भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 900

**धृतराष्ट्रने कहा—**जो सहस्र गौओंका स्वामी होकर प्रतिवर्ष सौ गौओंका दान करता है, सौ गौओंका स्वामी होकर यथाशक्ति दस गौओंका दान करता है, जिसके पास दस ही गौएँ हैं, वह यदि उनमेंसे एक गायका दान करता है अथवा जो दानशील पुरुष पाँच गौओंमेंसे एक गायका दान कर देता है, वह गोलोकमें जाता है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यका पालन करते-करते ही बूढ़े हो जाते हैं, जो वेदवाणीकी सदा रक्षा करते हैं तथा जो मनस्वी ब्राह्मण सदा तीर्थयात्राओंमें ही तत्पर रहते हैं, वे ही गौओंके निवास-स्थान गोलोकमें आनंद भोगते हैं ।। ४३-४४ ।।

प्रभासं मानसं तीर्थं पुष्कराणि महत्सरः । पुण्यं च नैमिषं तीर्थं बाहुदां करतोयिनीम् ॥ ४५ ॥ गयां गयशिरश्चैव विपाशां स्थूलवालुकाम् । कृष्णां गंगां पञ्चनदं महाह्रदमथापि च ॥ ४६ ॥ गोमतीं कौशिकीं पम्पां महात्मानो धृतव्रताः । सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां ये तु यान्ति च ॥ ४७ ॥ तत्र ते दिव्यसंस्थाना दिव्यमाल्यधराः शिवाः । प्रयान्ति पुण्यगंधाढ्या धृतराष्ट्रो न तत्र वै ॥ ४८ ॥

प्रभात, मानसरोवर तीर्थ, त्रिपुष्कर नामक महान् सरोवर, पवित्र नैमिषतीर्थ, बाहुदा नदी, करतोया नदी, गया, गयशिर, स्थूल बालुकायुकत्त विपाशा (व्यास), कृष्णा, गंगा, पंचनद, महाह्रद, गोमती, कौशिकी, पम्पासरोवर, सरस्वती, दृषद्वती और यमुना—इन तीर्थोंमें जो व्रतधारी महात्मा जाते हैं, वे ही दिव्य रूप धारण करके दिव्य मालाओंसे अलंकृत हो गोलोकमें जाते हैं और कल्याणमय स्वरूप तथा पवित्र सुगंधसे व्याप्त होकर वहाँ निवास करते हैं। धृतराष्ट्र उस लोकमें भी नहीं मिलेगा ।।

गौतम उवाच

यत्र शीतभयं नास्ति न चोष्णभयमण्वपि । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न दुःखं न सुखं तथा ॥ ४९ ॥ न द्वेष्यो न प्रियः कश्चिन्न बन्धुर्न रिपुस्तथा । न जरामरणे तत्र न पुण्यं न च पातकम् ॥ ५० ॥ तस्मिन् विरजसि स्फीते प्रज्ञासत्त्वव्यवस्थिते । स्वयम्भुभवने पुण्ये हस्तिनं मे प्रदास्यसि ॥ ५१ ॥

**गौतम बोले—**जहाँ सर्दीका भय नहीं है, गर्मीका अणुमात्र भी भय नहीं है, जहाँ न भूख लगती है न प्यास, न ग्लानि प्राप्त होती है न दुःख-सुख, जहाँ न कोई द्वेषका पात्र है न प्रेमका, न कोई बन्धु है न शत्रु, जहाँ जरा-मृत्यु, पुण्य और पाप कुछ भी नहीं है, उस