महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 987, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रभो! जो विवाह, यज्ञ अथवा दानका अवसर आनेपर मोहवश उसमें विघ्न डालता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ा ही होता है ॥ ८१ ॥
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानवः ॥ ८२ ॥
भारत! वह कीट पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर पापोंका क्षय करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है ॥ ८२ ॥
पूर्वं दत्त्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति ।
सोऽपि राजन् मृतो जन्तुः कृमियोनौ प्रजायते ॥ ८३ ॥
राजन्! जो पहले एक व्यक्तिको कन्यादान करके फिर दूसरेको उसी कन्याका दान करना चाहता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ८३ ॥
तत्र जीवति वर्षाणि त्रयोदश युधिष्ठिर ।
अधर्मसंक्षये युक्तस्ततो जायति मानवः ॥ ८४ ॥
युधिष्ठिर! उस योनिमें वह तेरह वर्षोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षयके पश्चात् वह पुनः मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ॥ ८४ ॥
देवकार्यमकृत्वा तु पितृकार्यमथापि वा ।
अनिर्वाप्य समश्नन् वै मृतो जायति वायसः ॥ ८५ ॥
जो देवकार्य अथवा पितृकार्य न करके बलि-वैश्वदेव किये बिना ही अन्न ग्रहण करता है, वह मरनेके बाद कौएकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ८५ ॥
वायसः शतवर्षाणि ततो जायति कुक्कुटः ।
जायते व्यालकश्चापि मासं तस्मात् तु मानुषः ॥ ८६ ॥
सौ वर्षोंतक कौएके शरीरमें रहकर वह मुर्गा होता है। उसके बाद एक मासतक सर्प रहता है। तत्पश्चात् मनुष्यका जन्म पाता है ॥ ८६ ॥
ज्येष्ठं पितृसमं चापि भ्रातरं योऽवमन्यते ।
सोऽपि मृत्युमुपागम्य क्रौञ्चयोनौ प्रजायते ॥ ८७ ॥
बड़ा भाई पिताके समान आदरणीय है, जो उसका अपमान करता है, उसे मृत्युके बाद क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ ८७ ॥
क्रौञ्चो जीवति वर्षं तु ततो जायति चीरकः ।
ततो निधनमापन्नो मानुषत्वमुपाश्नुते ॥ ८८ ॥
क्रौंच होकर वह एक वर्षतक जीवित रहता है। उसके बाद चीरक जातिका पक्षी होता है और फिर मरनेके बाद मनुष्य-योनिमें जन्म पाता है ॥ ८८ ॥
वृषलो ब्राह्मणीं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते ।
ततः सम्प्राप्य निधनं जायते सूकरः पुनः ॥ ८९ ॥