महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो मनुष्य जन्मसे ही पापका परित्याग कर देते हैं, वे नीरोग, रूपवान् और धनी होते हैं॥ १२९॥
स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन कृत्वा पापमवाप्नुयुः।
एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः॥ १३०॥
स्त्रियाँ भी यदि पूर्वोक्त पापकर्म करती हैं तो पापकी भागिनी होती हैं और वे उन पापभोगी प्राणियोंकी ही पत्नी होती हैं॥ १३०॥
परस्वहरणे दोषाः सर्व एव प्रकीर्तिताः।
एतद्धि लेशमात्रेण कथितं ते मयानघ॥ १३१॥
निष्पाप नरेश! पराये धनका अपहरण करनेसे जो दोष होते हैं, वे सब बताये गये। यहाँ मेरे द्वारा संक्षेपसे ही इस विषयका दिग्दर्शन कराया गया है॥ १३१॥
अपरस्मिन् कथायोगे भूयः श्रोष्यसि भारत।
एतन्मया महाराज ब्रह्मणो वदतः पुरा॥ १३२॥
सुरर्षीणां श्रुतं मध्ये पृष्टश्चापि यथातथम्।
मयापि तच्च कात्स्न्येन यथावदनुवर्णितम्।
एतच्छ्रुत्वा महाराज धर्मे कुरु मनः सदा॥ १३३॥
भरतनन्दन! अब दूसरी बार बातचीतके प्रसंगमें फिर कभी इस विषयको सुनना। महाराज! पूर्वकालमें ब्रह्माजी देवर्षियोंके बीच यह प्रसंग सुना रहे थे। वहाँ उन्हींके मुँहसे मैंने ये सारी बातें सुनी थीं और तुम्हारे पूछनेपर उन्हीं सब बातोंका मैंने भी यथार्थरूपसे वर्णन किया है। राजन्! यह सुनकर तुम सदा धर्ममें मन लगाओ॥ १३२-१३३॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रं नाम एकादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ १११॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्र नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