महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 991, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस मृतो मृगयोनौ तु नित्योद्विग्नोऽभिजायते ॥ ११३ ॥ गदहा होकर वह दो वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर शस्त्रसे उसका वध होता है। इस प्रकार मरकर वह मृगकी योनिमें जन्म लेता और हिंसकोंके भयसे सदा उद्विग्न रहता है ॥ ११३ ॥
मृगो वध्यति शस्त्रेण गते संवत्सरे तु सः । हतो मृगस्ततो मीनः सोऽपि जालेन बध्यते ॥ ११४ ॥ मृग होकर वह सालभरमें ही शस्त्रद्वारा मारा जाता है। मरनेपर मत्स्य होता है, फिर वह भी जालसे बँधता है ॥ ११४ ॥
मासे चतुर्थे सम्प्राप्ते श्वापदः सम्प्रजायते । श्वापदो दश वर्षाणि द्वीपी वर्षाणि पञ्च च ॥ ११५ ॥ वह किसी प्रकार जालसे छूटा हुआ भी चौथे महीनेमें मृत्युको प्राप्त हो हिंसक जन्तु भेड़िया आदि होता है। उस योनिमें दस वर्षोंतक रहकर वह पाँच वर्षोंतक व्याघ्र या चीतेकी योनिमें पड़ा रहता है ॥ ११५ ॥
ततस्तु निधनं प्राप्तः कालपर्यायचोदितः । अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुषः ॥ ११६ ॥ तदनन्तर पापका क्षय होनेपर कालकी प्रेरणासे मृत्युको प्राप्त हो वह पुनः मनुष्य होता है ॥ ११६ ॥
स्त्रियं हत्वा तु दुर्बुद्धिर्यमस्य विषयं गतः । बहून् क्लेशान् समासाद्य संसारांश्चैव विंशतिम् ॥ ११७ ॥ जो खोटी बुद्धिवाला पुरुष स्त्रीकी हत्या कर डालता है, वह यमराजके लोकमें जाकर नाना प्रकारके क्लेश भोगनेके पश्चात् बीस बार दुःखद योनियोंमें जन्म लेता है ॥ ११७ ॥
ततः पश्चान्महाराज कृमियोनौ प्रजायते । कृमिर्विंशतिवर्षाणि भूत्वा जायति मानुषः ॥ ११८ ॥ महाराज! तदनन्तर वह कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और बीस वर्षोंतक कीट-योनिमें रहकर अन्तमें मनुष्य होता है ॥ ११८ ॥
भोजनं चोरयित्वा तु मक्षिका जायते नरः । मक्षिकासंघवशगो बहून् मासान् भवत्युत ॥ ११९ ॥ ततः पापक्षयं कृत्वा मानुषत्वमवाप्नुते । भोजनकी चोरी करके मनुष्य मक्खी होता है और कई महीनोंतक मक्खियोंके समुदायके अधीन रहता है। तत्पश्चात् पापोंका भोग समाप्त करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ॥ ११९½ ॥
धान्यं हृत्वा तु पुरुषो लोमशः सम्प्रजायते ॥ १२० ॥ तथा पिण्याकसम्मिश्रमशनं चोरयेन्नरः ।