महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
फूलकी लता, शुद्ध जल, सोना और चाँदी—इन सब वस्तुओंका घरमें रहना मंगल-कारक है ।। ११३ ।।
उद्दीपकाश्च गृध्राश्च कपोता भ्रमरास्तथा । निविशेयुर्यदा तत्र शान्तिमेव तदाऽऽचरेत् । अमंगल्यानि चैतानि तथाक्रोशो महात्मनाम् ।। ११४ ।। उद्दीपक, गीध, कपोत (जंगली कबूतर) और भ्रमर नामक पक्षी यदि कभी घरमें आ जायँ तो सदा उसकी शान्ति ही करानी चाहिये; क्योंकि ये अमंगलकारी होते हैं। महात्माओंकी निन्दा भी मनुष्यका अकल्याण करनेवाली है ।। ११४ ।।
महात्मनोऽतिगुह्यानि न वक्तव्यानि कर्हिचित् । अगम्याश्च न गच्छेत राज्ञः पत्नीं सखीस्तथा ।। ११५ ।। महात्मा पुरुषोंके गुप्त कर्म कहीं किसीपर प्रकट नहीं करने चाहिये। परायी स्त्रियाँ सदा अगम्य होती हैं, उनके साथ कभी समागम न करे। राजाकी पत्नी और सखियोंके पास भी कभी न जाय ।। ११५ ।।
वैद्यानां बालवृद्धानां भृत्यानां च युधिष्ठिर । बन्धूनां ब्राह्मणानां च तथा शारणिकस्य च ।। ११६ ।। सम्बन्धिनां च राजेन्द्र तथाऽऽयुर्विन्दते महत् । राजेन्द्र युधिष्ठिर! वैद्यों, बालकों, वृद्धों, भृत्यों, बन्धुओं, ब्राह्मणों, शरणार्थियों तथा सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंके पास कभी न जाय। ऐसा करनेसे दीर्घायु प्राप्त होती है ।। ११६ १/२ ।।
ब्राह्मणस्थपतिभ्यां च निर्मितं यन्निवेशनम् ।। ११७ ।। तदावसेत् सदा प्राज्ञो भवार्थी मनुजेश्वर । मनुजेश्वर! अपनी उन्नति चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको उचित है कि ब्राह्मणके द्वारा वास्तुपूजनपूर्वक आरम्भ कराये और अच्छे कारीगरके द्वारा बनाये हुए घरमें सदा निवास करे ।। ११७ १/२ ।।
संध्यायां न स्वपेद् राजन् विद्यां न च समाचरेत् ।। ११८ ।। न भुञ्जीत च मेधावी तथायुर्विन्दते महत् । राजन्! बुद्धिमान् पुरुष सायंकालमें गोधूलिकी वेलामें न तो सोये, न विद्या पढ़े और न भोजन ही करे। ऐसा करनेसे वह बड़ी आयुको प्राप्त होता है ।। ११८ १/२ ।।
नक्तं न कुर्यात् पित्र्याणि भुक्त्वा चैव प्रसाधनम् ।। ११९ ।। पानीयस्य क्रिया नक्तं न कार्या भूतिमिच्छता । अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको रातमें श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिये। भोजन करके केशोंका संस्कार (क्षौरकर्म) भी नहीं करना चाहिये तथा रातमें जलसे स्नान करना भी उचित नहीं है ।। ११९ १/२ ।।
वर्जनीयाश्चैव नित्यं सक्तवो निशि भारत ॥ १२० ॥
शेषाणि चैव पानानि पानीयं चापि भोजने ।
भरतनन्दन! रातमें सत्तू खाना सर्वथा वर्जित है। अन्न-भोजनके पश्चात् जो पीनेयोग्य पदार्थ और जल शेष रह जाते हैं, उनका भी त्याग कर देना चाहिये ॥
सौहित्यं न च कर्तव्यं रात्रौ न च समाचरेत् ॥ १२१ ॥
द्विजच्छेदं न कुर्वीत भुक्त्वा न च समाचरेत् ।
रातमें न स्वयं डटकर भोजन करे और न दूसरेको ही डटकर भोजन करावे। भोजन करके दौड़े नहीं। ब्राह्मणोंका वध कभी न करे ॥ १२१ १/२ ॥
महाकुले प्रसूतां च प्रशस्तां लक्षणैस्तथा ॥ १२२ ॥
वयःस्थां च महाप्राज्ञः कन्यामावोढुमर्हति ।
जो श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुई हो, उत्तम लक्षणोंसे प्रशंसित हो तथा विवाहके योग्य अवस्थाको प्राप्त हो गयी हो, ऐसी सुलक्षणा कन्याके साथ श्रेष्ठ बुद्धिमान् पुरुष विवाह करे ॥ १२२ १/२ ॥
अपत्यमुत्पाद्य ततः प्रतिष्ठाप्य कुलं तथा ॥ १२३ ॥
पुत्राः प्रदेया ज्ञानेषु कुलधर्मेषु भारत ।
भारत! उसके गर्भसे संतान उत्पन्न करके वंश-परम्पराको प्रतिष्ठित करे और ज्ञान तथा कुलधर्मकी शिक्षा पानेके लिये पुत्रोंको गुरुके आश्रममें भेज दे ॥
कन्या चोत्पाद्य दातव्या कुलपुत्राय धीमते ॥ १२४ ॥
पुत्रा निवेश्याश्च कुलाद् भृत्या लभ्याश्च भारत ।
भरतनन्दन! यदि कन्या उत्पन्न करे तो बुद्धिमान् एवं कुलीन वरके साथ उसका ब्याह कर दे। पुत्रका विवाह भी उत्तम कुलकी कन्याके साथ करे और भृत्य भी उत्तम कुलके मनुष्योंको ही बनावे ॥ १२४ १/२ ॥
शिरःस्नातोऽथ कुर्वीत दैवं पित्र्यमथापि च ॥ १२५ ॥
नक्षत्रे न च कुर्वीत यस्मिन् जातो भवेन्नरः ।
न प्रोष्ठपदयोः कार्यं तथाग्नेये च भारत ॥ १२६ ॥
भारत! मस्तकपरसे स्नान करके देवकार्य तथा पितृकार्य करे। जिस नक्षत्रमें अपना जन्म हुआ हो उसमें एवं पूर्वा और उत्तरा दोनों भाद्रपदाओंमें तथा कृत्तिका नक्षत्रमें भी श्राद्धका निषेध है ॥ १२५-१२६ ॥
दारुणेषु च सर्वेषु प्रत्यरिं च विवर्जयेत् ।
ज्योतिषे यानि चोक्तानि तानि सर्वाणि वर्जयेत् ॥ १२७ ॥
(आश्लेषा, आर्द्रा, ज्येष्ठा और मूल आदि) सम्पूर्ण दारुण नक्षत्रों और प्रत्यरिताराका* भी परित्याग कर देना चाहिये। सारांश यह है कि ज्योतिष-शास्त्रके भीतर जिन-जिन
नक्षत्रोंमें श्राद्धका निषेध किया गया है, उन सबमें देवकार्य और पितृकार्य नहीं करना चाहिये ॥ १२७ ॥
प्राङ्मुखः श्मश्रुकर्माणि कारयेत् सुसमाहितः ।
उदङ्मुखो वा राजेन्द्र तथायुर्विन्दते महत् ॥ १२८ ॥
राजेन्द्र! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके हजामत बनवाये, ऐसा करनेसे बड़ी आयु प्राप्त होती है ॥ १२८ ॥
(सतां गुरूणां वृद्धानां कुलस्त्रीणां विशेषतः ।)
परिवादं न च ब्रूयात् परेषामात्मनस्तथा ।
परिवादो ह्यधर्म्याय प्रोच्यते भरतर्षभ ॥ १२९ ॥
भरतश्रेष्ठ! सत्पुरुषों, गुरुजनों, वृद्धों और विशेषतः कुलांगनाओंकी, दूसरे लोगोंकी और अपनी भी निन्दा न करे; क्योंकि निन्दा करना अधर्मका हेतु बताया गया है ॥ १२९ ॥
