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महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

बारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन | ६६ बीत जाने पर पुत्र पिता या माता का और पतिव्रता पत्नी पति का मरण सुनने पर तीन रात्रि का अशौच मानें (७०)। जब एक अशौच के बीच एक अन्य अशौच होता है, तब गुरु अशौच द्वारा मनुष्यों की शुद्धि होती है (७१)। दीर्घ-काल तक होने से अशौच व्याप्य होता है, उससे व्यापक अशौच गुरुतर होता है (७२)। यदि मरणाशौच या जननाशौच के शेष दिनों में कोई दूसरा मरण-जनित या जन्म-जनित खंडाशौच उपस्थित हो, तो पूर्व अशौच द्वारा ही वह छूट जायगा अर्थात् खंडाशौच को ग्रहण नहीं किया जायगा। यदि पूर्णाशौच हो, तो पूर्व अशौच के बाद दो दिन अशौच बढ़ जायगा (७३)। स्त्रियों का जब तक विवाह नहीं होता, तब तक पितृ-कुल में अशौच होगा। विवाह होने पर पिता-माता की मृत्यु पर तीन रात का अशौच होगा (७४)। विवाह के बाद स्त्री पति-गोत्र को पाती है। इसी प्रकार दत्तक पुत्र दत्तक लेनेवाले के गोत्र को पाता है (७५)। जननी और जनक दोनों की सम्मति से पुत्र ग्रहण कर ग्रहण-कर्त्ता अपने गोत्र और नाम का उल्लेख कर दत्तक पुत्र का संस्कार करे (७६)। जिस प्रकार औरस पुत्र को पिता-माता के धन और पिंड का अधिकार होता है, उसी प्रकार दत्तक पुत्र को भी दत्तक लेनेवाले स्त्री-पुरुष के धन और पिंड का अधिकार है क्योंकि वे ही दत्तक के पिता-माता हैं (७७)। पाँच वर्षीय बालक को सवर्ण से लेकर उसका प्रतिपालन करे। दत्तक लेने में पाँच वर्ष से अधिक आयु का बालक प्रशस्त नहीं है (७८)। हे कालिके ! भाई का पुत्र भी यदि दत्तक हो, तो दत्तक लेनेवाला ही उसका पिता होगा और उसका जन्मदाता सभी कार्यों में उसका पितृव्य (चाचा) होगा (७९)। जो व्यक्ति जिसके धन का अधिकारी होगा, वही व्यक्ति उसके धर्म का पालन करेगा और नियम मानेगा तथा उसके बन्धुओं को सन्तुष्ट करेगा (८०)। कानीन (कन्या-काल में उत्पन्न पुत्र), गोलक (उप-पति द्वारा विधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) और कुंड (उप-पति द्वारा सधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) अति पापी हैं, उनके मरने पर अशौच नहीं होता और उन्हें धनाधिकार भी नहीं होता (८१)। जिन पुरुषों को लिङ्गच्छेद का दंड मिला है या जिन स्त्रियों की नाक राज- दंड द्वारा काटी गई है या जो महा-पापी हैं उनके मरने पर अशौच नहीं माना जाता (८२)। जो व्यक्ति निरुद्देश हों, उनके परिवार और धन की रक्षा राजा बारह वर्ष तक करे (८३)। बारह वर्ष बीतने पर उक्त अनुद्दिष्ट व्यक्ति की कुश-मय देह का दाह कराए। तीन रात्रि के बाद उस व्यक्ति के पुत्रादि द्वारा प्रेतत्व-मोचन कराए (८४)। फिर राजा उस अनुद्दिष्ट व्यक्ति के धन को उसके पुत्रादि के क्रम से यथा-सम्भव उसके परिवार के लोगों में बाँट दे अन्यथा वह पापी होगा (८५)। जिसका रक्षक कोई नहीं है, उनका और दीन, विपत्ति-ग्रस्तादि लोगों का रक्षक राजा ही है क्योंकि