महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 891, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस महानागके कुम्भस्थलसे फूटकर मदकी धारा बहने लगी। मानो पर्वतसे झरना झर रहा हो। एक दिन इन्द्रने राजा धृतराष्ट्रके रूपमें आकर उस हाथीको अपने अधिकारमें कर लिया ।। ६ ।।
ह्रियमाणं तु तं दृष्ट्वा गौतमः संशितव्रतः । अभ्यभाषत राजानं धृतराष्ट्रं महातपाः ।। ७ ।।
कठोर व्रतका पालन करनेवाले महातपस्वी गौतमने उस हाथीका अपहरण होता देख राजा धृतराष्ट्रसे कहा— ।।
मा मेऽहार्षीर्हस्तिनं पुत्रमेनं दुःखात् पुष्टं धृतराष्ट्राकृतज्ञ । मैत्रं सतां सप्तपदं वदन्ति मित्रद्रोहो मैव राजन् स्पृशेत् त्वाम् ।। ८ ।।
'कृतज्ञताशून्य राजा धृतराष्ट्र! तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ। यह मेरा पुत्र है। मैंने बड़े दुःखसे इसका पालन-पोषण किया है। सत्पुरुषोंमें सात पग साथ चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है। इस नाते हम और तुम दोनों मित्र हैं। मेरे इस हाथीको ले जानेसे तुम्हें मित्रद्रोहका पाप लगेगा। तुम्हें यह पाप न लगे, ऐसी चेष्टा करो ।। ८ ।।
इध्मोदकप्रदातारं शून्यपालं ममाश्रमे । विनीतमाचार्यकुले सुयुक्तं गुरुकर्मणि ।। ९ ।। शिष्टं दान्तं कृतज्ञं च प्रियं च सततं मम । न मे विक्रोशतो राजन् हर्तुमर्हसि कुञ्जरम् ।। १० ।।
'राजन्! यह मुझे समिधा और जल लाकर देता है। मेरे आश्रममें जब कोई नहीं रहता है, तब यही रक्षा करता है। आचार्यकुलमें रहकर इसने विनयकी शिक्षा ग्रहण की है। गुरुसेवाके कार्यमें यह पूर्णरूपसे संलग्न रहता है। यह शिष्ट, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ तथा मुझे सदा ही प्रिय है। मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहता हूँ, तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ' ।। ९-१० ।।
धृतराष्ट्र उवाच
गवां सहस्रं भवते ददानि दासीशतं निष्कशतानि पञ्च । अन्यच्च वित्तं विविधं महर्षे किं ब्राह्मणस्येह गजेन कृत्यम् ।। ११ ।।
धृतराष्ट्रने कहा—महर्षे! मैं आपको एक हजार गौएँ दूँगा। सौ दासियाँ और पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ प्रदान करूँगा और भी नाना प्रकारका धन समर्पित करूँगा। ब्राह्मणके यहाँ हाथीका क्या काम है? ।। ११ ।।