महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 902, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रवीषि यत् तत् करवाणि सर्वम् ॥ ५६ ॥
शतक्रतु बोले— मैं इन्द्र हूँ और आपके हाथीके अपहरणके कारण मानव प्रजाके दृष्टिपथमें निन्दित हो गया हूँ। अब मैं आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता हूँ। आप मुझे कर्तव्यका उपदेश दें। आप जो-जो कहेंगे, वह सब करूँगा ॥ ५६ ॥
गौतम उवाच
श्वेतं करेणुं मम पुत्रं हि नागं
यं मेऽहार्षीर्दशवर्षाणि बालम् ।
यो मे वने वसतोऽभूद् द्वितीय-
स्तमेव मे देहि सुरेन्द्र नागम् ॥ ५७ ॥
गौतम बोले— देवेन्द्र! यह श्वेत गजराजकुमार जो इस समय नवजवान हाथीके रूपमें परिणत हो चुका है, मेरा पुत्र है और अभी दस वर्षका बच्चा है। यही इस वनमें रहते हुए मेरा सहचर एवं सहयोगी है। इसे आपने हर लिया है। मेरी प्रार्थना है कि मेरे इसी हाथीको आप मुझे लौटा दें ॥ ५७ ॥
शतक्रतुरुवाच
अयं सुतस्ते द्विजमुख्य नाग
आगच्छति त्वामभिवीक्षमाणः ।
पादौ च ते नासिकयोपजिघ्रते
श्रेयो ममाध्याहि नमश्च तेऽस्तु ॥ ५८ ॥
शतक्रतुने कहा— विप्रवर! आपका पुत्रस्वरूप यह हाथी आपकीही ओर देखता हुआ आ रहा है और पास आकर आपके दोनों चरणोंको अपनी नासिकासे सूँघता है। अब आप मेरा कल्याण-चिंतन कीजिये, आपको नमस्कार है ॥
गौतम उवाच
शिवं सदैवहे सुरेन्द्र तुभ्यं
ध्यायामि पूजां च सदा प्रयुञ्जे ।
ममापि त्वं शक्र शिवं ददस्व
त्वया दत्तं प्रतिगृह्णामि नागम् ॥ ५९ ॥
गौतम बोले— सुरेन्द्र! मैं सदा ही यहाँ आपके कल्याणका चिंतन करता हूँ और सदा आपके लिये अपनी पूजा अर्पित करता हूँ। शक्र! आप भी मुझे कल्याण प्रदान करें। मैं आपके दिये हुए इस हाथीको ग्रहण करता हूँ ॥ ५९ ॥
शतक्रतुरुवाच
येषां वेदा निहिता वै गुहायां