वर्जयेद् व्यङ्गिनीं नारीं तथा कन्यां नरोत्तम ।
समार्षां व्यङ्गितां चैव मातुः स्वकुलजां तथा ॥ १३० ॥
नरश्रेष्ठ! जो कन्या किसी अंगसे हीन हो अथवा जो अधिक अंगवाली हो, जिसके गोत्र और प्रवर अपने ही समान हो तथा जो माताके कुलमें (नानाके वंशमें) उत्पन्न हुई हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये ॥ १३० ॥
वृद्धां प्रव्रजितां चैव तथैव च पतिव्रताम् ।
तथा निकृष्टवर्णां च वर्णोत्कृष्टां च वर्जयेत् ॥ १३१ ॥
जो बूढ़ी, संन्यासिनी, पतिव्रता, नीच वर्णकी तथा ऊँचे वर्णकी स्त्री हो, उसके सम्पर्कसे दूर रहना चाहिये ॥
अयोनिं च वियोनिं च न गच्छेत विचक्षणः ।
पिंगलां कुष्ठिनीं नारीं न त्वमुद्वोढुमर्हसि ॥ १३२ ॥
जिसकी योनि अर्थात् कुलका पता न हो तथा जो नीच कुलमें पैदा हुई हो, उसके साथ विद्वान् पुरुष समागम न करे। युधिष्ठिर! जिसके शरीरका रंग पीला हो तथा जो कुष्ठ रोगवाली हो, उसके साथ तुम्हें विवाह नहीं करना चाहिये ॥ १३२ ॥
अपस्मारिकुले जातां निहीनां चापि वर्जयेत् ।
श्वित्रिणां च कुले जातां क्षयिणां मनुजेश्वर ॥ १३३ ॥
नरेश्वर! जो मृगीरोगसे दूषित कुलमें उत्पन्न हुई हो, नीच हो, सफेद कोढ़वाले और राजयक्ष्माके रोगी मनुष्यके कुलमें पैदा हुई हो, उसको भी त्याग देना चाहिये ॥ १३३ ॥
लक्षणैरन्विता या च प्रशस्ता या च लक्षणैः ।
मनोज्ञां दर्शनीयां च तां भवान् वोढुमर्हति ॥ १३४ ॥
जो उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ आचरणोंद्वारा प्रशंसित, मनोहारिणी तथा दर्शनीय हो, उसीके साथ तुम्हें विवाह करना चाहिये ॥ १३४ ॥
महाकुले निवेष्टव्यं सदृशे वा युधिष्ठिर । अवरा पतिता चैव न ग्राह्या भूतिमिच्छता ॥ १३५ ॥ युधिष्ठिर! अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अपनी अपेक्षा महान् या समान कुलमें विवाह करना चाहिये। नीच जातिवाली तथा पतिता कन्याका पाणिग्रहण कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १३५ ॥
अग्नीनुत्पाद्य यत्नेन क्रियाः सुविहिताश्च याः । वेदे च ब्राह्मणैः प्रोक्तास्ताश्च सर्वाः समाचरेत् ॥ १३६ ॥ (अरणी-मन्थनद्वारा) अग्निका उत्पादन एवं स्थापन करके ब्राह्मणोंद्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण वेदविहित क्रियाओंका यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १३६ ॥
न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या रक्ष्या दाराश्च सर्वशः । अनायुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्यां विवर्जयेत् ॥ १३७ ॥ सभी उपायोंसे अपनी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंसे ईर्ष्या रखना उचित नहीं है। ईर्ष्या करनेसे आयु क्षीण होती है। इसलिये उसे त्याग देना ही उचित है ॥ १३७ ॥
अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता । प्रगे निशामाशु तथा नैवोच्छिष्टाः स्वपन्ति वै ॥ १३८ ॥ दिनमें एवं सूर्योदयके पश्चात् शयन आयुको क्षीण करनेवाला है। प्रातःकाल एवं रात्रिके आरम्भमें नहीं सोना चाहिये। अच्छे लोग रातमें अपवित्र होकर नहीं सोते हैं ॥ १३८ ॥
पारदार्यमनायुष्यं नापितोच्छिष्टता तथा । यत्नतो वै न कर्तव्यमभ्यासश्चैव भारत ॥ १३९ ॥ परस्त्रीसे व्यभिचार करना और हजामत बनवाकर बिना नहाये रह जाना भी आयुका नाश करनेवाला है। भारत! अपवित्रावस्थामें वेदोंका अध्ययन यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये ॥ १३९ ॥
संध्यायां च न भुञ्जीत न स्नायेन्न तथा पठेत् । प्रयतश्च भवेत् तस्यां न च किंचित् समाचरेत् ॥ १४० ॥ संध्याकालमें स्नान, भोजन और स्वाध्याय कुछ भी न करे। उस बेलामें शुद्ध चित्त होकर ध्यान एवं उपासना करनी चाहिये। दूसरा कोई कार्य नहीं करना चाहिये ॥ १४० ॥
ब्राह्मणान् पूजयेच्चापि तथा स्नात्वा नराधिप । देवांश्च प्रणमेत् स्नातो गुरूंश्चाप्यभिवादयेत् ॥ १४१ ॥ नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पूजा, देवताओंको नमस्कार और गुरुजनोंको प्रणाम स्नानके बाद ही करने चाहिये ॥
अनिमन्त्रितो न गच्छेत यज्ञं गच्छेत दर्शकः । अनर्चिते ह्यानायुष्यं गमनं तत्र भारत ॥ १४२ ॥
बिना बुलाये कहीं भी न जाय, परंतु यज्ञ देखनेके लिये मनुष्य बिना बुलाये भी जा सकता है। भारत! जहाँ अपना आदर न होता हो, वहाँ जानेसे आयुका नाश होता है ॥ १४२ ॥
न चैकेन परिव्रज्यं न गन्तव्यं तथा निशि ।
अनागतायां संध्यायां पश्चिमायां गृहे वसेत् ॥ १४३ ॥
अकेले परदेश जाना और रातमें यात्रा करना मना है। यदि किसी कामके लिये बाहर जाय तो संध्या होनेके पहले ही घर लौट आना चाहिये ॥ १४३ ॥
मातुः पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम् ।
हितं चाप्यहितं चापि न विचार्यं नरर्षभ ॥ १४४ ॥
नरश्रेष्ठ! माता-पिता और गुरुजनोंकी आज्ञाका अविलम्ब पालन करना चाहिये। इनकी आज्ञा हितकर है या अहितकर, इसका विचार नहीं करना चाहिये ॥
धनुर्वेदे च वेदे च यत्नः कार्यो नराधिप ।
हस्तिपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह ॥ १४५ ॥
यत्नवान् भव राजेन्द्र यत्नवान् सुखमेधते ।
अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च ॥ १४६ ॥
नरेश्वर! क्षत्रियको धनुर्वेद और वेदाध्ययनके लिये यत्न करना चाहिये। राजेन्द्र! तुम हाथी-घोड़ेकी सवारी और रथ हाँकनेकी कलामें निपुणता प्राप्त करनेके लिये प्रयत्नशील बनो, क्योंकि यत्न करनेवाला पुरुष सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। वह शत्रुओं, स्वजनों और भृत्योंके लिये दुर्धर्ष हो जाता है ॥ १४५-१४६ ॥
