भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 906, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 906

पुष्करतीर्थमें जो सैकड़ों-हजारों बार मैंने ब्राह्मणोंको एक लाख घोड़े और दो लाख गौएँ दान कीं तथा सोनेके उत्तम चन्द्रहार धारण करनेवाली जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित हुई साठ हजार सुन्दरी कन्याओंका जो सहस्रों बार दान किया, उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ दशार्बुदान्यददं गोसवेज्या- स्वकैकशो दश गा लोकनाथ । समानवत्साः पयसा समन्विताः सुवर्णकांस्योपदुहा न तेन ॥ १३ ॥ लोकनाथ! गोसव नामक यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें मैंने दूध देनेवाली सौ करोड़ गौओंका दान किया। उस समय एक-एक ब्राह्मणको दस-दस गायें मिली थीं। प्रत्येक गायके साथ उसीके समान रंगवाले बछड़े और सुवर्णमय दुग्धपात्र भी दिये गये थे; परंतु उस यज्ञके पुण्यसे भी मैं यहाँतक नहीं पहुँचा हूँ ॥ १३ ॥ आप्तोर्यामेषु नियतमेकैकस्मिन् दशाददम् । गृष्टीनां क्षीरदात्रीणां रोहिणीनां शतानि च ॥ १४ ॥ अनेक बार सोमयागकी दीक्षा लेकर उन यज्ञोंमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको पहले बारकी ब्यायी हुई दूध देनेवाली दस-दस गौएँ और रोहिणी जातिकी सौ-सौ गौएँ दान की हैं ॥ १४ ॥ दोग्ध्रीणां वै गवां चापि प्रयुतानि दशैव ह । प्रादां दशगुणं ब्रह्मन् न तेनाहमिहागतः ॥ १५ ॥ ब्रह्मन्! इनके अतिरिक्त भी मैंने दस बार दस-दस लाख दुधारू गौएँ दान की हैं; किंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ १५ ॥ वाजिनां बाह्लिजातानामयुतान्यददं दश । कर्काणां हेममालानां न च तेनाहमागतः ॥ १६ ॥ बाह्लीक देशमें उत्पन्न हुए श्वेतरंगके एक लाख घोड़ोंको सोनेकी मालाओंसे सजाकर मैंने ब्राह्मणोंको दान किया; किंतु उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ कोटीश्च काञ्चनस्याष्टौ प्रादां ब्रह्मन् दशान्वहम् । एकैकस्मिन् क्रतौ तेन फलेनाहं न चागतः ॥ १७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने एक-एक यज्ञमें प्रतिदिन अठारह-अठारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ बाँटी थीं; परंतु उसके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १७ ॥ वाजिनां श्यामकणीनां हरितानां पितामह । प्रादां हेमस्रजां ब्रह्मन् कोटीर्दश च सप्त च ॥ १८ ॥ ईषादन्तान् महाकायान् काञ्चनस्रग्विभूषितान् । पद्मिनो वै सहस्राणि प्रादां दश च सप्त च ॥ १९ ॥