महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन | ६६ बीत जाने पर पुत्र पिता या माता का और पतिव्रता पत्नी पति का मरण सुनने पर तीन रात्रि का अशौच मानें (७०)। जब एक अशौच के बीच एक अन्य अशौच होता है, तब गुरु अशौच द्वारा मनुष्यों की शुद्धि होती है (७१)। दीर्घ-काल तक होने से अशौच व्याप्य होता है, उससे व्यापक अशौच गुरुतर होता है (७२)। यदि मरणाशौच या जननाशौच के शेष दिनों में कोई दूसरा मरण-जनित या जन्म-जनित खंडाशौच उपस्थित हो, तो पूर्व अशौच द्वारा ही वह छूट जायगा अर्थात् खंडाशौच को ग्रहण नहीं किया जायगा। यदि पूर्णाशौच हो, तो पूर्व अशौच के बाद दो दिन अशौच बढ़ जायगा (७३)। स्त्रियों का जब तक विवाह नहीं होता, तब तक पितृ-कुल में अशौच होगा। विवाह होने पर पिता-माता की मृत्यु पर तीन रात का अशौच होगा (७४)। विवाह के बाद स्त्री पति-गोत्र को पाती है। इसी प्रकार दत्तक पुत्र दत्तक लेनेवाले के गोत्र को पाता है (७५)। जननी और जनक दोनों की सम्मति से पुत्र ग्रहण कर ग्रहण-कर्त्ता अपने गोत्र और नाम का उल्लेख कर दत्तक पुत्र का संस्कार करे (७६)। जिस प्रकार औरस पुत्र को पिता-माता के धन और पिंड का अधिकार होता है, उसी प्रकार दत्तक पुत्र को भी दत्तक लेनेवाले स्त्री-पुरुष के धन और पिंड का अधिकार है क्योंकि वे ही दत्तक के पिता-माता हैं (७७)। पाँच वर्षीय बालक को सवर्ण से लेकर उसका प्रतिपालन करे। दत्तक लेने में पाँच वर्ष से अधिक आयु का बालक प्रशस्त नहीं है (७८)। हे कालिके ! भाई का पुत्र भी यदि दत्तक हो, तो दत्तक लेनेवाला ही उसका पिता होगा और उसका जन्मदाता सभी कार्यों में उसका पितृव्य (चाचा) होगा (७९)। जो व्यक्ति जिसके धन का अधिकारी होगा, वही व्यक्ति उसके धर्म का पालन करेगा और नियम मानेगा तथा उसके बन्धुओं को सन्तुष्ट करेगा (८०)। कानीन (कन्या-काल में उत्पन्न पुत्र), गोलक (उप-पति द्वारा विधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) और कुंड (उप-पति द्वारा सधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) अति पापी हैं, उनके मरने पर अशौच नहीं होता और उन्हें धनाधिकार भी नहीं होता (८१)। जिन पुरुषों को लिङ्गच्छेद का दंड मिला है या जिन स्त्रियों की नाक राज- दंड द्वारा काटी गई है या जो महा-पापी हैं उनके मरने पर अशौच नहीं माना जाता (८२)। जो व्यक्ति निरुद्देश हों, उनके परिवार और धन की रक्षा राजा बारह वर्ष तक करे (८३)। बारह वर्ष बीतने पर उक्त अनुद्दिष्ट व्यक्ति की कुश-मय देह का दाह कराए। तीन रात्रि के बाद उस व्यक्ति के पुत्रादि द्वारा प्रेतत्व-मोचन कराए (८४)। फिर राजा उस अनुद्दिष्ट व्यक्ति के धन को उसके पुत्रादि के क्रम से यथा-सम्भव उसके परिवार के लोगों में बाँट दे अन्यथा वह पापी होगा (८५)। जिसका रक्षक कोई नहीं है, उनका और दीन, विपत्ति-ग्रस्तादि लोगों का रक्षक राजा ही है क्योंकि राजा प्रजा-गण का प्रभु है (८६)। हे कालिके ! अनुद्दिष्ट व्यक्ति यदि धन बँटने के बाद भी आ जाय, तो स्त्री-पुत्र, धन उसी के होंगे (८७)। अंशी-गण की सम्मति के बिना पुरुष भी पैतृक स्थावर धन को स्वजन को या अन्य व्यक्ति को दान नहीं कर सकते (८८)। जो स्थावर, अस्थावर धन अपना उपार्जित है, उसे और पैतृक अस्थावर संपत्ति को स्वेच्छा- नुसार दान कर सकते हैं (८९)। पुत्र या पत्नी अथवा कन्या, दौहित्र या जनक, जननी किम्वा भाई या बहन के रहते भी जो स्थावर और अस्थावर धन अपना उपार्जित है तथा पैतृक सारा अस्थावर धन दान में दे सकता है (९०-९१)। इस प्रकार का धन पुरुष ऐसे दान में या अन्य किसी धर्म-कार्य में व्यय करे, तो उसके पुत्रादि उसे अन्यथा नहीं कर सकते (९२)। धर्मार्थ में लगाई संपत्ति की रक्षा धन-दाता ही करेगा, किन्तु उसे वह पुनः नहीं ले सकता क्योंकि धर्म ही उस धन का स्वामी है (९३)। हे अम्बिके ! स्वयं या प्रतिनिधि द्वारा सङ्कल्प के अनुसार मूल-धन या उप-स्वत्व को धर्मार्थ में लगाए (९४)। धनी व्यक्ति यदि स्नेह-वश किसी उत्तराधिकारी को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो उसे कोई अन्य व्यक्ति अन्यथा नहीं कर सकता (९५)। यदि उत्तराधिकारियों में से एक ही व्यक्ति को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो अन्य उत्तराधिकारी उसे रोक नहीं सकते (९६)। जहाँ