भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 940, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 940

एवं ब्रुवाणं कौन्तेयं धर्मज्ञं धर्मतत्त्ववित् । धर्मपुत्रमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मज्ञ धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर धर्मके तत्त्वको जाननेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने उनसे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥

भीष्म उवाच

इदं खलु मया राजन् श्रुतमासीत् पुरातनम् । उपवासविधौ श्रेष्ठा गुणा ये भरतर्षभ ॥ ८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! भरतश्रेष्ठ! उपवास करनेमें जो श्रेष्ठ गुण हैं, उनके विषयमें मैंने प्राचीन कालमें इस तरह सुन रखा है ॥ ८ ॥ ऋषिमंगिरसं पूर्वं पृष्टवानस्मि भारत । यथा मां त्वं तथैवाहं पृष्टवांस्तं तपोधनम् ॥ ९ ॥ भारत! जिस तरह आज तुमने मुझसे प्रश्न किया है इसी प्रकार मैंने भी पूर्वकालमें तपोधन अंगिरा मुनिसे प्रश्न किया था ॥ ९ ॥ प्रश्नमेतं मया पृष्टो भगवानग्निसम्भवः । उपवासविधिं पुण्यमाचष्ट भरतर्षभ ॥ १० ॥ भरतभूषण! जब मैंने यह प्रश्न पूछा, तब अग्निनन्दन भगवान् अंगिराने मुझे उपवासकी पवित्र विधि इस प्रकार बतायी ॥ १० ॥

अंगिरा उवाच

ब्रह्मक्षत्रे त्रिरात्रं तु विहितं कुरुनन्दन । द्विस्त्रिरात्रमथैकाहं निर्दिष्टं पुरुषर्षभ ॥ ११ ॥ **अंगिरा बोले—**कुरुनन्दन! ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये तीन रात उपवास करनेका विधान है। कहीं-कहीं दो त्रिरात्र और एक दिन अर्थात् कुल सात दिन उपवास करनेका संकेत मिलता है ॥ ११ ॥ वैश्याः शूद्राश्च यन्मोहादुपवासं प्रचक्रिरे । त्रिरात्रं वा द्विरात्रं वा तयोर्व्युष्टिर्न विद्यते ॥ १२ ॥ वैश्यों और शूद्रोंने जो मोहवश तीन रात अथवा दो रातका उपवास किया है, उसका उन्हें कोई फल नहीं मिला है ॥ १२ ॥ चतुर्थभक्तक्षपणं वैश्ये शूद्रे विधीयते । त्रिरात्रं न तु धर्मज्ञैर्विहितं धर्मदर्शिभिः ॥ १३ ॥ वैश्य और शूद्रके लिये चौथे समयतकके भोजनका त्याग करनेका विधान है अर्थात् उन्हें केवल दो दिन एवं दो रात्रितक उपवास करना चाहिये; क्योंकि धर्मशास्त्रके ज्ञाता एवं