राजा प्रजा-गण का प्रभु है (८६)। हे कालिके ! अनुद्दिष्ट व्यक्ति यदि धन बँटने के बाद भी आ जाय, तो स्त्री-पुत्र, धन उसी के होंगे (८७)। अंशी-गण की सम्मति के बिना पुरुष भी पैतृक स्थावर धन को स्वजन को या अन्य व्यक्ति को दान नहीं कर सकते (८८)। जो स्थावर, अस्थावर धन अपना उपार्जित है, उसे और पैतृक अस्थावर संपत्ति को स्वेच्छा- नुसार दान कर सकते हैं (८९)। पुत्र या पत्नी अथवा कन्या, दौहित्र या जनक, जननी किम्वा भाई या बहन के रहते भी जो स्थावर और अस्थावर धन अपना उपार्जित है तथा पैतृक सारा अस्थावर धन दान में दे सकता है (९०-९१)। इस प्रकार का धन पुरुष ऐसे दान में या अन्य किसी धर्म-कार्य में व्यय करे, तो उसके पुत्रादि उसे अन्यथा नहीं कर सकते (९२)। धर्मार्थ में लगाई संपत्ति की रक्षा धन-दाता ही करेगा, किन्तु उसे वह पुनः नहीं ले सकता क्योंकि धर्म ही उस धन का स्वामी है (९३)। हे अम्बिके ! स्वयं या प्रतिनिधि द्वारा सङ्कल्प के अनुसार मूल-धन या उप-स्वत्व को धर्मार्थ में लगाए (९४)। धनी व्यक्ति यदि स्नेह-वश किसी उत्तराधिकारी को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो उसे कोई अन्य व्यक्ति अन्यथा नहीं कर सकता (९५)। यदि उत्तराधिकारियों में से एक ही व्यक्ति को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो अन्य उत्तराधिकारी उसे रोक नहीं सकते (९६)। जहाँ

  • १०० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र बहुत भाइयों में से एक भाई पैतृक धन द्वारा धन पैदा करता है, वहाँ उक्त पैतृक धन में ही सब भाइयों का अधिकार है; उपार्जित धन उपार्जन करनेवाले के सिवा अन्य किसी को नहीं मिलेगा (६७)। जो भाई पैतृक नष्ट द्रव्य का उद्धार करता है, वह उत्तराधिकारियों के बीच दो भाग पाएगा (६८)। शरीर-शून्य व्यक्ति को पुण्य, धन और विद्या नहीं मिलती। यह शरीर पितृ-संबंधी है, अतः कौन धन पैतृक नहीं है (६६) ? मानव-गण पृथक् अन्न, पृथक् धन वाले होकर भी जो कुछ उपार्जित करते हैं, वह सब पितृ-संक्रान्त है, अतः अपना उपार्जित , धन कैसे सम्भव है (१००) ? अतः हे महेश्वरि ! जो व्यक्ति अपने परिश्रम से जो धन उपार्जित करता है, वही - उसका उपार्जित है, वही उस धन का स्वामी है, अन्य कोई नहीं (१०१) । हे देवि ! माता, पिता, गुरु, पितामह या मातामह को हाथ से भी मारनेवाला व्यक्ति उनके धन का अधि- कारी नहीं होता (१०२)। अन्य किसी सम्बन्धी व्यक्ति का भी प्राण नाश करने पर वह विनष्ट व्यक्ति के धन को नहीं पाएगा, कोई अन्य उत्तराधिकारी उस व्यक्ति के धन का अधिकारी होगा (१०३)। हे अम्बिके ! नपुंसक और पंगु जीवन भर अन्न-वस्त्र पाएगा, धन का अधिकारी नहीं होगा (१०४) । मार्ग में या अन्य किसी स्थान पर किसी सस्वामिक धन के मिलने पर राजा विचार कर उस धन को पानेवाले के द्वारा धन-स्वामी को प्रदान करे (१०५) । अस्वामिक जीव या धन के मिलने पर, पानेवाला व्यक्ति ही उसका अधिकारी होगा, राजा को उसका दशमांश अर्पित करे (१०६) । योग्य क्रेता यदि पास में