भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 990, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 990

चोरयित्वा दुकूलं तु मृतो हंसः प्रजायते ।। १०५ ।। अंशुक (महीन कपड़े) की चोरी करके मनुष्य तोतेका जन्म पाता है तथा दुकूल (उत्तरीय वस्त्र) की चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ मानव हंसकी योनिमें जन्म लेता है ।। १०५ ।। क्रौञ्चः कार्पासिकं हृत्वा मृतो जायति मानवः । चोरयित्वा नरः पट्टं त्वाविकं चैव भारत ।। १०६ ।। क्षौमं च वस्त्रमादाय शशो जन्तुः प्रजायते । सूती वस्त्रकी चोरी करके मरा हुआ मनुष्य क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। भारत! पाटम्बर, भेड़के ऊनका बना हुआ तथा क्षौम (रेशमी) वस्त्र चुरानेवाला मनुष्य खरगोश नामक जन्तु होता है ।। १०६ १/२ ।। वर्णान् हृत्वा तु पुरुषो मृतो जायति बर्हिणः ।। १०७ ।। हृत्वा रक्तानि वस्त्राणि जायते जीवजीवकः । अनेक प्रकारके रंगोंकी चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मोर होता है। लाल कपड़े चुरानेवाला मनुष्य चकोरकी योनिमें जन्म लेता है ।। १०७ १/२ ।। वर्णकादींस्तथा गन्धांश्चोरयित्वेह मानवः ।। १०८ ।। छुच्छुन्दरित्वमाप्नोति राजँल्लोभपरायणः । तत्र जीवति वर्षाणि ततो दश च पञ्च च ।। १०९ ।। राजन्! जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर वर्णक (अनुलेपन) आदि तथा चन्दनकी चोरी करता है, वह छछूँदर होता है। उस योनिमें वह पंद्रह वर्षतक जीवित रहता है ।। १०८-१०९ ।। अधर्मस्य क्षयं गत्वा ततो जायति मानुषः । चोरयित्वा पयश्चापि बलाका सम्प्रजायते ।। ११० ।। फिर अधर्मका क्षय हो जानेपर वह मनुष्यका जन्म पाता है। दूध चुरानेवाली स्त्री बगुली होती है ।। ११० ।। यस्तु चोरयते तैलं नरो मोहसमन्वितः । सोऽपि राजन् मृतो जन्तुस्तैलपायी प्रजायते ।। १११ ।। राजन्! जो मनुष्य मोहयुक्त होकर तेल चुराता है, वह मरनेपर तेलपायी नामक कीड़ा होता है ।। १११ ।। अशस्त्रं पुरुषं हत्वा सशस्त्रः पुरुषाधमः । अर्थार्थी यदि वा वैरी स मृतो जायते खरः ।। ११२ ।। जो नीच मनुष्य धनके लोभसे अथवा शत्रुताके कारण हथियार लेकर निहत्थे पुरुषको मार डालता है, वह अपनी मृत्युके बाद गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ।। खरो जीवति वर्षे द्वे ततः शस्त्रेण वध्यते ।