प्रजापालनयुक्तश्च न क्षतिं लभते क्वचित् ।
युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत ॥ १४७ ॥
जो राजा सदा प्रजाके पालनमें तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती। भरतनन्दन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १४७ ॥
गान्धर्वशास्त्रं च कलाः परिज्ञेया नराधिप ।
पुराणमितिहासाश्च तथाख्यानानि यानि च ॥ १४८ ॥
महात्मनां च चरितं श्रोतव्यं नित्यमेव ते ।
नरेश्वर! गान्धर्वशास्त्र (संगीत) और समस्त कलाओंका ज्ञान प्राप्त करना भी तुम्हारे लिये आवश्यक है। तुम्हें प्रतिदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओंके चरित्रका श्रवण करना चाहिये ॥ १४८½ ॥
(मान्यानां माननं कुर्यान्निन्द्यानां निन्दनं तथा ।
गोब्राह्मणार्थे युध्येत प्राणानपि परित्यजेत् ॥)
राजा माननीय पुरुषोंका सम्मान और निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा करे। वह गौओं तथा ब्राह्मणोंके लिये युद्ध करे। उनकी रक्षाके लिये आवश्यकता हो तो प्राणोंको भी निछावर कर
दे ।।
पत्नी रजस्वला या च नाभिगच्छेन्न चाह्वयेत् ॥ १४९ ॥
स्नातां चतुर्थे दिवसे रात्रौ गच्छेद् विचक्षणः ।
पञ्चमे दिवसे नारी षष्ठेऽहनि पुमान् भवेत् ॥ १५० ॥
अपनी पत्नी भी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय और न उसे ही अपने पास बुलाये। जब चौथे दिन वह स्नान कर ले, तब रातमें बुद्धिमान् पुरुष उसके पास जाय। पाँचवें दिन गर्भाधान करनेसे कन्याकी उत्पत्ति होती है और छठे दिन पुत्रकी अर्थात् समरात्रिमें गर्भाधानसे पुत्रका और विषमरात्रिमें गर्भाधान होनेसे कन्याका जन्म होता है ॥ १४९-१५० ॥
एतेन विधिना पत्नीमुपगच्छेत् पण्डितः ।
ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणि पूजनीयानि सर्वशः ॥ १५१ ॥
इसी विधिसे विद्वान् पुरुष पत्नीके साथ समागम करे। भाई-बन्धु, सम्बन्धी और मित्र—इन सबका सब प्रकारसे आदर करना चाहिये ॥ १५१ ॥
यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
अत ऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप ॥ १५२ ॥
अपनी शक्तिके अनुसार भाँति-भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये। नरेश्वर! तदनन्तर गार्हस्थ्यकी अवधि समाप्त हो जानेपर वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए वनमें निवास करना चाहिये ॥ १५२ ॥
एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तितः ।
शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ॥ १५३ ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुमसे आयुकी वृद्धि करनेवाले नियमोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो नियम बाकी रह गये हैं, उन्हें तुम तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछकर जान लेना ॥ १५३ ॥
आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १५४ ॥
सदाचार ही कल्याणका जनक और सदाचार ही कीर्तिको बढ़ानेवाला है। सदाचारसे आयुकी वृद्धि होती है और सदाचार ही बुरे लक्षणोंका नाश करता है ॥ १५४ ॥
आगमानां हि सर्वेषामाचारः श्रेष्ठ उच्यते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मादायुर्र्विवर्धते ॥ १५५ ॥
सम्पूर्ण आगमोंमें सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है। सदाचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मसे आयु बढ़ती है ॥ १५५ ॥
एतद् यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
अनुकम्प्य सर्ववर्णान् ब्रह्मणा समुदाहृतम् ॥ १५६ ॥
पूर्वकालमें सब वर्णोंके लोगोंपर दया करके ब्रह्माजीने यह सदाचार धर्मका उपदेश दिया था। यह यश, आयु और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा कल्याणका परम आधार है ।। १५६ ।।
(य इमं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
स शुभान् प्राप्नुते लोकान् सदाचारव्रतान्नृप ॥)
नरेश्वर! जो प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनता और कहता है, वह सदाचार-व्रतके प्रभावसे शुभ लोकोंमें जाता है ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आयुष्याख्याने
चतुरधिकशततमोऽध्यायः ।। १०४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें आयु बढ़ानेवाले साधनोंका वर्णनविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १६५ १/३ श्लोक हैं)
* अपने जन्मनक्षत्रसे वर्तमान नक्षत्रतक गिने, गिननेपर जितनी संख्या हो उसमें नौका भाग दे। यदि पाँच शेष रहे तो उस दिनके नक्षत्रको प्रत्यरि तारा समझे।
बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
यथा ज्येष्ठः कनिष्ठेषु वर्तेत भरतर्षभ ।
कनिष्ठाश्च यथा ज्येष्ठे वर्तेरंस्तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! बड़ा भाई अपने छोटे भाइयोंके साथ कैसा बर्ताव करे? और छोटे भाइयोंका बड़े भाईके साथ कैसा बर्ताव होना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
ज्येष्ठवत् तात वर्तस्व ज्येष्ठोऽसि सततं भवान् ।
गुरोर्गरीयसी वृत्तिर्या च शिष्यस्य भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— तात भरतनन्दन! तुम अपने भाइयोंमें सबसे बड़े हो; अतः सदा बड़ेके अनुरूप ही बर्ताव करो। गुरुको अपने शिष्यके प्रति जैसा गौरवयुक्त बर्ताव होता है, वैसा ही तुम्हें भी अपने भाइयोंके साथ करना चाहिये ॥ २ ॥
