महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 928, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंफूलकी लता, शुद्ध जल, सोना और चाँदी—इन सब वस्तुओंका घरमें रहना मंगल-कारक है ।। ११३ ।।
उद्दीपकाश्च गृध्राश्च कपोता भ्रमरास्तथा । निविशेयुर्यदा तत्र शान्तिमेव तदाऽऽचरेत् । अमंगल्यानि चैतानि तथाक्रोशो महात्मनाम् ।। ११४ ।। उद्दीपक, गीध, कपोत (जंगली कबूतर) और भ्रमर नामक पक्षी यदि कभी घरमें आ जायँ तो सदा उसकी शान्ति ही करानी चाहिये; क्योंकि ये अमंगलकारी होते हैं। महात्माओंकी निन्दा भी मनुष्यका अकल्याण करनेवाली है ।। ११४ ।।
महात्मनोऽतिगुह्यानि न वक्तव्यानि कर्हिचित् । अगम्याश्च न गच्छेत राज्ञः पत्नीं सखीस्तथा ।। ११५ ।। महात्मा पुरुषोंके गुप्त कर्म कहीं किसीपर प्रकट नहीं करने चाहिये। परायी स्त्रियाँ सदा अगम्य होती हैं, उनके साथ कभी समागम न करे। राजाकी पत्नी और सखियोंके पास भी कभी न जाय ।। ११५ ।।
वैद्यानां बालवृद्धानां भृत्यानां च युधिष्ठिर । बन्धूनां ब्राह्मणानां च तथा शारणिकस्य च ।। ११६ ।। सम्बन्धिनां च राजेन्द्र तथाऽऽयुर्विन्दते महत् । राजेन्द्र युधिष्ठिर! वैद्यों, बालकों, वृद्धों, भृत्यों, बन्धुओं, ब्राह्मणों, शरणार्थियों तथा सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंके पास कभी न जाय। ऐसा करनेसे दीर्घायु प्राप्त होती है ।। ११६ १/२ ।।
ब्राह्मणस्थपतिभ्यां च निर्मितं यन्निवेशनम् ।। ११७ ।। तदावसेत् सदा प्राज्ञो भवार्थी मनुजेश्वर । मनुजेश्वर! अपनी उन्नति चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको उचित है कि ब्राह्मणके द्वारा वास्तुपूजनपूर्वक आरम्भ कराये और अच्छे कारीगरके द्वारा बनाये हुए घरमें सदा निवास करे ।। ११७ १/२ ।।
संध्यायां न स्वपेद् राजन् विद्यां न च समाचरेत् ।। ११८ ।। न भुञ्जीत च मेधावी तथायुर्विन्दते महत् । राजन्! बुद्धिमान् पुरुष सायंकालमें गोधूलिकी वेलामें न तो सोये, न विद्या पढ़े और न भोजन ही करे। ऐसा करनेसे वह बड़ी आयुको प्राप्त होता है ।। ११८ १/२ ।।
नक्तं न कुर्यात् पित्र्याणि भुक्त्वा चैव प्रसाधनम् ।। ११९ ।। पानीयस्य क्रिया नक्तं न कार्या भूतिमिच्छता । अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको रातमें श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिये। भोजन करके केशोंका संस्कार (क्षौरकर्म) भी नहीं करना चाहिये तथा रातमें जलसे स्नान करना भी उचित नहीं है ।। ११९ १/२ ।।