महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 901, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंरजोगुणसे रहित, समृद्धिशाली, बुद्धि और सत्त्वगुणसे सम्पन्न तथा पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाकर तुम्हें मुझे यह हाथी वापस देना पड़ेगा ॥ ४९–५१ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
निर्मुक्ताः सर्वसंगैर्यै कृतात्मानो यतव्रताः । अध्यात्मयोगसंस्थानैर्युक्ताः स्वर्गगतिं गताः ॥ ५२ ॥ ते ब्रह्मभवनं पुण्यं प्राप्नुवन्तीह सात्त्विकाः । न तत्र धृतराष्ट्रस्ते शक्यो द्रष्टुं महामुने ॥ ५३ ॥ धृतराष्ट्रने कहा—महामुने! जो सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हैं, जिन्होंने अपने मनको वशमें कर लिया है, जो नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं जो अध्यात्मज्ञान और योगसंबंधी आसनोंसे युक्त हैं, जो स्वर्गलोकके अधिकारी हो चुके हैं, ऐसे सात्त्विक पुरुष ही पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाते हैं। वहाँ तुम्हें धृतराष्ट्र नहीं दिखायी दे सकता ॥ ५२-५३ ॥
गौतम उवाच
रथन्तरं यत्र बृहच्च गीयते यत्र वेदी पुण्डरीकैस्तृणोति । यत्रोपयाति हरिभिः सोमपीथी तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ५४ ॥ गौतम बोले—जहाँ रथन्तर और बृहतसामका गान किया जाता है, जहाँ याज्ञिक पुरुष वेदीको कमलपुष्पोंसे आच्छादित करते हैं तथा जहाँ सोमपान करनेवाला पुरुष दिव्य अश्वोंद्वारा यात्रा करता है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ५४ ॥ बुध्यामि त्वां वृत्रहणं शतक्रतुं व्यतिक्रमन्तं भुवनानि विश्वा । कच्चिन्न वाचा वृजिनं कदाचि- दकार्षं ते मनसोऽभिषंगात् ॥ ५५ ॥ मैं जानता हूँ, आप राजा धृतराष्ट्र नहीं, वृत्रासुरका वध करनेवाले शतक्रतु इन्द्र हैं और सम्पूर्ण जगत्का निरीक्षण करनेके लिये सब ओर घूम रहे हैं। मैंने मानसिक आवेशमें आकर कदाचित् वाणीद्वारा आपके प्रति कोई अपराध तो नहीं कर डाला? ॥ ५५ ॥
शतक्रतुरुवाच
मघवाहं लोकपथं प्रजाना- मन्वागमं परिवादे गजस्य । तस्माद् भवान् प्रणतं मानुशास्तु