महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 910, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजाज्वल्यमानमुशनस्तेजसेह तत्सादयामासमहं वरेण्य ।। ३९ ।। पहले इन्द्रने स्वयं अनशनव्रतका अनुष्ठान करके इसे गुप्त रखा था। उसके बाद शुक्राचार्यने तपस्याके द्वारा उसका ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्हींके तेजसे उसका माहात्म्य सर्वत्र प्रकाशित हुआ। सर्वश्रेष्ठ पितामह! मैंने भी अंतमें उसी अनशनव्रतका साधन आरम्भ किया ।।
ततो मे ब्राह्मणास्तुष्टास्तस्मिन् कर्मणि साधिते । सहस्रमृषयश्चासन् ये वै तत्र समागताः ।। ४० ।। उक्तस्तैरस्मि गच्छ त्वं ब्रह्मलोकमिति प्रभो । प्रीतेनोक्तसहस्रेण ब्राह्मणानामहं प्रभो । इमं लोकमनुप्राप्तो मा भूत् तेऽत्र विचारणा ।। ४१ ।। जब उस कर्मकी पूर्ति हुई, उस समय मेरे पास हजारों ब्राह्मण और ऋषि पधारे। वे सभी मुझपर बहुत संतुष्ट थे। प्रभो! उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुझे आज्ञा दी कि 'तुम ब्रह्मलोकको जाओ।' भगवन्! प्रसन्न हुए उन हजारों ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे मैं इस लोकमें आया हूँ। इसमें आप कोई अन्यथा विचार न करें ।। ४०-४१ ।।
कामं यथावद्विहितं विधात्रा पृष्टेन वाच्यं तु मया यथावत् । तपो हि नान्यच्चानशनान्मतं मे नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।। ४२ ।। देवेश्वर! मैंने अपनी इच्छाके अनुसार विधिपूर्वक अनशनव्रतका पालन किया। आप सम्पूर्ण जगत्के विधाता हैं। आपके पूछनेपर मुझे सब बातें यथावत्रूपसे बतानी चाहिये, इसलिये सब कुछ कहा है। मेरी समझमें अनशनव्रतसे बढ़कर दूसरी कोई तपस्या नहीं है। आपको नमस्कार है, आप मुझपर प्रसन्न होइये ।। ४२ ।।
भीष्म उवाच
इत्युक्तवन्तं ब्रह्मा तु राजानं स भगीरथम् । पूजयामास पूजार्हं विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ४३ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! राजा भगीरथने जब इस प्रकार कहा, तब ब्रह्माजीने शास्त्रोक्त विधिसे आदरणीय नरेशका विशेष आदर-सत्कार किया ।। ४३ ।।
तस्मादनशनैर्युक्तो विप्रान् पूजय नित्यदा । विप्राणां वचनात् सर्वं परत्रेह च सिध्यति ।। ४४ ।। अतः तुम भी अनशनव्रतसे युक्त होकर सदा ब्राह्मणोंका पूजन करो; क्योंकि ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे इह लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध होती हैं ।।