महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 881, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंरथ ढोनेके लिये बुलाया। तब महातेजस्वी भृगुने मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजीसे कहा — ॥ १४-१५ ॥
निमीलय स्वनयने जटां यावद् विशामि ते ।
स्थाणुभूतस्य तस्याथ जटां प्राविशदच्युतः ॥ १६ ॥
भृगुः स सुमहातेजाः पातनाय नृपस्य च ।
ततः स देवराट् प्राप्तस्तमृषिं वाहनाय वै ॥ १७ ॥
‘मुने! आप अपनी आँखें मूँद लें, मैं आपकी जटामें प्रवेश करता हूँ।' महर्षि अगस्त्य आँखें मूँदकर काष्ठकी तरह स्थिर हो गये। अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले महातेजस्वी भृगुने राजाको स्वर्गसे नीचे गिरानेके लिये अगस्त्यजीकी जटामें प्रवेश किया। इतनेहीमें देवराज नहुष ऋषिको अपना वाहन बनानेके लिये उनके पास पहुँचे ॥ १६-१७ ॥
ततोऽगस्त्यः सुरपतिं वाक्यमाह विशाम्पते ।
योजयस्वेति मां क्षिप्रं कं च देशं वहामि ते ॥ १८ ॥
यत्र वक्ष्यसि तत्र त्वां नयिष्यामि सुराधिप ।
इत्युक्तो नहुषस्तेन योजयामास तं मुनिम् ॥ १९ ॥
प्रजानाथ! तब अगस्त्यने देवराजसे कहा—‘राजन्! मुझे शीघ्र रथमें जोतिये और बताइये मैं आपको किस स्थानपर ले चलूँ। देवेश्वर! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपको ले चलूँगा।' उनके ऐसा कहनेपर नहुषने मुनिको रथमें जोत दिया ॥ १८-१९ ॥
भृगुस्तस्य जटान्तस्थो बभूव हृषितो भृशम् ।
न चापि दर्शनं तस्य चकार स भृगुस्तदा ॥ २० ॥
यह देख उनकी जटाके भीतर बैठे हुए भृगु बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भृगुने नहुषका साक्षात्कार नहीं किया ॥ २० ॥
वरदानप्रभावज्ञो नहुषस्य महात्मनः ।
न चुकोप तदागस्त्यो युक्तोऽपि नहुषेण वै ॥ २१ ॥
अगस्त्यमुनि महामना नहुषको मिले हुए वरदानका प्रभाव जानते थे, इसलिये उसके द्वारा रथमें जोते जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए ॥ २१ ॥
तं तु राजा प्रतोदेन चोदयामास भारत ।
न चुकोप स धर्मात्मा ततः पादेन देवराट् ॥ २२ ॥
अगस्त्यस्य तदा क्रुद्धो वामेनाभ्यहनच्छिरः ।
भारत! राजा नहुषने चाबुक मारकर हाँकना आरम्भ किया तो भी उन धर्मात्मा मुनिको क्रोध नहीं आया। तब कुपित हुए देवराजने महात्मा अगस्त्यके सिरपर बायें पैरसे प्रहार किया ॥ २२ १/२ ॥
तस्मिन् शिरस्यभिहते स जटान्तर्गतो भृगुः ॥ २३ ॥
शशाप बलवत्क्रुद्धो नहुषं पापचेतसम् ।