भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०३ श्याम रंग के हैं—वह 'वृषभ' कहलाता है (३४)। जिसकी जाँघ पक्षी के समान, मुख मनुष्य के समान, नाक लम्बी है और दो पंखों से युक्त अञ्जलि बनाकर जो दोनों पैरों को सिकोड़कर बैठा है—उसे 'गरुड़' कहते हैं (३५) । देवालय को ध्वज, पताका का दान करने से देवता को सौ वर्ष तक रहनेवाली प्रसन्नता होती है। बत्तीस हाथ ऊँचे रङ्ग-बिरंगे, सुदृढ़, छिद्र-रहित, देखने में सुन्दर, लाल वस्त्र से लपेटे हुए और आगे के भाग में विष्णु के चक्र से युक्त ध्वज-दण्ड का निर्माण करे (३६-३७)। ऐसे ध्वज-दण्ड के अगले भाग में सम्बन्धित देवता के वाहन के चिह्न से युक्त पताका लगाए। जिसका मूल-भाग प्रशस्त और अगला भाग सूक्ष्म है; जो सुन्दर वस्त्र से बनी ध्वज के आगे शोभा पाती है—वही 'पताका' कही जाती है (३८) । जो वस्त्र, अलङ्कार, पर्यङ्क, यान, सिंहासन, पान-पात्र, भोजन-पात्र, ताम्बूल-पात्र, पीकदान, मणि-मुक्ता- प्रवाल आदि रत्न और अन्य दूसरी अपनी प्रिय वस्तुएँ देवता को श्रद्धा-भक्ति के साथ दान करता है, वह उस देवता के लोक में पहुँचकर उन्हीं वस्तुओं का कोटि गुना फल पाता है (३६-४०) ! कामियों का फल स्वप्न में प्राप्त राज्य के समान क्षय होनेवाला होता है। निष्कामियों को पुनर्जन्म-रहित निर्वाण-मुक्ति मिलती है (४१) । जलाशय, गृह, आराम, सेतु, संक्रम, वृक्ष और देव-प्रतिष्ठा के समय 'वास्तु-दैत्य की पूजा' करे। जो वास्तु-पूजा न करके देव-प्रतिष्ठा आदि कर्म करता है, उसके उस कर्म में वास्तु-देव अपने गणों के साथ विघ्न डालते हैं। (४२-४३) । १. कपिलास्य, २. पिङ्ग-केश, ३. भीषण, ४. रक्त-लोचन, ५. कोटराक्ष, ६. लम्ब-कर्ण, ७. दीर्घ-जङ्घ, ८. महोदर, ६. अश्व-तुण्ड, १० काक-कण्ठ, ११. वज्र-बाहु, १२. वृतान्तक—इन सभी वास्तु- देव के गणों का यत्न-पूर्वक पूजन करे (४४-४५) । जिस मण्डल में वास्तुदेव की पूजा करनी चाहिए, उसे कहता हूँ, सुनो (४६) — वेदी या पानी से लिपी हुई किसी सम-तल भूमि पर वायु-कोण से ईशान-कोण तक एक हाथ लम्बी रेखा सूत्र-पात द्वारा बनाए (४७) । ईशान-कोण से अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण से नैर्ऋत-कोण तक और नैर्ऋत-कोण से वायु-कोण तक एक-एक रेखा बनाकर एक चतुष्कोण मण्डल बनाए (४८-४६) । हे देवि ! इस मण्डल के एक कोने से दूसरे कोने तक दो रेखाएँ खींचकर मण्डल को चार भागों में इस प्रकार बाँटे कि उस स्थल पर मछली के पूंछ के चार आकार बन जायँ (५०) । उक्त पुच्छ-मूल के भेद कर पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा तक और उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा तक दो रेखाएँ खींचे (५१) । फिर कोण-रेखा-युक्त चतुष्कोणों में कर्णाकर्णि चार रेखाएँ और मध्य स्थल में पश्चिम से पूर्व तक और उत्तर से दक्षिण तक दो रेखाएँ खींचे (५२) । इस प्रकार उक्त मण्डल के सोलह कोष्ठ बनाकर पञ्च-वर्णों के चूर्ण द्वारा उत्तम यन्त्र की रचना करे (५३) । फिर मध्य के चतुष्कोण में एक सुन्दर चतु- र्दल-पद्म अङ्कित करे, जिसकी कर्णिका पीले और लाल रंग की तथा केशर लाल रंग की हो (५४) । तब पद्म के सभी दलों को सफेद या पीले रंग का करे। फिर पद्म के सन्धि-स्थानों को इच्छानुसार रंगों से भरे (५५) । तब ईशान कोण के कोष्ठक से आरम्भ कर बारह कोष्ठ क्रमशः श्वेत, कृष्ण, पीत, रक्त-इन चार रंगों से पूरे (५६) । हे प्रिये ! दक्षिणावर्त्त-क्रम से इन सभी कोष्ठों को पूरे। फिर वामावर्त्त-क्रम से उसमें देव-गण की पूजा करे (५७) । पहले विघ्न की शान्ति के लिए पद्म में वास्तु-दैत्य की और ईशान कोण से आरम्भ कर (वामावर्त-क्रम से) बारह कोष्ठों में कपिलास्य आदि दानवों की पूजा करे (५८) । तब कुशाण्डिकोक्त विधि से अग्नि का संस्कार कर यथा-शक्ति आहुतियाँ देकर 'वास्तु-यज्ञ' समाप्त करे (५६) । हे देवि ! तुमसे यह मंगल-दायिनी 'वास्तु-पूजा' कही गई। इसके करने से मनुष्य वास्तु के विघ्नों से पीड़ित नहीं होता (६०) ।