भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 904

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त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा

युधिष्ठिर उवाच

दानं बहुविधाकारं शांतिः सत्यमहिंसितम् । स्वदारतुष्टिश्चोक्ता ते फलं दानस्य चैव यत् ॥ १ ॥ पितामहस्य विदितं किमन्यत् तपसो बलात् । तपसो यत्परं तेऽद्य तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने अनेक प्रकारके दान, शांति, सत्य और अहिंसा आदिका वर्णन किया। अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेकी बात बतायी और दानके फलका भी निरूपण किया। आपकी जानकारीमें तपोबलसे बढ़कर दूसरा कौन बल है? यदि आपकी रायमें तपस्यासे भी कोई उत्कृष्ट साधन हो तो हमारे समक्ष उसकी व्याख्या करें ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

तपः प्रचक्षते यावत् तावल्लोको युधिष्ठिर । मतं ममात्र कौन्तेय तपो नानशनात् परम् ॥ ३ ॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! मनुष्य जितना तप करता है, उसीके अनुसार उसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं; किन्तु कुंतीकुमार! मेरी रायमें अनशनसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ३ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । भगीरथस्य संवादं ब्रह्मणश्च महात्मनः ॥ ४ ॥

इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा भगीरथ और महात्मा ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥

अतीत्य सुरलोकं च गवां लोकं च भारत । ऋषिलोकं च सोऽगच्छद् भगीरथ इति श्रुतम् ॥ ५ ॥

भारत! सुननेमें आया है कि राजा भगीरथ देवलोक, गौओंके लोक और ऋषिलोकको भी लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ५ ॥

तं तु दृष्ट्वा वचः प्राह ब्रह्मा राजन् भगीरथम् । कथं भगीरथागास्त्वमिमं लोकं दुरासदम् ॥ ६ ॥

राजन्! राजा भगीरथको वहाँ उपस्थित देख ब्रह्माजीने उनसे पूछा—'भगीरथ! इस लोकमें तो आना बहुत ही कठिन है, तुम कैसे यहाँ आ पहुँचे ॥ ६ ॥