न गुरावकृतप्रज्ञे शक्यं शिष्येण वर्तितुम् ।
गुरोर्हि दीर्घदर्शित्वं यत् तच्छिष्यस्य भारत ॥ ३ ॥
यदि गुरु अथवा बड़े भाईका विचार शुद्ध न हो तो शिष्य या छोटे भाई उसकी आज्ञाके अधीन नहीं रह सकते। भारत! बड़ेके दीर्घदर्शी होनेपर छोटे भाई भी दीर्घदर्शी होते हैं ॥ ३ ॥
अन्धः स्यादन्धवेलायां जडः स्यादपि वा बुधः ।
परिहारेण तद् ब्रूयाद् यस्तेषां स्याद् व्यतिक्रमः ॥ ४ ॥
बड़े भाईको चाहिये कि वह अवसरके अनुसार अन्ध, जड़ और विद्वान् बने अर्थात् यदि छोटे भाइयोंसे कोई अपराध हो जाय तो उसे देखते हुए भी न देखे। जानकर भी अनजान बना रहे और उनसे ऐसी बात करे, जिससे उनकी अपराध करनेकी प्रवृत्ति दूर हो जाय ॥ ४ ॥
प्रत्यक्षं भिन्नहृदया भेदयेयुः कृतं नराः ।
श्रियाभितप्ताः कौन्तेय भेदकामास्तथारयः ॥ ५ ॥
यदि बड़ा भाई प्रत्यक्षरूपसे अपराधका दण्ड देता है तो उसके छोटे भाइयोंका हृदय छिन्न-भिन्न हो जाता है और वे उस दुर्व्यवहारका लोगोंमें प्रचार कर देते हैं, तब उनके
ऐश्वर्यको देखकर जलनेवाले कितने ही शत्रु उनमें मतभेद पैदा करनेकी इच्छा करने लगते हैं॥ ५ ॥
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः। हन्ति सर्वमपि ज्येष्ठः कुलं यत्रावजायते ॥ ६ ॥ जेठा भाई अपनी अच्छी नीतिसे कुलको उन्नतिशील बनाता है; किंतु यदि वह कुनीतिका आश्रय लेता है तो उसे विनाशके गर्तमें डाल देता है! जहाँ बड़े भाईका विचार खोटा हुआ, वहाँ वह जिसमें उत्पन्न हुआ है, अपने उस समस्त कुलको ही चौपट कर देता है॥ ६ ॥
अथ यो विनिकुर्वीत ज्येष्ठो भ्राता यवीयसः। अज्येष्ठः स्यादभागश्च नियम्यो राजभिश्च सः ॥ ७ ॥ जो बड़ा भाई होकर छोटे भाइयोंके साथ कुटिलतापूर्ण बर्ताव करता है, वह न तो ज्येष्ठ कहलाने योग्य है और न ज्येष्ठांश पानेका ही अधिकारी है। उसे तो राजाओंके द्वारा दण्ड मिलना चाहिये॥ ७ ॥
निकृती हि नरो लोकान् पापान् गच्छत्यसंशयम्। विदुलस्येव तत् पुष्पं मोघं जनयितुः स्मृतम् ॥ ८ ॥ कपट करनेवाला मनुष्य निःसंदेह पापमय लोकों (नरक)-में जाता है। उसका जन्म पिताके लिये बेतके फूलकी भाँति निरर्थक ही माना गया है॥ ८ ॥
सर्वानर्थः कुले यत्र जायते पापपूरुषः। अकीर्तिं जनयत्येव कीर्तिमन्तर्दधाति च ॥ ९ ॥ जिस कुलमें पापी पुरुष जन्म लेता है, उसके लिये वह सम्पूर्ण अनर्थोंका कारण बन जाता है। पापात्मा मनुष्य कुलमें कलंक लगाता और उसके सुयशका नाश करता है॥ ९ ॥
सर्वे चापि विकर्मस्था भागं नार्हन्ति सोदराः। नाप्रदाय कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतकम् ॥ १० ॥ यदि छोटे भाई भी पापकर्ममें लगे रहते हों तो वे पैतृक धनका भाग पानेके अधिकारी नहीं हैं। छोटे भाइयोंको उनका उचित भाग दिये बिना बड़े भाईको पैतृक-सम्पत्तिका भाग ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ १० ॥
अनुपघ्नन् पितुर्दायं जङ्घाश्रमफलोऽध्वगः। स्वयमीहितलब्धं तु नाकामौ दातुमर्हति ॥ ११ ॥ यदि बड़ा भाई पैतृक धनको हानि पहुँचाये बिना ही केवल जाँघोंके परिश्रमसे परदेशमें जाकर धन पैदा करे तो वह उसके निजी परिश्रमकी कमाई है। अतः यदि उसकी इच्छा न हो तो वह उस धनमेंसे भाइयोंको नहीं दे सकता है॥ ११ ॥
भ्रातॄणामविभक्तानामुत्थानमपि चेत् सह।
न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात् कदाचन ॥ १२ ॥
यदि भाइयोंके हिस्सेका बटवारा न हुआ हो और सबने साथ-ही-साथ व्यापार आदिके द्वारा धनकी उन्नति की हो, उस अवस्थामें यदि पिताके जीते-जी सब अलग होना चाहें तो पिताको उचित है कि वह कभी किसीको कम और किसीको अधिक धन न दे अर्थात् वह सब पुत्रोंको बराबर-बराबर हिस्सा दे ॥ १२ ॥
न ज्येष्ठो वावमन्येत दुष्कृतः सुकृतोऽपि वा ।
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयश्चेत् तत् तदाचरेत् ॥ १३ ॥
धर्मं हि श्रेय इत्याहुरिति धर्मविदो जनाः ।
बड़ा भाई अच्छा काम करनेवाला हो या बुरा, छोटेको उसका अपमान नहीं करना चाहिये। इसी तरह यदि स्त्री अथवा छोटे भाई बुरे रास्तेपर चल रहे हों तो श्रेष्ठ पुरुषको जिस तरहसे भी उनकी भलाई हो, वही उपाय करना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषोंका कहना है कि धर्म ही कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन है ॥ १३ १/२ ॥
दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान् पिता दश ॥ १४ ॥
दश चैव पितॄन् माता सर्वां वा पृथिवीमपि ।
गौरवेणाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः ॥ १५ ॥
गौरवमें दस आचार्योंसे बढ़कर उपाध्याय, दस उपाध्यायोंसे बढ़कर पिता और दस पिताओंसे बढ़कर माता है। माता अपने गौरवसे समूची पृथिवीको भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥ १४-१५ ॥
माता गरीयसी यच्च तेनैतां मन्यते जनः ।
ज्येष्ठो भ्राता पितृसमो मृते पितरि भारत ॥ १६ ॥
भरतनन्दन! माताका गौरव सबसे बढ़कर है, इसलिये लोग उसका विशेष आदर करते हैं। भारत! पिताकी मृत्यु हो जानेपर बड़े भाईको ही पिताके समान समझना चाहिये ॥ १६ ॥
स ह्येषां वृत्तिदाता स्यात् स चैतान् प्रतिपालयेत् ।
कनिष्ठास्तं नमस्येरन् सर्वे छन्दानुवर्तिनः ॥ १७ ॥
तमेव चोपजीवेरन् यथैव पितरं तथा ।
