भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 986, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 986

ततः प्रेत्य महाराज मृतो जायति सूकरः । सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप ॥ ७३ ॥ राजन्! फिर वह चूहा मृत्युके पश्चात् सूअर होता है। नरेश्वर! वह सूअर जन्म लेते ही रोगसे मर जाता है ।। ७३ ।। श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव । भूत्वा श्वा पञ्च वर्षाणि ततो जायति मानवः ॥ ७४ ॥ पृथ्वीनाथ! फिर उसी कर्मसे वह मूढ़ जीव कुत्ता होता है और पाँच वर्षतक कुत्ता रहकर अन्तमें मनुष्यका जन्म पाता है ।। ७४ ।। परदाराभिमर्शं तु कृत्वा जायति वै वृकः । श्वा शृगालस्ततो गृध्रो व्यालः कङ्को बकस्तथा ॥ ७५ ॥ परस्त्रीगमनका पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक और बगुला होता है ।। ७५ ।। भ्रातृभार्यां तु पापात्मा यो धर्षयति मोहितः । पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोऽपि संवत्सरं नृप ॥ ७६ ॥ नरेश्वर! जो पापात्मा मोहवश भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह एक वर्षतक कोयलकी योनिमें पड़ा रहता है ।। ७६ ।। सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्यां तथैव च । प्रधर्षयित्वा कामाय मृतो जायति सूकरः ॥ ७७ ॥ जो कामनाकी पूर्तिके लिये मित्र, गुरु और राजाकी स्त्रीका सतीत्व भंग करता है, वह मरनेके बाद सूअर होता है ।। ७७ ।। सूकरः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि श्वाविधः । बिडालः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि कुक्कुटः ॥ ७८ ॥ पिपीलिकस्तु मासांस्त्रीन् कीटः स्यान्मासमेव तु । एतानासाद्य संसारान् कृमियोनौ प्रजायते ॥ ७९ ॥ पाँच वर्षतक सूअर रहकर दस वर्ष भेड़िया, पाँच वर्ष बिलाव, दस वर्ष मुर्गा, तीन महीने चींटी और एक महीने कीड़ेकी योनिमें रहता है। इन सभी योनियोंमें चक्कर लगानेके बाद वह पुनः कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ।। ७८-७९ ।। तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश । ततोऽधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानवः ॥ ८० ॥ उस कीट-योनिमें वह चौदह महीनोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षय करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ।। ८० ।। उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेऽपि वा विभो । मोहात् करोति यो विघ्नं स मृतो जायते कृमिः ॥ ८१ ॥