महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 907, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअलंकृतानां देवेश दिव्यैः कनकभूषणैः । रथानां काञ्चनाङ्गानां सहस्राण्यददं दश ॥ २० ॥ सप्त चान्यानि युक्तानि वाजिभिः समलंकृतैः । ब्रह्मन्! पितामह! फिर स्वर्णहारसे विभूषित हरे रंगवाले सत्रह करोड़ श्यामकर्ण घोड़े, ईषादण्ड (हरिस) के समान दाँतोंवाले, स्वर्णमालामण्डित एवं विशाल शरीरवाले सत्रह हजार कमलचिह्नयुक्त हाथी तथा सोनेके बने हुए दिव्य आभूषणोंसे विभूषित स्वर्णमय उपकरणोंसे युक्त और सजे-सजाये घोड़े जुते हुए सत्रह हजार रथ दान किये ॥ १८—२० १/२ ॥
दक्षिणावयवाः केचिद् वेदैर्ये सम्प्रकीर्तिताः ॥ २१ ॥ वाजपेयेषु दशसु प्रादां तेष्वपि चाप्यहम् । इनके अतिरिक्त भी जो वस्तुएँ वेदोंमें दक्षिणाके अवयवरूपसे बतायी गयी हैं, उन सबको मैंने दस वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करके दान किया था ॥ २१ १/२ ॥
शक्रतुल्यप्रभावाणामिज्यया विक्रमेण ह ॥ २२ ॥ सहस्रं निष्ककण्ठानामददं दक्षिणामहम् । विजित्य भूपतीन् सर्वानर्थैरिष्ट्वा पितामह ॥ २३ ॥ अष्टभ्यो राजसूयेभ्यो न च तेनाहमागतः । पितामह! यज्ञ और पराक्रममें जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनके कण्ठमें सुवर्णके हार शोभा पा रहे थे, ऐसे हजारों राजाओंको युद्धमें जीतकर प्रचुर धनके द्वारा आठ राजसूययज्ञ करके मैंने उन्हें ब्राह्मणोंको दक्षिणामें दे दिया; परंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २२-२३ १/२ ॥
स्रोतश्च यावद्गङ्गाकयाश्छन्नमासीज्जगत्पते ॥ २४ ॥ दक्षिणाभिः प्रवृत्ताभिर्मम नागां च तत्कृते । जगत्पते! मेरी दी हुई दक्षिणाओंसे गंगानदी आच्छादित हो गयी थी; परंतु उसके कारण भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २४ १/२ ॥
वाजिनां च सहस्रे द्वे सुवर्णशतभूषिते ॥ २५ ॥ वरं ग्रामशतं चाहमेकैकस्य त्रिधाददम् । उस यज्ञमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको तीन-तीन बार सोनेके सैकड़ों आभूषणोंसे विभूषित दो-दो हजार घोड़े और एक-एक सौ अच्छे गाँव दिये थे ॥ २५ १/२ ॥
तपस्वी नियताहारः शममास्थाय वाग्यतः ॥ २६ ॥ दीर्घकालं हिमवति गङ्गायाश्च दुरुत्सहाम् । मूर्ध्ना धारां महादेवः शिरसा यामधारयत् । न तेनाप्यहमागच्छं फलेनेह पितामह ॥ २७ ॥