है, तो स्वामी स्थावर धन अन्य व्यक्ति को नहीं बेच सकता (१०७)। पास रहने- वाले क्रेताओं के बीच जाति या सवर्ण प्रशस्त है ; उनके अभाव में बन्धु । बहुत बन्धु यदि खरीदने के इच्छुक हों, तो विक्रेता की इच्छा ही मान्य है अर्थात् इच्छानुसार जिसे चाहे, उसे बेच सकता है (१०८) । दूसरा व्यक्ति यदि स्थावर धन का मूल्य निश्चित कर उसे खरीदने को तैयार हो और निकटस्थ व्यक्ति यदि वही मूल्य दे, तो वही खरीदार होगा, दूसरा व्यक्ति नहीं (१०६) । यदि निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देने में असमर्थ है या अन्य को बेचे जाने में सहमत है, तो गृहस्थ दूसरे व्यक्ति को भी बेच सकता है (११०) । हे देवि ! प्रवासी व्यक्ति के अज्ञातवास में यदि स्थावर संपत्ति कोई अन्य खरीद ले, तो सुनने पर वही मूल्य देकर प्रवासी उसे पुनः पा सकता है (१११) । किन्तु यदि क्रेता ने उसमें गृह, उपवन बना लिया हो या उसे भग्न किया हो, तो निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देकर भी स्थावर धन का नहीं पा सकता (११२) । जल या वन से निकाली हुई, अति दुर्गम, अनिवारित, भोग एवं राजस्व- शून्य भूमि को राजाज्ञा के बिना भी उपजाऊ बना सकते हैं (११३)। वह भूमि बहुत परिश्रम से भी तैयार की गई हो, तो भी उसमें उत्पन्न वस्तु का दशमांश राजा को देकर उसका भोग करे क्योंकि राजा ही सारी भूमि का स्वामी है (११४) । जिस स्थान में दूसरे का अनिष्ट हो सकता हो, वहाँ बावली, कुआँ, तालाब खोदना; वृक्ष लगाना या घर बनवाना निषिद्ध है (११५) । देवोद्देश से बने कुएँ और नदी का जल सभी पी सकते हैं और इन जलाशयों के निकट रहनेवाले उनसे सिंचाई करने के अधिकारी हैं (११६) । जिस जलाशय से सिंचाई करने से लोगों को जल की कमी अनुभव हो, उससे निकट के लोग भी सिंचाई नहीं कर सकते (११७) । अंशी लोगों की सम्मति के बिना अविभक्त सम्पत्ति को रेहन रखना या बेचना अवैध है। इसी प्रकार जिस सम्पत्ति का स्वामित्व या परि- माण निर्दिष्ट नहीं है, उसका बेचना या बन्धक रखना अप्रामाणिक होता है (११८) । बन्धक वस्तु को जानकर नष्ट करने पर राजा उस नष्ट करनेवाले व्यक्ति से उस वस्तु के स्वामी को उसका मूल्य दिलाए (११६)। बन्धक करनेवाले की सम्मति से बन्धक पशु आदि वस्तु को उपयोग में लानेवाला व्यक्ति ही उस पशु का पोषण करेगा (१२०) । जब कोई काल और लाभ के नियम की उपेक्षा कर लाभ के लिए स्थावर-अस्थावर सम्पत्ति को लगाएगा,

तेरहवां उल्लास : 'देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०१ तो वह लाभ अन्यथा होगा (१२१) । पिता की मृत्यु होने पर सभी भागीदारों की सम्मति के बिना सामान्य संपत्ति को नहीं लगाया जा सकता (१२२) । हे पार्वति ! यदि बहुमूल्य वस्तु कम मूल्य में या कम मूल्य की वस्तु बहुत मूल्य में बिके, तो राजा उसे अन्यथा करने में समर्थ है (१२३) । जिस प्रकार शरीर का जन्म और मरण एक ही बार होता है, उसी प्रकार दान और कन्या का ब्राह्म विवाह एक ही बार होता है (१२४) । जिसके एक ही पुत्र है, वह