बड़े भाईको उचित है कि वह अपने छोटे भाइयोंको जीविका प्रदान करे तथा उनका पालन-पोषण करे। छोटे भाइयोंका भी कर्तव्य है कि वे सब-के-सब बड़े भाईके सामने नतमस्तक हों और उसकी इच्छाके अनुसार चलें। बड़े भाईको ही पिता मानकर उनके आश्रयमें जीवन व्यतीत करें ॥ १७ १/२ ॥
शरीरमेतौ सृजतः पिता माता च भारत ॥ १८ ॥
आचार्यशास्ता या जातिः सा सत्या साजरामरा ।
भारत! पिता और माता केवल शरीरकी सृष्टि करते हैं, किंतु आचार्यके उपदेशसे जो ज्ञानरूप नवीन जीवन प्राप्त होता है, वह सत्य, अजर और अमर है ॥
ज्येष्ठा मातृसमा चापि भगिनी भरतर्षभ ॥ १९ ॥
भ्रातृभार्या च तद्वत् स्याद् यस्या बाल्ये स्तनं पिबेत् ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! बड़ी बहिन भी माताके समान है। इसी तरह बड़े भाईकी पत्नी तथा बचपनमें जिसका दूध पिया गया हो, वह धाय भी माताके समान है ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ज्येष्ठकनिष्ठवृत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बड़े और छोटे भाईका पारस्परिक बर्तावनामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
षडधिकशततमोऽध्यायः
मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामेव वर्णानां म्लेच्छानां च पितामह ।
उपवासे मतिरियं कारणं च न विद्महे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! सभी वर्णों और म्लेच्छ जातिके लोग भी उपवासमें मन लगाते हैं, किंतु इसका क्या कारण है? यह समझमें नहीं आता ॥ १ ॥
ब्रह्मक्षत्रेण नियमाश्र्र्तव्या इति नः श्रुतम् ।
उपवासे कथं तेषां कृत्यमस्ति पितामह ॥ २ ॥
पितामह! सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंको नियमोंका पालन करना चाहिये; परंतु उपवास करनेसे किस प्रकार उनके प्रयोजनकी सिद्धि होती है, यह नहीं जान पड़ता है ॥ २ ॥
नियमांश्चोपवासांश्च सर्वेषां ब्रूहि पार्थिव ।
आप्नोति कां गतिं तात उपवासपरायणः ॥ ३ ॥
पृथ्वीनाथ! आप कृपा करके हमें सम्पूर्ण नियमों और उपवासोंकी विधि बताइये। तात! उपवास करनेवाला मनुष्य किस गतिको प्राप्त होता है? ॥ ३ ॥
उपवासः परं पुण्यमुपवासः परायणम् ।
उपोष्येह नरश्रेष्ठ किं फलं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ! कहते हैं, उपवास बहुत बड़ा पुण्य है और उपवास सबसे बड़ा आश्रय है; परंतु उपवास करके यहाँ मनुष्य कौन-सा फल पाता है? ॥ ४ ॥
अधर्मान्मुच्यते केन धर्ममाप्नोति वा कथम् ।
स्वर्गं पुण्यं च लभते कथं भरतसत्तम ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! मनुष्य किस कर्मके द्वारा पापसे छुटकारा पाता है और क्या करनेसे किस प्रकार उसे धर्मकी प्राप्ति होती है? वह पुण्य और स्वर्ग कैसे पाता है? ॥
उपोष्य चापि किं तेन प्रदेयं स्यान्नराधिप ।
धर्मेण च सुखानर्थांल्लभेद येन ब्रवीहि तम् ॥ ६ ॥
नरेश्वर! उपवास करके मनुष्यको किस वस्तुका दान करना चाहिये? जिस धर्मसे सुख और धनकी प्राप्ति हो सके, वही मुझे बताइये ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणं कौन्तेयं धर्मज्ञं धर्मतत्त्ववित् । धर्मपुत्रमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मज्ञ धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर धर्मके तत्त्वको जाननेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने उनसे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
इदं खलु मया राजन् श्रुतमासीत् पुरातनम् । उपवासविधौ श्रेष्ठा गुणा ये भरतर्षभ ॥ ८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! भरतश्रेष्ठ! उपवास करनेमें जो श्रेष्ठ गुण हैं, उनके विषयमें मैंने प्राचीन कालमें इस तरह सुन रखा है ॥ ८ ॥ ऋषिमंगिरसं पूर्वं पृष्टवानस्मि भारत । यथा मां त्वं तथैवाहं पृष्टवांस्तं तपोधनम् ॥ ९ ॥ भारत! जिस तरह आज तुमने मुझसे प्रश्न किया है इसी प्रकार मैंने भी पूर्वकालमें तपोधन अंगिरा मुनिसे प्रश्न किया था ॥ ९ ॥ प्रश्नमेतं मया पृष्टो भगवानग्निसम्भवः । उपवासविधिं पुण्यमाचष्ट भरतर्षभ ॥ १० ॥ भरतभूषण! जब मैंने यह प्रश्न पूछा, तब अग्निनन्दन भगवान् अंगिराने मुझे उपवासकी पवित्र विधि इस प्रकार बतायी ॥ १० ॥
अंगिरा उवाच
ब्रह्मक्षत्रे त्रिरात्रं तु विहितं कुरुनन्दन । द्विस्त्रिरात्रमथैकाहं निर्दिष्टं पुरुषर्षभ ॥ ११ ॥ **अंगिरा बोले—**कुरुनन्दन! ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये तीन रात उपवास करनेका विधान है। कहीं-कहीं दो त्रिरात्र और एक दिन अर्थात् कुल सात दिन उपवास करनेका संकेत मिलता है ॥ ११ ॥ वैश्याः शूद्राश्च यन्मोहादुपवासं प्रचक्रिरे । त्रिरात्रं वा द्विरात्रं वा तयोर्व्युष्टिर्न विद्यते ॥ १२ ॥ वैश्यों और शूद्रोंने जो मोहवश तीन रात अथवा दो रातका उपवास किया है, उसका उन्हें कोई फल नहीं मिला है ॥ १२ ॥ चतुर्थभक्तक्षपणं वैश्ये शूद्रे विधीयते । त्रिरात्रं न तु धर्मज्ञैर्विहितं धर्मदर्शिभिः ॥ १३ ॥ वैश्य और शूद्रके लिये चौथे समयतकके भोजनका त्याग करनेका विधान है अर्थात् उन्हें केवल दो दिन एवं दो रात्रितक उपवास करना चाहिये; क्योंकि धर्मशास्त्रके ज्ञाता एवं
