भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 994, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 994

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः

पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्नदानकी विशेष महिमा

युधिष्ठिर उवाच

अधर्मस्य गतिर्ब्रह्मन् कथिता मे त्वयानघ ।
धर्मस्य तु गतिं श्रोतुमिच्छामि वदतां वर ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**ब्रह्मन्! आपने अधर्मकी गति बतायी। पापरहित वक्ताओंमें श्रेष्ठ! अब मैं धर्मकी गति सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
कृत्वा कर्माणि पापानि कथं यान्ति शुभां गतिम् ।
कर्मणा च कृतेनेह केन यान्ति शुभां गतिम् ॥ २ ॥
मनुष्य पाप कर्म करके कैसे शुभगतिको प्राप्त होते हैं तथा किस कर्मके अनुष्ठानसे उन्हें उत्तम गति प्राप्त होती है? ॥ २ ॥

बृहस्पतिरुवाच

कृत्वा पापानि कर्माणि अधर्मवशमागतः ।
मनसा विपरीतेन निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**राजन्! जो मनुष्य पापकर्म करके अधर्मके वशीभूत हो जाता है, उसका मन धर्मके विपरीत मार्गमें जाने लगता है; इसलिये वह नरकमें गिरता है ॥ ३ ॥
मोहादधर्मं यः कृत्वा पुनः समनुतप्यते ।
मनःसमाधिसंयुक्तो न स सेवेत दुष्कृतम् ॥ ४ ॥
परंतु जो अज्ञानवश अधर्म बन जानेपर पुनः उसके लिये पश्चात्ताप करता है, उसे चाहिये कि मनको वशमें रखकर वह फिर कभी पापका सेवन न करे ॥
यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हते ।
तथा तथा शरीरं तु तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ ५ ॥
मनुष्यका मन ज्यों-ज्यों पापकर्मकी निन्दा करता है त्यों-त्यों उसका शरीर उस अधर्मके बन्धनसे मुक्त होता जाता है ॥ ५ ॥
यदि व्याहरते राजन् विप्राणां धर्मवादिनाम् ।
ततोऽधर्मकृतात् क्षिप्रमपवादात् प्रमुच्यते ॥ ६ ॥
राजन्! यदि पापी पुरुष धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे अपना पाप बता दे तो वह उस पापके कारण होनेवाली निन्दासे शीघ्र ही छुटकारा पा जाता है ॥ ६ ॥
यथा यथा नरः सम्यगधर्ममनुभाषते ।
समाहितेन मनसा विमुच्येत तथा तथा ।