महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 905, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंन हि देवा न गंधर्वा न मनुष्या भगीरथ । आयान्त्यतप्ततपसः कथं वै त्वमिहागतः ॥ ७ ॥ 'भगीरथ! देवता, गंधर्व और मनुष्य बिना तपस्या किये यहाँ नहीं आ सकते। फिर तुम कैसे यहाँ आ गये?' ॥ ७ ॥
भगीरथ उवाच
निष्काणां वै ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः शतं सहस्राणि सदैव दानम् । ब्राह्मं व्रतं नित्यमास्थाय विद्वन् न त्वेवाहं तस्य फलादिहागाम् ॥ ८ ॥ भगीरथने कहा—विद्वन्! मैं ब्रह्मचर्यव्रतका आश्रय लेकर प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण-मुद्राओंका ब्राह्मणोंके लिये दान किया करता था; परंतु उस दानके फलसे मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ८ ॥
दशैकरात्रान् दशपञ्चरात्रा- नेकादशैकादशकान् क्रतूनंश्च । ज्योतिष्टोमानां च शतं यदिष्टं फलेन तेनापि च नागतोऽहम् ॥ ९ ॥ मैंने एक रातमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, पाँच रातोंमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, ग्यारह रातोंमें समाप्त होनेवाले ग्यारह यज्ञ और ज्योतिष्टोम नामक एक सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, परंतु उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ९ ॥
यच्चावसं जाह्नवतीरनित्यः शतं समास्तप्यमानस्तपोऽहम् । अदां च तत्राश्वतरीसहस्रं नारीपुरं न च तेनाहमागाम् ॥ १० ॥ मैंने जो घोर तपस्या करते हुए लगातार सौ वर्षोंतक प्रतिदिन गंगाजीके तटपर निवास किया है और वहाँ सहस्रों खच्चरियों तथा झुंड-की-झुंड कन्याओंका दान किया, उस पुण्यके प्रभावसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १० ॥
दशायुतानि चाश्वानां गोऽयुतानि च विंशतिम् । पुष्करेषु द्विजातिभ्यः प्रादां शतसहस्रशः ॥ ११ ॥ सुवर्णचन्द्रोत्तमधारिणीनां कन्योत्तमानामददं सहस्रम् । षष्टिं सहस्राणि विभूषितानां जाम्बूनदैराभरणैर्न तेन ॥ १२ ॥