धर्मदर्शी विद्वानोंने उनके लिये तीन राततक उपवास करनेका विधान नहीं किया है ॥ १३ ॥ पञ्चम्यां वापि षष्ठ्यां च पौर्णमास्यां च भारत । उपोष्य एकभक्तेन नियतात्मा जितेन्द्रियः ॥ १४ ॥ क्षमावान् रूपसम्पन्नः श्रुतवांश्चैव जायते । नानपत्यो भवेत् प्राज्ञो दरिद्रो वा कदाचन ॥ १५ ॥ भारत! यदि मनुष्य पंचमी, षष्ठी और पूर्णिमाके दिन अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर एक वक्त भोजन करके दूसरे वक्त उपवास करे तो वह क्षमावान्, रूपवान् और विद्वान् होता है। वह बुद्धिमान् पुरुष कभी संतानहीन या दरिद्र नहीं होता ॥ १४-१५ ॥ यजिष्णुः पञ्चमीं षष्ठीं कुले भोजयते द्विजान् । अष्टमीमथ कौरव्य कृष्णपक्षे चतुर्दशीम् ॥ १६ ॥ उपोष्य व्याधिरहितो वीर्यवानभिजायते । कुरुनन्दन! जो पुरुष भगवान्की आराधनाका इच्छुक होकर पंचमी, षष्ठी, अष्टमी तथा कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको अपने घरपर ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और स्वयं उपवास करता है, वह रोगरहित और बलवान् होता है ॥ १६ १/२ ॥ मार्गशीर्षं तु यो मासमेकभक्तेन संक्षिपेत् ॥ १७ ॥ भोजयेच्च द्विजान् शक्त्या स मुच्येद् व्याधिकिल्बिषैः । जो मार्गशीर्ष मासको एक समय भोजन करके बिताता है और अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह रोग और पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ १/२ ॥ सर्वकल्याणसम्पूर्णः सर्वौषधिसमन्वितः ॥ १८ ॥ उपोष्य व्याधिरहितो वीर्यवानभिजायते । कृषिभागी बहुधनो बहुधान्यश्च जायते ॥ १९ ॥ वह सब प्रकारके कल्याणमय साधनोंसे सम्पन्न तथा सब तरहकी ओषधियों (अन्न-फल आदि) से भरा-पूरा होता है। मार्गशीर्ष मासमें उपवास करनेसे मनुष्य दूसरे जन्ममें रोगरहित और बलवान् होता है। उसके पास खेती-बारीकी सुविधा रहती है तथा वह बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ॥ १८-१९ ॥ पौषमासं तु कौन्तेय भक्तेनैकेन यः क्षिपेत् । सुभगो दर्शनीयश्च यशोभागी च जायते ॥ २० ॥ कुन्तीनन्दन! जो पौष मासको एक वक्त भोजन करके बिताता है, वह सौभाग्यशाली, दर्शनीय और यशका भागी होता है ॥ २० ॥ माघं तु नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् । श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते ॥ २१ ॥
जो माघमासको नियमपूर्वक एक समयके भोजनसे व्यतीत करता है, वह धनवान् कुलमें जन्म लेकर अपने कुटुम्बीजनोंमें महत्त्वको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
भगदैवतमासं तु एकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
स्त्रीषु वल्लभतां याति वश्याश्चास्य भवन्ति ताः ॥ २२ ॥
जो फाल्गुन मासको एक समय भोजन करके व्यतीत करता है, वह स्त्रियोंको प्रिय होता है और वे उसके अधीन रहती हैं ॥ २२ ॥
चैत्रं तु नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये कुले महति जायते ॥ २३ ॥
जो नियमपूर्वक रहकर चैत्रमासको एक समय भोजन करके बिताता है, वह सुवर्ण, मणि और मोतियोंसे सम्पन्न महान् कुलमें जन्म लेता है ॥ २३ ॥
निस्तरेदेकभक्तेन वैशाखं यो जितेन्द्रियः ।
नरो वा यदि वा नारी ज्ञातीनां श्रेष्ठतां व्रजेत् ॥ २४ ॥
जो स्त्री अथवा पुरुष इन्द्रियसंयमपूर्वक एक समय भोजन करके वैशाख मासको पार करता है, वह सजातीय बन्धु-बान्धवोंमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है ॥
ज्येष्ठामूलं तु यो मासमेकभक्तेन संक्षिपेत् ।
ऐश्वर्यमतुलं श्रेष्ठं पुमान् स्त्री वा प्रपद्यते ॥ २५ ॥
जो एक समय ही भोजन करके ज्येष्ठ मासको बिताता है; वह स्त्री हो या पुरुष, अनुपम श्रेष्ठ ऐश्वर्यको प्राप्त होता है ॥ २५ ॥
आषाढमेकभक्तेन स्थित्वा मासमतन्द्रितः ।
बहुधान्यो बहुधनो बहुपुत्रश्च जायते ॥ २६ ॥
जो आषाढ़ मासमें आलस्य छोड़कर एक समय भोजन करके रहता है, वह बहुत-से धन-धान्य और पुत्रोंसे सम्पन्न होता है ॥ २६ ॥
श्रावणं नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
यत्र तत्राभिषेकेण युज्यते ज्ञातिवर्धनः ॥ २७ ॥
जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर एक समय भोजन करते हुए श्रावण मासको बिताता है, वह विभिन्न तीर्थोंमें स्नान करनेके पुण्य-फलसे युक्त होता और अपने कुटुम्बीजनोंकी वृद्धि करता है ॥ २७ ॥
प्रौष्ठपदं तु यो मासमेकाहारो भवेन्नरः ।
गवाढ्यं स्फीतमचलमैश्वर्यं प्रतिपद्यते ॥ २८ ॥
जो मनुष्य भाद्रपद मासमें एक समय भोजन करके रहता है, वह गोधनसे सम्पन्न, समृद्धिशील तथा अविचल ऐश्वर्यका भागी होता है ॥ २८ ॥
तथैवाश्वयुजं मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
मृजावान् वाहनाढ्यश्च बहुपुत्रश्च जायते ॥ २९ ॥
जो आश्विन मासको एक समय भोजन करके बिताता है, वह पवित्र, नाना प्रकारके वाहनोंसे सम्पन्न तथा अनेक पुत्रोंसे युक्त होता है ॥ २९ ॥ कार्तिकं तु नरो मासं यः कुर्यादेकभोजनम् । शूरश्च बहुभार्यश्च कीर्तिमांश्चैव जायते ॥ ३० ॥ जो मनुष्य कार्तिक मासमें एक समय भोजन करता है, वह शूरवीर, अनेक भार्याओंसे संयुक्त और कीर्तिमान् होता है ॥ ३० ॥ इति मासा नरव्याघ्र क्षिपतां परिकीर्तिताः । तिथीनां नियमा ये तु शृणु तानपि पार्थिव ॥ ३१ ॥ पुरुषसिंह! इस प्रकार मैंने मासपर्यन्त एकभुक्त व्रत करनेवाले मनुष्योंके लिये विभिन्न मासोंके फल बताये हैं। पृथिवीनाथ! अब तिथियोंके जो नियम हैं, उन्हें भी सुन लो ॥ ३१ ॥ पक्षे पक्षे गते यस्तु भक्तमश्नाति भारत । गवाढ्यो बहुपुत्रश्च बहुभार्यः स जायते ॥ ३२ ॥ भरतनन्दन! जो पंद्रह-पंद्रह दिनपर भोजन करता है, वह गोधनसे सम्पन्न और बहुत-से पुत्र तथा स्त्रियोंसे युक्त होता है ॥ ३२ ॥ मासि मासि त्रिरात्राणि कृत्वा वर्षाणि द्वादश । गणाधिपत्यं प्राप्नोति निःसपत्नमनाविलम् ॥ ३३ ॥ जो बारह वर्षोंतक प्रतिमास अनेक त्रिरात्रव्रत करता है, वह भगवान् शिवके गणोंका निष्कण्टक एवं निर्मल आधिपत्य प्राप्त करता है ॥ ३३ ॥ एते तु नियमाः सर्वे कर्तव्याः शरदो दश । द्वे चान्ये भरतश्रेष्ठ प्रवृत्तिमनुवर्तता ॥ ३४ ॥ भरतश्रेष्ठ! प्रवृत्तिमार्गका अनुसरण करनेवाले पुरुषको ये सभी नियम बारह वर्षोंतक पालन करने चाहिये ॥ ३४ ॥ यस्तु प्रातस्तथा सायं भुञ्जानो नान्तरा पिबेत् । अहिंसानिरतो नित्यं जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ३५ ॥ षड्भिः स वर्षेर्नृपते सिध्यते नात्र संशयः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३६ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन सबेरे और शामको भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा सदा अहिंसा-परायण होकर नित्य अग्निहोत्र करता है, उसे छः वर्षोंमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसमें संशय नहीं है तथा नरेश्वर! वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ॥ अधिवासे सोऽप्सरसां नृत्यगीतविनादिते । रमते स्त्रीसहस्राढ्ये सुकृती विरजो नरः ॥ ३७ ॥ वह पुण्यात्मा एवं रजोगुणरहित पुरुष सहस्रों दिव्य रमणियोंसे भरे हुए अप्सराओंके महलमें, जहाँ नृत्य और गीतकी ध्वनि गूँजती रहती है, रमण करता है ॥ ३७ ॥
तप्तकाञ्चनवर्णाभं विमानमधिरोहति ।
पूर्णं वर्षसहस्रं च ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३८ ॥
तत्क्षयादिह चागम्य माहात्म्यं प्रतिपद्यते ।
इतना ही नहीं, वह तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ़ होता है और पूरे एक हजार वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। पुण्यक्षीण होनेपर इस लोकमें आकर महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है ॥ ३८ १/२ ॥
यस्तु संवत्सरं पूर्णमेकाहारो भवेन्नरः ॥ ३९ ॥
अतिरात्रस्य यज्ञस्य स फलं समुपश्नुते ।
जो मानव पूरे एक वर्षतक प्रतिदिन एक बार भोजन करके रहता है, वह अतिरात्रयज्ञका फल भोगता है ॥ ३९ १/२ ॥
दशवर्षसहस्राणि स्वर्गे च स महीयते ॥ ४० ॥
तत्क्षयादिह चागम्य माहात्म्यं प्रतिपद्यते ।
वह पुरुष दस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर पुण्यक्षीण होनेपर इस लोकमें आकर महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेता है ॥ ४० १/२ ॥
यस्तु संवत्सरं पूर्णं चतुर्थं भक्तमश्नुते ॥ ४१ ॥
अहिंसानिरतो नित्यं सत्यवाग् विजितेन्द्रियः ।
वाजपेयस्य यज्ञस्य स फलं समुपश्नुते ॥ ४२ ॥
दशवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ।
जो पूरे एक वर्षतक दो-दो दिनपर भोजन करके रहता है तथा साथ ही अहिंसा, सत्य और इन्द्रिय-संयमका पालन करता है, वह वाजपेय यज्ञका फल पाता है और दस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४१-४२ १/२ ॥
षष्ठे काले तु कौन्तेय नरः संवत्सरं क्षिपन् ॥ ४३ ॥
अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
कुन्तीनन्दन! जो एक सालतक छठे समय अर्थात् तीन-तीन दिनोंपर भोजन करता है, वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ ४३ १/२ ॥
चक्रवाकप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति ॥ ४४ ॥
चत्वारिंशत् सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ।
वह चक्रवाकोंद्वारा वहन किये हुए विमानसे स्वर्गलोकमें जाता है और वहाँ चालीस हजार वर्षोंतक आनन्द भोगता है ॥ ४४ १/२ ॥
अष्टमेन तु भक्तेन जीवन् संवत्सरं नृप ॥ ४५ ॥
गवामयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
नरेश्वर! जो मनुष्य चार दिनोंपर भोजन करता हुआ एक वर्षतक जीवन धारण करता है, उसे गवामय यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ४५ १/२ ॥
हंससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति ॥ ४६ ॥
पञ्चाशतं सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ।
वह हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानद्वारा जाता है और पचास हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ॥ ४६ १/२ ॥
पक्षे पक्षे गते राजन् योऽश्रीयाद् वर्षमेव तु ॥ ४७ ॥
षण्मासानशनं तस्य भगवानङ्गिराऽब्रवीत् ।
राजन्! जो एक-एक पक्ष बीतनेपर भोजन करता है और इसी तरह एक वर्ष पूरा कर देता है, उसको छः मासतक अनशन करनेका फल मिलता है। ऐसा भगवान् अंगिरा मुनिका कथन है ॥ ४७ १/२ ॥
षष्टिर्वर्षसहस्राणि दिवमावसते च सः ॥ ४८ ॥
वीणानां वल्लकीनां च वेणूनां च विशाम्पते ।
सुघोषैर्मधुरैः शब्दैः सुप्तः स प्रतिबोध्यते ॥ ४९ ॥
प्रजानाथ! वह साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है और वहाँ वीणा, वल्लकी, वेणु आदि वाद्योंके मनोरम घोष तथा सुमधुर शब्दोंद्वारा उसे सोतेसे जगाया जाता है ॥ ४८-४९ ॥
संवत्सरमिहैकं तु मासि मासि पिबेदपः ।
फलं विश्वजितस्तात प्राप्नोति स नरो नृप ॥ ५० ॥
तात! नरेश्वर! जो मनुष्य एक वर्षतक प्रतिमास एक बार जल पीकर रहता है, उसे विश्वजित् यज्ञका फल मिलता है ॥ ५० ॥
सिंहव्याघ्रप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति ।
सप्ततिं च सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ॥ ५१ ॥
वह सिंह और व्याघ्र जुते हुए विमानसे यात्रा करता है और सत्तर हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ॥
मासादूर्ध्वं नरव्याघ्र नोपवासो विधीयते ।
विधिं त्वनशनस्याहुः पार्थ धर्मविदो जनाः ॥ ५२ ॥
