महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 989, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस तरह कई सौ बार वह जीव गर्भकी यन्त्रणा भोगता है। तदनन्तर बहुत बार जन्म लेनेके पश्चात् वह तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होता है ॥ ९७ ॥
ततो दुःखमनुप्राप्य बहु वर्षगणानिह । अपुनर्भवसंयुक्तस्ततः कूर्मः प्रजायते ॥ ९८ ॥ इन योनियोंमें बहुत वर्षोंतक दुःख भोगनेके पश्चात् वह फिर मनुष्ययोनिमें न आकर दीर्घकालके लिये कछुआ हो जाता है ॥ ९८ ॥
दधि हृत्वा बकश्चापि प्लवो मत्स्यान्संसकृतान् । चोरयित्वा तु दुर्बुद्धिर्मधु दंशः प्रजायते ॥ ९९ ॥ दुर्बुद्धि मनुष्य दहीकी चोरी करके बगला होता है, कच्ची मछलियोंकी चोरी करके वह कारण्डव नामक जलपक्षी होता है और मधुका अपहरण करके वह डाँस (मच्छर) की योनिमें जन्म लेता है ॥ ९९ ॥
फलं वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिकाः । चोरयित्वा च निष्पावं जायते हलगोलकः ॥ १०० ॥ फल, मूल अथवा पूएकी चोरी करनेपर मनुष्यको चींटीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। निष्पाव (मटर या उड़द) की चोरी करनेवाला हलगोलक नामवाला कीड़ा होता है ॥ १०० ॥
पायसं चोरयित्वा तु तित्तिरित्त्वमवाप्नुते । हृत्वा पिष्टमयं पूपं कुम्भोलोकः प्रजायते ॥ १०१ ॥ खीरकी चोरी करनेवाला तीतरकी योनिमें जन्म लेता है। आटेका पूआ चुराकर मनुष्य मरनेके बाद उल्लू होता है ॥ १०१ ॥
अयो हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्वायसो जायते नरः । कांस्यं हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्हारितो जायते नरः ॥ १०२ ॥ लोहेकी चोरी करनेवाला मूर्ख मानव कौवा होता है। काँसकी चोरी करके खोटी बुद्धिवाला मनुष्य हारीत नामक पक्षी होता है ॥ १०२ ॥
रजतं भाजनं हृत्वा कपोतः सम्प्रजायते । हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते ॥ १०३ ॥ चाँदीका बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सुवर्णमय भाण्डकी चोरी करके मनुष्यको कीड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ १०३ ॥
पत्रोर्णं चोरयित्वा तु कृकलत्वं निगच्छति । कौशिकं तु ततो हृत्वा नरो जयति वर्तकः ॥ १०४ ॥ ऊनी वस्त्र चुरानेवाला कृकल (गिरगिट) की योनिमें जन्म लेता है। कौशेय (रेशमी) वस्त्रकी चोरी करनेपर मनुष्य बत्तक होता है ॥ १०४ ॥
अंशुकं चोरयित्वा तु शुको जायति मानवः ।