महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवां उल्लास : 'देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०१ तो वह लाभ अन्यथा होगा (१२१) । पिता की मृत्यु होने पर सभी भागीदारों की सम्मति के बिना सामान्य संपत्ति को नहीं लगाया जा सकता (१२२) । हे पार्वति ! यदि बहुमूल्य वस्तु कम मूल्य में या कम मूल्य की वस्तु बहुत मूल्य में बिके, तो राजा उसे अन्यथा करने में समर्थ है (१२३) । जिस प्रकार शरीर का जन्म और मरण एक ही बार होता है, उसी प्रकार दान और कन्या का ब्राह्म विवाह एक ही बार होता है (१२४) । जिसके एक ही पुत्र है, वह पुत्र का दान नहीं कर सकता ; जिसके एक ही स्त्री है, वह स्त्री का दान करने में समर्थ नहीं होता। जो पितरों का हित चाहता है, वह एक ही कन्या होने पर उसे शैव विवाह में नहीं दे सकता (१२५) । देव कार्य में, पितृ-कार्य में, वाणिज्य में—विशेषतः राज-द्वार में प्रतिनिधि जो कुछ करेगा, वह उसके नियुक्त करनेवाले का ही किया माना जायगा (१२६)। हे सुव्रते ! प्रतिनिधि को नियुक्त करनेवाले के दोष के लिए प्रतिनिधि या दूत दंडनीय नहीं है, यह नित्य विधि है (१२७) । ऋण, कृषि-कार्य, वाणिज्य और अन्य सभी कार्यों में धर्म-सम्मत जो कुछ स्वीकार किया गया है, उसे करना होगा (१२८) । जगदीश्वर जगत् की रक्षा करते हैं। जो इस जगत् को नष्ट करना चाहते हैं, वे स्वयं विनष्ट हो जाते हैं। ईश्वर द्वारा पालित जगत् के रक्षकों की रक्षा जगदीश्वर करते हैं। अतः सदैव जगत् के हित में लगे रहना चाहिए (१२६) । ☸ ☸ ☸ तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि सभी निगमों के सार एवं स्वर्ग और मोक्ष के एकमात्र कारण-स्वरूप बातों के बतानेवाले देवदेव महेश्वर से कलि द्वारा मलीन जीवों की पवित्रता के लिए एकाग्र-चित्त त्रिभुवन-जननी पार्वती ने भक्ति-पूर्वक कहा (१) —महद्-योनि अर्थात् महत्-तत्त्व की उत्पादिका आदि-शक्ति अर्थात् मूल प्रकृति महा-द्युति एवं सूक्ष्म से भी सूक्ष्मा अर्थात् सर्वथा दुर्ज्ञेया 'महा-काली' का रूप-निरूपण किस प्रकार होगा (२) ? हे देव ! प्रकृति के कार्य का अर्थात् घट-पट आदि का ही रूप होता है, किन्तु 'महा-काली' साक्षात् परात्परा अर्थात् प्रकृति-रूपा है, अतः रूप होना असम्भव है। इस विषय में मुझे विशेष सन्देह है। हे देव ! आप मेरे इस संदेह को विशेष रूप से दूर करें (३) । श्रीसदाशिव ने कहा—हे प्रिये ! पहले ही बताया है कि उपासकों के कार्य के लिए गुण व क्रिया के अनुसार देवी का रूप कल्पित होता है (४) । हे शैलजे ! सफेद, पीले आदि रङ्ग जैसे काले रङ्ग में लुप्त हो जाते हैं, वैसे ही सभी भूत 'काली' में प्रविष्ट हैं (५) । इसी से उस निर्गुणा, निराकारा, योगियों की हित-कारिणी, काल-शक्ति का रङ्ग काला कहा गया है (६) । नित्या, काल-रूपा, अव्यया और कल्याण-रूपा इस 'काली' के मस्तक पर चन्द्र-कला का चिह्न अमृत को सूचित करता है (७) । नित्य-स्वरूप चन्द्र, सूर्य और अग्नि द्वारा काल- सम्भूत सारा जगत् दिखाई देता है, इसी से 'काली' के तीन नेत्र कल्पित हुए हैं (८) । सभी प्राणियों को ग्रास करने और काल-दंड द्वारा चबाने से सब प्राणियों का रक्त ही महेश्वरी के लाल वस्त्र से ज्ञात होता है (६) । हे शिवे ! समय-समय पर विपत्ति से जीवों की रक्षा करने और अपने-अपने कार्य में जीवों को प्रेरित करने की बात