भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 941, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 941

धर्मदर्शी विद्वानोंने उनके लिये तीन राततक उपवास करनेका विधान नहीं किया है ॥ १३ ॥ पञ्चम्यां वापि षष्ठ्यां च पौर्णमास्यां च भारत । उपोष्य एकभक्तेन नियतात्मा जितेन्द्रियः ॥ १४ ॥ क्षमावान् रूपसम्पन्नः श्रुतवांश्चैव जायते । नानपत्यो भवेत् प्राज्ञो दरिद्रो वा कदाचन ॥ १५ ॥ भारत! यदि मनुष्य पंचमी, षष्ठी और पूर्णिमाके दिन अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर एक वक्त भोजन करके दूसरे वक्त उपवास करे तो वह क्षमावान्, रूपवान् और विद्वान् होता है। वह बुद्धिमान् पुरुष कभी संतानहीन या दरिद्र नहीं होता ॥ १४-१५ ॥ यजिष्णुः पञ्चमीं षष्ठीं कुले भोजयते द्विजान् । अष्टमीमथ कौरव्य कृष्णपक्षे चतुर्दशीम् ॥ १६ ॥ उपोष्य व्याधिरहितो वीर्यवानभिजायते । कुरुनन्दन! जो पुरुष भगवान्की आराधनाका इच्छुक होकर पंचमी, षष्ठी, अष्टमी तथा कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको अपने घरपर ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और स्वयं उपवास करता है, वह रोगरहित और बलवान् होता है ॥ १६ १/२ ॥ मार्गशीर्षं तु यो मासमेकभक्तेन संक्षिपेत् ॥ १७ ॥ भोजयेच्च द्विजान् शक्त्या स मुच्येद् व्याधिकिल्बिषैः । जो मार्गशीर्ष मासको एक समय भोजन करके बिताता है और अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह रोग और पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ १/२ ॥ सर्वकल्याणसम्पूर्णः सर्वौषधिसमन्वितः ॥ १८ ॥ उपोष्य व्याधिरहितो वीर्यवानभिजायते । कृषिभागी बहुधनो बहुधान्यश्च जायते ॥ १९ ॥ वह सब प्रकारके कल्याणमय साधनोंसे सम्पन्न तथा सब तरहकी ओषधियों (अन्न-फल आदि) से भरा-पूरा होता है। मार्गशीर्ष मासमें उपवास करनेसे मनुष्य दूसरे जन्ममें रोगरहित और बलवान् होता है। उसके पास खेती-बारीकी सुविधा रहती है तथा वह बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ॥ १८-१९ ॥ पौषमासं तु कौन्तेय भक्तेनैकेन यः क्षिपेत् । सुभगो दर्शनीयश्च यशोभागी च जायते ॥ २० ॥ कुन्तीनन्दन! जो पौष मासको एक वक्त भोजन करके बिताता है, वह सौभाग्यशाली, दर्शनीय और यशका भागी होता है ॥ २० ॥ माघं तु नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् । श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते ॥ २१ ॥