महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 929, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्जनीयाश्चैव नित्यं सक्तवो निशि भारत ॥ १२० ॥
शेषाणि चैव पानानि पानीयं चापि भोजने ।
भरतनन्दन! रातमें सत्तू खाना सर्वथा वर्जित है। अन्न-भोजनके पश्चात् जो पीनेयोग्य पदार्थ और जल शेष रह जाते हैं, उनका भी त्याग कर देना चाहिये ॥
सौहित्यं न च कर्तव्यं रात्रौ न च समाचरेत् ॥ १२१ ॥
द्विजच्छेदं न कुर्वीत भुक्त्वा न च समाचरेत् ।
रातमें न स्वयं डटकर भोजन करे और न दूसरेको ही डटकर भोजन करावे। भोजन करके दौड़े नहीं। ब्राह्मणोंका वध कभी न करे ॥ १२१ १/२ ॥
महाकुले प्रसूतां च प्रशस्तां लक्षणैस्तथा ॥ १२२ ॥
वयःस्थां च महाप्राज्ञः कन्यामावोढुमर्हति ।
जो श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुई हो, उत्तम लक्षणोंसे प्रशंसित हो तथा विवाहके योग्य अवस्थाको प्राप्त हो गयी हो, ऐसी सुलक्षणा कन्याके साथ श्रेष्ठ बुद्धिमान् पुरुष विवाह करे ॥ १२२ १/२ ॥
अपत्यमुत्पाद्य ततः प्रतिष्ठाप्य कुलं तथा ॥ १२३ ॥
पुत्राः प्रदेया ज्ञानेषु कुलधर्मेषु भारत ।
भारत! उसके गर्भसे संतान उत्पन्न करके वंश-परम्पराको प्रतिष्ठित करे और ज्ञान तथा कुलधर्मकी शिक्षा पानेके लिये पुत्रोंको गुरुके आश्रममें भेज दे ॥
कन्या चोत्पाद्य दातव्या कुलपुत्राय धीमते ॥ १२४ ॥
पुत्रा निवेश्याश्च कुलाद् भृत्या लभ्याश्च भारत ।
भरतनन्दन! यदि कन्या उत्पन्न करे तो बुद्धिमान् एवं कुलीन वरके साथ उसका ब्याह कर दे। पुत्रका विवाह भी उत्तम कुलकी कन्याके साथ करे और भृत्य भी उत्तम कुलके मनुष्योंको ही बनावे ॥ १२४ १/२ ॥
शिरःस्नातोऽथ कुर्वीत दैवं पित्र्यमथापि च ॥ १२५ ॥
नक्षत्रे न च कुर्वीत यस्मिन् जातो भवेन्नरः ।
न प्रोष्ठपदयोः कार्यं तथाग्नेये च भारत ॥ १२६ ॥
भारत! मस्तकपरसे स्नान करके देवकार्य तथा पितृकार्य करे। जिस नक्षत्रमें अपना जन्म हुआ हो उसमें एवं पूर्वा और उत्तरा दोनों भाद्रपदाओंमें तथा कृत्तिका नक्षत्रमें भी श्राद्धका निषेध है ॥ १२५-१२६ ॥
दारुणेषु च सर्वेषु प्रत्यरिं च विवर्जयेत् ।
ज्योतिषे यानि चोक्तानि तानि सर्वाणि वर्जयेत् ॥ १२७ ॥
(आश्लेषा, आर्द्रा, ज्येष्ठा और मूल आदि) सम्पूर्ण दारुण नक्षत्रों और प्रत्यरिताराका* भी परित्याग कर देना चाहिये। सारांश यह है कि ज्योतिष-शास्त्रके भीतर जिन-जिन