महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 892, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगौतम उवाच
तवैव गावो हि भवन्तु राजन् दास्यः सनिष्का विविधं च रत्नम् । अन्यच्च वित्तं विविधं नरेन्द्र किं ब्राह्मणस्येह धनेन कृत्यम् ॥ १२ ॥ **गौतम बोले—**राजन्! वे गौएँ, दासियाँ, स्वर्णमुद्राएँ, नाना प्रकारके रत्न तथा और भी तरह-तरहके धन तुम्हारे ही पास रहें। नरेन्द्र! ब्राह्मणके यहाँ धनका क्या काम है? ॥ १२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ब्राह्मणानां हस्तिभिर्नास्ति कृत्यं राजन्यानां नागकुलानि विप्र । स्वं वाहनं नयतो नास्त्यधर्मो नागश्रेष्ठं गौतमास्मान्निवर्त ॥ १३ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**विप्रवर गौतम! ब्राह्मणोंको हाथियोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। हाथियोंके समूह तो राजाओंके ही काम आते हैं। हाथी मेरा वाहन है, अतः इस श्रेष्ठ हाथीको ले जानेमें कोई अधर्म नहीं है। आप इसकी ओरसे अपनी तृष्णा हटा लीजिये ॥ १३ ॥
गौतम उवाच
यत्र प्रेतो नंदति पुण्यकर्मा यत्र प्रेतः शोचते पापकर्मा । वैवस्वतस्य सदने महात्मं- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ १४ ॥ **गौतमने कहा—**महात्मन्! जहाँ जाकर पुण्यकर्मा पुरुष आनंदित होता है और जहाँ जाकर पापकर्मा मनुष्य शोकमें डूब जाता है, उस यमराजके लोकमें मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ये निष्क्रिया नास्तिकाश्रद्दधानाः पापात्मान इन्द्रियार्थे निविष्टाः । यमस्य ते यातनां प्राप्नुवन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ १५ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो निष्क्रिय, नास्तिक, श्रद्धाहीन, पापात्मा और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त हैं, वे ही यमयातनाको प्राप्त होते हैं; परंतु राजा धृतराष्ट्रको वहाँ नहीं जाना