महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र उनके वर और अभय से स्पष्ट होती है (१०) । हे भद्रे ! वे रजो गुण से उत्पन्न विश्व में रहती हैं, इसी से कहा है कि वे लाल कमल के आसन पर बैठी हैं (११) । ज्ञान-स्वरूपा, सब लोगों की साक्षि-स्वरूपिणी वे देवी मोह-मयी सुरा को पीकर क्रीडा करनेवाले काल से उत्पन्न जगत् को देखती हैं (१२) । अल्पबुद्धि भक्तों के हित के लिए उक्त प्रकार गुणानुसार उन भगवती के अनेक प्रकार के रूप कल्पित हुए हैं (१३) । श्री देवी ने कहा—जीवों के उद्धार के लिये आपने 'आद्या कालिका' का जो ध्यान बताया है, यदि उसी के अनुसार मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या धातु की मूर्ति बनाकर साधक व्यक्ति उसे वस्त्र और अलङ्कार से विभूषित कर सुन्दर घर बनाकर उसमें देवेशी को उस मूर्ति को स्थापित करे, तो उसका क्या फल होगा ? हे प्रभो ! किस विधि से उस मूर्ति की 'प्रतिष्ठा' करनी होगी, यह कृपया मुझे बताइए (१४-१६) । आपने पहले बावली, कुएँ, घर, उद्यान और देव-प्रतिमा की प्रतिष्ठा का उल्लेख किया है, किन्तु विशेष रूप से नहीं बताया है (१७) । हे परमेश्वर ! मैं आपके मुख से उनका विधान भी सुनना चाहती हूँ। यदि आपकी रुचि हो, तो कृपया बताइए (१८) । श्री सदाशिव ने कहा—हे परमेश्वरि ! तुमने जो जानना चाहा है, वह बहुत गोपनीय है। तुम्हारे स्नेह से मैं उसे बताता हूँ। तुम एकाग्र होकर सुनो (१६) । इस भू-मण्डल पर मनुष्य दो प्रकार के हैं—१. सकाम, २. निष्काम । निष्काम लोगों को मोक्ष-पद और कामी लोगों को जैसा फल मिलता है, वह कहता हूँ (२०) । हे प्रिये ! जो व्यक्ति जिस देवता की मूर्ति की प्रतिष्ठा करता है, वह उसी देवता के लोक को और उस लोक को भोग्य वस्तुओं को पाता है (२१) । मृण्मयी (मिट्टी की) प्रतिमा प्रतिष्ठित करनेवाला दस हजार कल्पों तक स्वर्ग में रहता है। लकड़ी, पत्थर और धातु की प्रतिमा का फल क्रमशः दस-दस गुना अधिक है अर्थात् लकड़ी की प्रतिमा से एक लाख कल्प तक स्वर्ग में रहता है इत्यादि (२२) । जो व्यक्ति देवता की प्रसन्नता के लिए या किसी कामना से ध्वज और वाहन के साथ तृण-काष्ठादि का घर बनाकर उत्सर्ग करता है या इस प्रकार के उत्कृष्ट घर का संस्कार कराता है, उसका पुण्य सुनो (२३) । हे परमेश्वरि ! जो व्यक्ति तृणादि से बने घर को दान करता है, वह बहुत हजार कोटि वर्षों तक देवलोक में रहता है (२४) । ईंट का बना गृह दान करने से इससे सौ गुना अधिक फल होता है । पत्थर के गृह-दान का फल इससे दस हजार गुना अधिक है (२५) । हे आद्ये ! सेतु और संक्रम (विशेष प्रकार का सेतु) बनानेवाले को यम-लोक नहीं देखना पड़ता । वह सुखपूर्ण देवलोक को पाकर स्वर्ग-वासियों के साथ आनन्द करता है (२६) । वृक्ष और उपवन की प्रतिष्ठा करने- वाला देव-लोक में जाकर कल्प-वृक्षों से युक्त दिव्य घर में रहता हुआ अपनी मनचाही सभी सुन्दर भोग्य वस्तुओं का उपभोग करता है (२७) । सब प्राणियों को प्रसन्नता के लिए जो जलाशय दान करता है, वह पापों से छूट- कर ब्रह्म-लोक को जाता है और उस जलाशय में जितनी बूँदें होती हैं, उतने सौ वर्षों तक वहाँ रहता है (२८) । हे देवि ! जो व्यक्ति देवता की प्रीति के लिए कोई वाहन देता है, वह उस देवता से रक्षित होकर उसी के लोक में चिरकाल तक रहता है (२६) । इस भू-मण्डल पर मिट्टी के वाहन देने का जो फल है, उसका दस गुना फल लकड़ी का वाहन दान करने से और प्रस्तर-वाहन के दान से उसका भी दस गुना अधिक फल होता है (३०) । पीतल, कांसे, ताम्बे आदि धातु से बने देव-वाहन के दान से क्रमशः सौ गुना अधिक फल होता है (३१) । श्रेष्ठ साधक भगवती के मन्दिर में 'महा-सिंह', शिव-मन्दिर में 'वृषभ' और विष्णु-मन्दिर में 'गरुड़' का निर्माण कराकर दान में देता है (३२) । जिसके सभी दाँत तीक्ष्ण हैं, मुख-मण्डल भीषण है, कन्धे केशरों से सुशोभित हैं, चार पैर हैं, नाखून वज्र के समान हैं—वह 'महा-सिंह' कहा जाता है (३३) । दो सींगें ही जिसके अस्त्र हैं, शरीर श्वेत वर्ण का है, चार पैर हैं, खुर काले रंग के हैं, बड़ा भारी ककुद है, पूंछ काली है, कन्धे