महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 882, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयस्मात् पदाऽऽहतः क्रोधाच्छिरसीमं महामुनिम् ॥ २४ ॥ तस्मादाशु महीं गच्छ सर्पो भूत्वा सुदुर्मते । उनके मस्तकपर चोट होते ही जटाके भीतर बैठे हुए महर्षि भृगु अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने पापात्मा नहुषको इस प्रकार शाप दिया—‘ओ दुर्मते! तुमने इन महामुनिके मस्तकमें क्रोधपूर्वक लात मारी है, इसलिये तू शीघ्र ही सर्प होकर पृथ्वीपर चला जा’ ॥ इत्युक्तः स तदा तेन सर्पो भूत्वा पपात ह ॥ २५ ॥ अदृष्टेनाथ भृगुणा भूतले भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! भृगु नहुषको दिखायी नहीं दे रहे थे। उनके इस प्रकार शाप देनेपर नहुष सर्प होकर पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २५ १/२ ॥ भृगुं हि यदि सोऽद्रक्ष्यन्नहुषः पृथिवीपते ॥ २६ ॥ न च शक्तोऽभविष्यद् वै पातने तस्य तेजसा । पृथ्वीनाथ! यदि नहुष भृगुको देख लेते तो उनके तेजसे प्रतिहत होकर वे उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरानेमें समर्थ न होते ॥ २६ १/२ ॥ स तु तैस्तैः प्रदानैश्च तपोभिर्नियमैस्तथा ॥ २७ ॥ पतितोऽपि महाराज भूतले स्मृतिमानभूत् । प्रसादयामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति ॥ २८ ॥ महाराज! नहुषने जो भिन्न-भिन्न प्रकारके दान किये थे, तप और नियमोंका अनुष्ठान किया था, उनके प्रभावसे वे पृथ्वीपर गिरकर भी पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वंचित नहीं हुए। उन्होंने भृगुको प्रसन्न करते हुए कहा—‘प्रभो! मुझको मिले हुए शापका अंत होना चाहिये’ ॥ ततोऽगस्त्यः कृपाविष्टः प्रासादयत तं भृगुम् । शापान्तार्थं महाराज स च प्रादात् कृपान्वितः ॥ २९ ॥ महाराज! तब अगस्त्यने दयासे द्रवित होकर उनके शापका अंत करनेके लिये भृगुको प्रसन्न किया। तब कृपायुक्त हुए भृगुने उस शापका अंत इस प्रकार निश्चित किया ॥ २९ ॥
भृगुरुवाच
राजा युधिष्ठिरो नाम भविष्यति कुलोद्वहः । स त्वां मोक्षयिता शापादित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ ३० ॥ भृगुने कहा—राजन्! तुम्हारे कुलमें सर्वश्रेष्ठ युधिष्ठिर नामसे प्रसिद्ध एक राजा होंगे, जो तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे—ऐसा कहकर भृगुजी अंतर्धान हो गये ॥ ३० ॥ अगस्त्योऽपि महातेजाः कृत्वा कार्यं शतक्रतोः । स्वमाश्रमपदं प्रायात् पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ ३१ ॥