भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 909, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 909

तद्विस्तीर्णं काञ्चनपादपानाम् । वनं वृतानां रत्नविभूषितानां न चैव तेषामागतोऽहं फलेन ॥ ३३ ॥ चार कोस लंबा-चौड़ा एक चम्पाके वृक्षोंका वन, जिसके प्रत्येक वृक्षमें रत्न जड़े हुए थे, वस्त्र लपेटा गया था और कण्ठदेशमें स्वर्णमाला पहनायी गयी थी, मैंने दान किया है; किंतु उस दानके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३३ ॥

तुरायणं हि व्रतमप्यधृष्य- मक्रोधनोऽकरवं त्रिंशतोऽब्दान् । शतं गवामष्टशतानि चैव दिने दिने ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः ॥ ३४ ॥ मैं तीस वर्षोंतक क्रोधरहित होकर तुरायण नामक दुष्कर व्रतका पालन करता रहा, जिसमें प्रतिदिन नौ सौ गायें ब्राह्मणोंको दान देता था ॥ ३४ ॥

पयस्विनीनामथ रोहिणीनां तथैवान्याननडुहो लोकनाथ । प्रादां नित्यं ब्राह्मणेभ्यः सुरेश नेहागतस्तेन फलेन चाहम् ॥ ३५ ॥ लोकनाथ! सुरेश्वर! इनके अतिरिक्त रोहिणी (कपिला) जातिकी बहुत-सी दुधारू गौएँ तथा बहुसंख्यक साँड़ भी मैं प्रतिदिन ब्राह्मणोंको दान करता था; परंतु उन सब दानोंके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥

त्रिंशदग्नीनहं ब्रह्मन्नयजं यच्च नित्यदा । अष्टाभिः सर्वमेधैश्च नरमेधैश्च सप्तभिः ॥ ३६ ॥ दशभिर्विश्वजिद्भिश्च शतैरष्टादशोत्तरैः । न चैव तेषां देवेश फलेनाहमिहागमम् ॥ ३७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने प्रतिदिन एक-एक करके तीस बार अग्निचयन एवं यजन किया। आठ बार सर्वमेध, सात बार नरमेध और एक सौ अट्ठाईस बार विश्वजित् यज्ञ किया है; परंतु देवेश्वर! उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३६-३७ ॥

सरय्वां बाहुदायां च गङ्गायामथ नैमिषे । गवां शतानामयुतमददं न च तेन वै ॥ ३८ ॥ सरयू, बाहुदा, गंगा और नैमिषारण्य तीर्थमें जाकर मैंने दस लाख गोदान किये हैं; परंतु उनके फलसे भी यहाँ आना नहीं हुआ है (केवल अनशनव्रतके प्रभावसे मुझे इस दुर्लभ लोककी प्राप्ति हुई है) ॥ ३८ ॥

इन्द्रेण गुह्यं निहितं वै गुहायां यद्गार्गवस्तपसेहाभ्यविन्दत् ।

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