भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 139 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110
  • १०० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र बहुत भाइयों में से एक भाई पैतृक धन द्वारा धन पैदा करता है, वहाँ उक्त पैतृक धन में ही सब भाइयों का अधिकार है; उपार्जित धन उपार्जन करनेवाले के सिवा अन्य किसी को नहीं मिलेगा (६७)। जो भाई पैतृक नष्ट द्रव्य का उद्धार करता है, वह उत्तराधिकारियों के बीच दो भाग पाएगा (६८)। शरीर-शून्य व्यक्ति को पुण्य, धन और विद्या नहीं मिलती। यह शरीर पितृ-संबंधी है, अतः कौन धन पैतृक नहीं है (६६) ? मानव-गण पृथक् अन्न, पृथक् धन वाले होकर भी जो कुछ उपार्जित करते हैं, वह सब पितृ-संक्रान्त है, अतः अपना उपार्जित , धन कैसे सम्भव है (१००) ? अतः हे महेश्वरि ! जो व्यक्ति अपने परिश्रम से जो धन उपार्जित करता है, वही - उसका उपार्जित है, वही उस धन का स्वामी है, अन्य कोई नहीं (१०१) । हे देवि ! माता, पिता, गुरु, पितामह या मातामह को हाथ से भी मारनेवाला व्यक्ति उनके धन का अधि- कारी नहीं होता (१०२)। अन्य किसी सम्बन्धी व्यक्ति का भी प्राण नाश करने पर वह विनष्ट व्यक्ति के धन को नहीं पाएगा, कोई अन्य उत्तराधिकारी उस व्यक्ति के धन का अधिकारी होगा (१०३)। हे अम्बिके ! नपुंसक और पंगु जीवन भर अन्न-वस्त्र पाएगा, धन का अधिकारी नहीं होगा (१०४) । मार्ग में या अन्य किसी स्थान पर किसी सस्वामिक धन के मिलने पर राजा विचार कर उस धन को पानेवाले के द्वारा धन-स्वामी को प्रदान करे (१०५) । अस्वामिक जीव या धन के मिलने पर, पानेवाला व्यक्ति ही उसका अधिकारी होगा, राजा को उसका दशमांश अर्पित करे (१०६) । योग्य क्रेता यदि पास में है, तो स्वामी स्थावर धन अन्य व्यक्ति को नहीं बेच सकता (१०७)। पास रहने- वाले क्रेताओं के बीच जाति या सवर्ण प्रशस्त है ; उनके अभाव में बन्धु । बहुत बन्धु यदि खरीदने के इच्छुक हों, तो विक्रेता की इच्छा ही मान्य है अर्थात् इच्छानुसार जिसे चाहे, उसे बेच सकता है (१०८) । दूसरा व्यक्ति यदि स्थावर धन का मूल्य निश्चित कर उसे खरीदने को तैयार हो और निकटस्थ व्यक्ति यदि वही मूल्य दे, तो वही खरीदार होगा, दूसरा व्यक्ति नहीं (१०६) । यदि निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देने में असमर्थ है या अन्य को बेचे जाने में सहमत है, तो गृहस्थ दूसरे व्यक्ति को भी बेच सकता है (११०) । हे देवि ! प्रवासी व्यक्ति के अज्ञातवास में यदि स्थावर संपत्ति कोई अन्य खरीद ले, तो सुनने पर वही मूल्य देकर प्रवासी उसे पुनः पा सकता है (१११) । किन्तु यदि क्रेता ने उसमें गृह, उपवन बना लिया हो या उसे भग्न किया हो, तो निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देकर भी स्थावर धन का नहीं पा सकता (११२) । जल या वन से निकाली हुई, अति दुर्गम, अनिवारित, भोग एवं राजस्व- शून्य भूमि को राजाज्ञा के बिना भी उपजाऊ बना सकते हैं (११३)। वह भूमि बहुत परिश्रम से भी तैयार की गई हो, तो भी उसमें उत्पन्न वस्तु का दशमांश राजा को देकर उसका भोग करे क्योंकि राजा ही सारी भूमि का स्वामी है (११४) । जिस स्थान में दूसरे का अनिष्ट हो सकता हो, वहाँ बावली, कुआँ, तालाब खोदना; वृक्ष लगाना या घर बनवाना निषिद्ध है (११५) । देवोद्देश से बने कुएँ और नदी का जल सभी पी सकते हैं और इन जलाशयों के निकट रहनेवाले उनसे सिंचाई करने के अधिकारी हैं (११६) । जिस जलाशय से सिंचाई करने से लोगों को जल की कमी अनुभव हो, उससे निकट के लोग भी सिंचाई नहीं कर सकते (११७) । अंशी लोगों की सम्मति के बिना अविभक्त सम्पत्ति को रेहन रखना या बेचना अवैध है। इसी प्रकार जिस सम्पत्ति का स्वामित्व या परि- माण निर्दिष्ट नहीं है, उसका बेचना या बन्धक रखना अप्रामाणिक होता है (११८) । बन्धक वस्तु को जानकर नष्ट करने पर राजा उस नष्ट करनेवाले व्यक्ति से उस वस्तु के स्वामी को उसका मूल्य दिलाए (११६)। बन्धक करनेवाले की सम्मति से बन्धक पशु आदि वस्तु को उपयोग में लानेवाला व्यक्ति ही उस पशु का पोषण करेगा (१२०) । जब कोई काल और लाभ के नियम की उपेक्षा कर लाभ के लिए स्थावर-अस्थावर सम्पत्ति को लगाएगा,