पुत्र का दान नहीं कर सकता ; जिसके एक ही स्त्री है, वह स्त्री का दान करने में समर्थ नहीं होता। जो पितरों का हित चाहता है, वह एक ही कन्या होने पर उसे शैव विवाह में नहीं दे सकता (१२५) । देव कार्य में, पितृ-कार्य में, वाणिज्य में—विशेषतः राज-द्वार में प्रतिनिधि जो कुछ करेगा, वह उसके नियुक्त करनेवाले का ही किया माना जायगा (१२६)। हे सुव्रते ! प्रतिनिधि को नियुक्त करनेवाले के दोष के लिए प्रतिनिधि या दूत दंडनीय नहीं है, यह नित्य विधि है (१२७) । ऋण, कृषि-कार्य, वाणिज्य और अन्य सभी कार्यों में धर्म-सम्मत जो कुछ स्वीकार किया गया है, उसे करना होगा (१२८) । जगदीश्वर जगत् की रक्षा करते हैं। जो इस जगत् को नष्ट करना चाहते हैं, वे स्वयं विनष्ट हो जाते हैं। ईश्वर द्वारा पालित जगत् के रक्षकों की रक्षा जगदीश्वर करते हैं। अतः सदैव जगत् के हित में लगे रहना चाहिए (१२६) । ☸ ☸ ☸ तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि सभी निगमों के सार एवं स्वर्ग और मोक्ष के एकमात्र कारण-स्वरूप बातों के बतानेवाले देवदेव महेश्वर से कलि द्वारा मलीन जीवों की पवित्रता के लिए एकाग्र-चित्त त्रिभुवन-जननी पार्वती ने भक्ति-पूर्वक कहा (१) —महद्-योनि अर्थात् महत्-तत्त्व की उत्पादिका आदि-शक्ति अर्थात् मूल प्रकृति महा-द्युति एवं सूक्ष्म से भी सूक्ष्मा अर्थात् सर्वथा दुर्ज्ञेया 'महा-काली' का रूप-निरूपण किस प्रकार होगा (२) ? हे देव ! प्रकृति के कार्य का अर्थात् घट-पट आदि का ही रूप होता है, किन्तु 'महा-काली' साक्षात् परात्परा अर्थात् प्रकृति-रूपा है, अतः रूप होना असम्भव है। इस विषय में मुझे विशेष सन्देह है। हे देव ! आप मेरे इस संदेह को विशेष रूप से दूर करें (३) । श्रीसदाशिव ने कहा—हे प्रिये ! पहले ही बताया है कि उपासकों के कार्य के लिए गुण व क्रिया के अनुसार देवी का रूप कल्पित होता है (४) । हे शैलजे ! सफेद, पीले आदि रङ्ग जैसे काले रङ्ग में लुप्त हो जाते हैं, वैसे ही सभी भूत 'काली' में प्रविष्ट हैं (५) । इसी से उस निर्गुणा, निराकारा, योगियों की हित-कारिणी, काल-शक्ति का रङ्ग काला कहा गया है (६) । नित्या, काल-रूपा, अव्यया और कल्याण-रूपा इस 'काली' के मस्तक पर चन्द्र-कला का चिह्न अमृत को सूचित करता है (७) । नित्य-स्वरूप चन्द्र, सूर्य और अग्नि द्वारा काल- सम्भूत सारा जगत् दिखाई देता है, इसी से 'काली' के तीन नेत्र कल्पित हुए हैं (८) । सभी प्राणियों को ग्रास करने और काल-दंड द्वारा चबाने से सब प्राणियों का रक्त ही महेश्वरी के लाल वस्त्र से ज्ञात होता है (६) । हे शिवे ! समय-समय पर विपत्ति से जीवों की रक्षा करने और अपने-अपने कार्य में जीवों को प्रेरित करने की बात