पुरुषसिंह! एक माससे अधिक समयतक उपवास करनेका विधान नहीं है। कुन्तीनन्दन! धर्मज्ञ पुरुषोंने अनशनकी यही विधि बतायी है ॥ ५२ ॥
अनार्तो व्याधिरहितो गच्छेदन्शनं तु यः ।
पदे पदे यज्ञफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥ ५३ ॥
जो बिना रोग-व्याधिके अनशन व्रत करता है, उसे पद-पदपर यज्ञका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥
दिवं हंसप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति । शतं वर्षसहस्राणां मोदते स दिवि प्रभो ॥ ५४ ॥ शतं चाप्सरसः कन्या रमयन्त्यपि तं नरम् । प्रभो! ऐसा पुरुष हंस जुते हुए दिव्य विमानसे यात्रा करता है और एक लाख वर्षोंतक देवलोकमें आनन्द भोगता है, सैकड़ों कुमारी अप्सराएँ उस मनुष्यका मनोरंजन करती हैं ॥ ५४ १/२ ॥
आर्तो वा व्याधितो वापि गच्छेदन्शनं तु यः ॥ ५५ ॥ शतं वर्षसहस्राणां मोदते स दिवि प्रभो । प्रभो! रोगी अथवा पीड़ित मनुष्य भी यदि उपवास करता है तो वह एक लाख वर्षोंतक स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ५५ १/२ ॥
काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तश्चैव प्रबोध्यते ॥ ५६ ॥ सहस्रहंसयुक्तेन विमानेन तु गच्छति । वह सो जानेपर दिव्य रमणियोंकी कांची और नूपुरोंकी झनकारसे जागता है और ऐसे विमानसे यात्रा करता है, जिसमें एक हजार हंस जुते रहते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
स गत्वा स्त्रीशताकीर्णे रमते भरतर्षभ ॥ ५७ ॥ क्षीणस्याप्यायनं दृष्टं क्षतस्य क्षतरोहणम् । व्याधितस्यौषधग्रामः क्रुद्धस्य च प्रसादनम् ॥ ५८ ॥ दुःखितस्यार्थमानाभ्यां दुःखानां प्रतिषेधनम् । न चैते स्वर्गकामस्य रोचन्ते सुखमेधसः ॥ ५९ ॥ भरतश्रेष्ठ! वह स्वर्गमें जाकर सैकड़ों रमणियोंसे भरे हुए महलमें रमण करता है। इस जगत्में दुर्बल मनुष्यको हृष्ट-पुष्ट होते देखा गया है। जिसे घाव हो गया है, उसका घाव भी भर जाता है। रोगीको अपने रोगकी निवृत्तिके लिये औषधसमूह प्राप्त होता है। क्रोधमें भरे हुए पुरुषको प्रसन्न करनेका उपाय भी उपलब्ध होता है। अर्थ और मानके लिये दुःखी हुए पुरुषके दुःखोंका निवारण भी देखा गया है; परन्तु स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले और दिव्य सुख चाहनेवाले पुरुषको ये सब इस लोकके सुखोंकी बातें अच्छी नहीं लगतीं ॥ ५७—५९ ॥
अतः स कामसंयुक्ते विमाने हेमसंनिभे । रमते स्त्रीशताकीर्णे पुरुषोऽलंकृत शुचिः ॥ ६० ॥ स्वस्थः सफलसंकल्पः सुखी विगतकल्मषः । अतः वह पवित्रात्मा पुरुष वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सैकड़ों स्त्रियोंसे भरे हुए और इच्छानुसार चलनेवाले सुवर्ण-सदृश विमानपर बैठकर रमण करता है। वह स्वस्थ, सफलमनोरथ, सुखी एवं निष्पाप होता है ॥
अनश्नन् देहमुत्सृज्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ६१ ॥ बालसूर्यप्रतीकाशे विमाने हेमवर्चसि ।
वैदूर्यमुक्ताखचिते वीणामुरजनादिते ॥ ६२ ॥ पताकादीपिकाकीर्णे दिव्यघण्टानिनादिते । स्त्रीसहस्रानुचरिते स नरः सुखमेधते ॥ ६३ ॥ जो मनुष्य अनशन-व्रत करके अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह निम्नांकित फलका भागी होता है। वह प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशमान, सुनहरी कान्तिवाले, वैदूर्य और मोतीसे जटित, वीणा और मृदंगकी ध्वनिसे निनादित, पताका और दीपकोंसे आलोकित तथा दिव्य घण्टानादसे गूँजते हुए, सहस्रों अप्सराओंसे युक्त विमानपर बैठकर दिव्य सुख भोगता है ॥ ६१—६३ ॥
यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु पाण्डव । तावन्त्येव सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ॥ ६४ ॥ पाण्डुनन्दन! उसके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ६४ ॥
नास्ति वेदात् परं शास्त्रं नास्ति मातृसमो गुरुः । न धर्मात् परमो लाभस्तपो नानशनात् परम् ॥ ६५ ॥ वेदसे बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, धर्मसे बढ़कर कोई उत्कृष्ट लाभ नहीं है तथा उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ॥ ६५ ॥
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति पावनं दिवि चेह च । उपवासैस्तथा तुल्यं तपःकर्म न विद्यते ॥ ६६ ॥ जैसे इस लोक और परलोकमें ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणोंसे बढ़कर कोई पावन नहीं है, उसी प्रकार उपवासके समान कोई तप नहीं है ॥ ६६ ॥
उपोष्य विधिवद् देवास्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे । ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरुपाप्नुवन् ॥ ६७ ॥ देवताओंने विधिवत् उपवास करके ही स्वर्ग प्राप्त किया है तथा ऋषियोंको भी उपवाससे ही सिद्धि प्राप्त हुई है ॥ ६७ ॥
दिव्यवर्षसहस्राणि विश्वामित्रेण धीमता । क्षान्तमेकेन भक्तेन तेन विप्रत्वमागतः ॥ ६८ ॥ परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी एक हजार दिव्य वर्षोंतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके भूखका कष्ट सहते हुए तपमें लगे रहे। उससे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई ॥
च्यवनो जमदग्निश्च वसिष्ठो गौतमो भृगुः । सर्व एव दिवं प्राप्ताः क्षमावन्तो महर्षयः ॥ ६९ ॥ च्यवन, जमदग्नि, वसिष्ठ, गौतम, भृगु—ये सभी क्षमावान् महर्षि उपवास करके ही दिव्य लोकोंको प्राप्त हुए हैं ॥ ६९ ॥
इदमङ्गिरसा पूर्वं महर्षिभ्यः प्रदर्शितम् ।