भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 996, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 996

नरोऽधर्मात् प्रमुच्येत योगेष्वभिरतः सदा ॥ १५ ॥ नरश्रेष्ठ! जो मनुष्य सदा योग-साधनमें संलग्न रहकर दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन करा देता है, वह पापके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥

भैक्ष्येणान्नं समाहृत्य विप्रो वेदपुरस्कृतः । स्वाध्यायनिरते विप्रे दत्त्वेह सुखमेधते ॥ १६ ॥ वेदज्ञ ब्राह्मण भिक्षासे अन्न लाकर यदि स्वाध्याय-परायण विप्रको दान देता है तो इस लोकमें सुखी होता है ॥ १६ ॥

(भैक्ष्येणापि समाहृत्य दद्यादन्नं द्विजेषु वै । सुवर्णदानात् पापानि नश्यन्ति सुबहून्यपि ॥ जो भिक्षासे भी अन्न लाकर ब्राह्मणोंको देता है और सुवर्णका दान करता है, उसके बहुत-से पाप भी नष्ट हो जाते हैं ॥

दत्त्वा वृत्तिकरीं भूमिं पातकेनापि मुच्यते । पारायणैः पुराणानां मुच्यते पातकैर्द्विजः ॥ जीविका चलानेवाली भूमिका दान करके भी मनुष्य पातकसे मुक्त हो जाता है। पुराणोंके पाठसे भी ब्राह्मण पातकोंसे छुटकारा पा जाता है ॥

गायत्र्याश्चैव लक्षेण गोसहस्रस्य तर्पणात् । वेदार्थं ज्ञापयित्वा तु शुद्धान् विप्रान् यथार्थतः ॥ सर्वत्यागादिभिश्चापि मुच्यते पातकैर्द्विजः । सर्वातिथ्यं परं ह्येषां तस्मादन्नं परं स्मृतम् ॥) एक लाख गायत्री जपनेसे, एक हजार गौओंको तृप्त करनेसे, विशुद्ध ब्राह्मणोंको यथार्थरूपसे वेदार्थका ज्ञान करानेसे तथा सर्वस्वके त्याग आदिसे भी द्विज पापमुक्त हो जाता है। इन सबमें सबका अन्नके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करना ही सबसे श्रेष्ठ कर्म है। इसलिये अन्नको सबसे उत्तम माना गया है ॥

अहिंसन् ब्राह्मणस्वानि न्यायेन परिपाल्य च । क्षत्रियस्तरसा प्राप्तमन्नं यो वै प्रयच्छति ॥ १७ ॥ द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्यः प्रयतः सुसमाहितः । तेनापोहति धर्मात्मन् दुष्कृतं कर्म पाण्डव ॥ १८ ॥ धर्मात्मा पाण्डुनन्दन! जो क्षत्रिय ब्राह्मणके धनका अपहरण न करके न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए अपने बाहुबलसे प्राप्त किया हुआ अन्न वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भलीभाँति शुद्ध एवं समाहित चित्तसे दान करता है, वह उस अन्न-दानके प्रभावसे अपने पूर्वकृत पापोंका नाश कर डालता है ॥ १७-१८ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 996, कुल 2566 में से · BharatKosha