१०२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र उनके वर और अभय से स्पष्ट होती है (१०) । हे भद्रे ! वे रजो गुण से उत्पन्न विश्व में रहती हैं, इसी से कहा है कि वे लाल कमल के आसन पर बैठी हैं (११) । ज्ञान-स्वरूपा, सब लोगों की साक्षि-स्वरूपिणी वे देवी मोह-मयी सुरा को पीकर क्रीडा करनेवाले काल से उत्पन्न जगत् को देखती हैं (१२) । अल्पबुद्धि भक्तों के हित के लिए उक्त प्रकार गुणानुसार उन भगवती के अनेक प्रकार के रूप कल्पित हुए हैं (१३) । श्री देवी ने कहा—जीवों के उद्धार के लिये आपने 'आद्या कालिका' का जो ध्यान बताया है, यदि उसी के अनुसार मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या धातु की मूर्ति बनाकर साधक व्यक्ति उसे वस्त्र और अलङ्कार से विभूषित कर सुन्दर घर बनाकर उसमें देवेशी को उस मूर्ति को स्थापित करे, तो उसका क्या फल होगा ? हे प्रभो ! किस विधि से उस मूर्ति की 'प्रतिष्ठा' करनी होगी, यह कृपया मुझे बताइए (१४-१६) । आपने पहले बावली, कुएँ, घर, उद्यान और देव-प्रतिमा की प्रतिष्ठा का उल्लेख किया है, किन्तु विशेष रूप से नहीं बताया है (१७) । हे परमेश्वर ! मैं आपके मुख से उनका विधान भी सुनना चाहती हूँ। यदि आपकी रुचि हो, तो कृपया बताइए (१८) । श्री सदाशिव ने कहा—हे परमेश्वरि ! तुमने जो जानना चाहा है, वह बहुत गोपनीय है। तुम्हारे स्नेह से मैं उसे बताता हूँ। तुम एकाग्र होकर सुनो (१६) । इस भू-मण्डल पर मनुष्य दो प्रकार के हैं—१. सकाम, २. निष्काम । निष्काम लोगों को मोक्ष-पद और कामी लोगों को जैसा फल मिलता है, वह कहता हूँ (२०) । हे प्रिये ! जो व्यक्ति जिस देवता की मूर्ति की प्रतिष्ठा करता है, वह उसी देवता के लोक को और उस लोक को भोग्य वस्तुओं को पाता है (२१) । मृण्मयी (मिट्टी की) प्रतिमा प्रतिष्ठित करनेवाला दस हजार कल्पों तक स्वर्ग में रहता है। लकड़ी, पत्थर और धातु की प्रतिमा का फल क्रमशः दस-दस गुना अधिक है अर्थात् लकड़ी की प्रतिमा से एक लाख कल्प तक स्वर्ग में रहता है इत्यादि (२२) । जो व्यक्ति देवता की प्रसन्नता के लिए या किसी कामना से ध्वज और वाहन के साथ तृण-काष्ठादि का घर बनाकर उत्सर्ग करता है या इस प्रकार के उत्कृष्ट घर का संस्कार कराता है, उसका पुण्य सुनो (२३) । हे परमेश्वरि ! जो व्यक्ति तृणादि से बने घर को दान करता है, वह बहुत हजार कोटि वर्षों तक देवलोक में रहता है (२४) । ईंट का बना गृह दान करने से इससे सौ गुना अधिक फल होता है । पत्थर के गृह-दान का फल इससे दस हजार गुना अधिक है (२५) । हे आद्ये ! सेतु और संक्रम (विशेष प्रकार का सेतु) बनानेवाले को यम-लोक नहीं देखना पड़ता । वह सुखपूर्ण देवलोक को पाकर स्वर्ग-वासियों के साथ आनन्द करता है (२६) । वृक्ष और उपवन की प्रतिष्ठा करने- वाला देव-लोक में जाकर कल्प-वृक्षों से युक्त दिव्य घर में रहता हुआ अपनी मनचाही सभी सुन्दर भोग्य वस्तुओं का उपभोग करता है (२७) । सब प्राणियों को प्रसन्नता के लिए जो जलाशय दान करता है, वह पापों से छूट- कर ब्रह्म-लोक को जाता है और उस जलाशय में जितनी बूँदें होती हैं, उतने सौ वर्षों तक वहाँ रहता है (२८) । हे देवि ! जो व्यक्ति देवता की प्रीति के लिए कोई वाहन देता है, वह उस देवता से रक्षित होकर उसी के लोक में चिरकाल तक रहता है (२६) । इस भू-मण्डल पर