ता ब्राह्मण यदि गौओंके चरणोंकी धूलि और दूधसे दूषित सोमको विधिपूर्वक बेचता है अथवा ब्याजपर रुपये चलाता है तो वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है ।। १४ ।। नरकं त्रिंशतं प्राप्य स्वविष्ठामुपजीवति । श्वचर्यामभिमानं च सखिदारे च विप्लवम् ।। १५ ।। तुलया धारयन् धर्ममभिमान्यतिरिच्यते । वह तीस नरकोंमें पड़कर अंतमें अपनी ही विष्ठापर जीनेवाला कीड़ा होता है। कुत्तोंको पालना, अभिमान तथा मित्रकी स्त्रीसे व्यभिचार—इन तीनों पापोंको तराजूपर रखकर यदि धर्मतः तौला जाय तो अभिमानका ही पलड़ा भारी होगा ।। १५ १/२ ।। श्वानं वै पापिनं पश्य विवर्णं हरिणं कृशम् ।। १६ ।। अभिमानेन भूतानामिमां गतिमुपागतम् । आप मेरे इस पापी कुत्तेको देखिये, यह कान्तिहीन, सफेद और दुर्बल हो गया है। यह पहले मनुष्य था। परंतु समस्त प्राणियोंके प्रति अभिमान रखनेके कारण इस दुर्गतिको प्राप्त हुआ है ।। १६ १/२ ।। अहं वै विपुले तात कुले धनसमन्विते ।। १७ ।। अन्यस्मिञ्जन्मनि विभो ज्ञानविज्ञानपारगः । अभवं तत्र जानानो ह्येतान् दोषान् मदात् सदा ।। १८ ।। संरब्ध एव भूतानां पृष्ठमांसमभक्षयम् । सोऽहं तेन च वृत्तेन भोजनेन च तेन वै ।। १९ ।। इमामवस्थां सम्प्राप्तः पश्य कालस्य पर्ययम् । तात! प्रभो! मैं भी दूसरे जन्ममें धनसम्पन्न महान् कुलमें उत्पन्न हुआ था। ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत था। इन सब दोषोंको जानता था तो भी अभिमानवश सदा सब