भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 903, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 903

मनीषिणां सत्यवतां महात्मनाम् । तेषां त्वयैकेन महात्मनास्मि वृद्धस्तस्मात् प्रीतिमांस्तेऽहमद्य ।। ६० ।। हन्तैहि ब्राह्मण क्षिप्रं सह पुत्रेण हस्तिना । त्वं हि प्राप्तुं शुभाँल्लोकानह्नाय च चिराय च ।। ६१ ।। **शतक्रतुने कहा—**जिन सत्यवादी मनीषी महात्माओंकी हृदय-गुफामें सम्पूर्ण वेद निहित हैं, उनमें आप प्रमुख महात्मा हैं। केवल आपके कल्याण-चिंतनसे मैं समृद्धिशाली हो गया। इसलिये आज मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्राह्मण! मैं बड़े हर्षके साथ कहता हूँ कि आप अपने इस पुत्रभूत हाथीके साथ शीघ्र चलिये। आप अभी चिरकालके लिये कल्याणमय लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी हो गये हैं ।। ६०-६१ ।। स गौतमं पुरस्कृत्य सह पुत्रेण हस्तिना । दिवमाचक्रमे वज्री सद्भिः सह दुरासदम् ।। ६२ ।। पुत्रस्वरूप हाथीके साथ गौतमको आगे करके वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ दुर्गम देवलोकमें चले गये ।। ६२ ।। इदं यः शृणुयान्नित्यं यः पठेद्वा जितेन्द्रियः । स याति ब्रह्मणो लोकं ब्राह्मणो गौतमो यथा ।। ६३ ।। जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनेगा, अथवा इसका पाठ करेगा, वह गौतम ब्राह्मणकी भाँति ब्रह्मलोकमें जायगा ।। ६३ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि हस्तिकूटो नाम द्वयधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें हस्तिकूट नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।।