महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 995, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभुजंग इव निर्मोकात् पूर्वमुक्ताज्जरान्वितात् ॥ ७ ॥
मनुष्य अपने मनको स्थिर करके जैसे-जैसे अपना पाप प्रकट करता है, वैसे-ही-वैसे वह मुक्त होता जाता है। ठीक उसी तरह जैसे सर्प पूर्वमुक्त, जराजीर्ण केंचलसे छूट जाता है ॥ ७ ॥
दत्त्वा विप्रस्य दानानि विविधानि समाहितः ।
मनःसमाधिसंयुक्तः सुगतिं प्रतिपद्यते ॥ ८ ॥
मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सावधान हो ब्राह्मणको यदि नाना प्रकारके दान करे तो वह उत्तम गतिको पाता है ॥ ८ ॥
प्रदानानि तु वक्ष्यामि यानि दत्त्वा युधिष्ठिर ।
नरः कृत्वाप्यकार्याणि ततो धर्मेण युज्यते ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर! अब मैं उन उत्कृष्ट दानोंका वर्णन करूँगा, जिन्हें देकर मनुष्य यदि उससे न करने योग्य कर्म बन जायँ तो भी धर्मके फलसे संयुक्त होता है ॥ ९ ॥
सर्वेषामेव दानानामन्नं श्रेष्ठमुदाहृतम् ।
पूर्वमन्नं प्रदातव्यमृजुना धर्ममिच्छता ॥ १० ॥
सब प्रकारके दानोंमें अन्नका दान श्रेष्ठ बताया गया है। अतः धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको सरलभावसे पहले अन्नका ही दान करना चाहिये ॥ १० ॥
प्राणा ह्यन्नं मनुष्याणां तस्माज्जन्तुश्च जायते ।
अन्ने प्रतिष्ठितो लोकस्तस्मादन्नं प्रशस्यते ॥ ११ ॥
अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्नसे ही प्राणीका जन्म होता है, अन्नके ही आधारपर सारा संसार टिका हुआ है। इसलिये अन्न सबसे उत्तम माना गया है ॥ ११ ॥
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवर्षिपितृमानवाः ।
अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ॥ १२ ॥
देवता, ऋषि, पितर और मनुष्य अन्नकी ही प्रशंसा करते हैं। अन्नके ही दानसे राजा रन्तिदेव स्वर्गको प्राप्त हुए हैं ॥ १२ ॥
न्यायलब्धं प्रदातव्यं द्विजातिभ्योऽन्नमुत्तमम् ।
स्वाध्यायं समुपेतेभ्यः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ १३ ॥
अतः स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणोंके लिये प्रसन्न चित्तसे न्यायोपार्जित उत्तम अन्नका दान करना चाहिये ॥ १३ ॥
यस्य ह्यन्नमुपाश्नन्ति ब्राह्मणानां शतं दश ।
हृष्टेन मनसा दत्तं न स तिर्यग्गतिर्भवेत् ॥ १४ ॥
जिस पुरुषके प्रसन्न चित्तसे दिये हुए अन्नको एक हजार ब्राह्मण खा लेते हैं, वह पशु-पक्षीकी योनिमें नहीं जन्म लेता ॥ १४ ॥
ब्राह्मणानां सहस्राणि दश भोज्य नरर्षभ ।