मिट्टी के वाहन देने का जो फल है, उसका दस गुना फल लकड़ी का वाहन दान करने से और प्रस्तर-वाहन के दान से उसका भी दस गुना अधिक फल होता है (३०) । पीतल, कांसे, ताम्बे आदि धातु से बने देव-वाहन के दान से क्रमशः सौ गुना अधिक फल होता है (३१) । श्रेष्ठ साधक भगवती के मन्दिर में 'महा-सिंह', शिव-मन्दिर में 'वृषभ' और विष्णु-मन्दिर में 'गरुड़' का निर्माण कराकर दान में देता है (३२) । जिसके सभी दाँत तीक्ष्ण हैं, मुख-मण्डल भीषण है, कन्धे केशरों से सुशोभित हैं, चार पैर हैं, नाखून वज्र के समान हैं—वह 'महा-सिंह' कहा जाता है (३३) । दो सींगें ही जिसके अस्त्र हैं, शरीर श्वेत वर्ण का है, चार पैर हैं, खुर काले रंग के हैं, बड़ा भारी ककुद है, पूंछ काली है, कन्धे

तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०३ श्याम रंग के हैं—वह 'वृषभ' कहलाता है (३४)। जिसकी जाँघ पक्षी के समान, मुख मनुष्य के समान, नाक लम्बी है और दो पंखों से युक्त अञ्जलि बनाकर जो दोनों पैरों को सिकोड़कर बैठा है—उसे 'गरुड़' कहते हैं (३५) । देवालय को ध्वज, पताका का दान करने से देवता को सौ वर्ष तक रहनेवाली प्रसन्नता होती है। बत्तीस हाथ ऊँचे रङ्ग-बिरंगे, सुदृढ़, छिद्र-रहित, देखने में सुन्दर, लाल वस्त्र से लपेटे हुए और आगे के भाग में विष्णु के चक्र से युक्त ध्वज-दण्ड का निर्माण करे (३६-३७)। ऐसे ध्वज-दण्ड के अगले भाग में सम्बन्धित देवता के वाहन के चिह्न से युक्त पताका लगाए। जिसका मूल-भाग प्रशस्त और अगला भाग सूक्ष्म है; जो सुन्दर वस्त्र से बनी ध्वज के आगे शोभा पाती है—वही 'पताका' कही जाती है (३८) । जो वस्त्र, अलङ्कार, पर्यङ्क, यान, सिंहासन, पान-पात्र, भोजन-पात्र, ताम्बूल-पात्र, पीकदान, मणि-मुक्ता- प्रवाल आदि रत्न और अन्य दूसरी अपनी प्रिय वस्तुएँ देवता को श्रद्धा-भक्ति के साथ दान करता है, वह उस देवता के लोक में पहुँचकर उन्हीं वस्तुओं का कोटि गुना फल पाता है (३६-४०) ! कामियों का फल स्वप्न में प्राप्त राज्य के समान क्षय होनेवाला होता है। निष्कामियों को पुनर्जन्म-रहित निर्वाण-मुक्ति मिलती है (४१) । जलाशय, गृह, आराम, सेतु, संक्रम, वृक्ष और देव-प्रतिष्ठा के समय 'वास्तु-दैत्य की पूजा' करे। जो वास्तु-पूजा न करके देव-प्रतिष्ठा आदि कर्म करता है, उसके उस कर्म में वास्तु-देव अपने गणों के साथ विघ्न डालते हैं। (४२-४३) । १. कपिलास्य, २. पिङ्ग-केश, ३. भीषण, ४. रक्त-लोचन, ५. कोटराक्ष, ६. लम्ब-कर्ण, ७. दीर्घ-जङ्घ, ८. महोदर, ६. अश्व-तुण्ड, १० काक-कण्ठ, ११. वज्र-बाहु, १२. वृतान्तक—इन सभी वास्तु- देव के गणों का यत्न-पूर्वक पूजन करे (४४-४५) । जिस मण्डल में वास्तुदेव की पूजा करनी चाहिए, उसे कहता हूँ, सुनो (४६) — वेदी या पानी से लिपी हुई किसी सम-तल भूमि पर वायु-कोण से ईशान-कोण तक एक हाथ लम्बी रेखा सूत्र-पात द्वारा बनाए (४७) । ईशान-कोण से अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण से नैर्ऋत-कोण तक और नैर्ऋत-कोण से वायु-कोण तक एक-एक रेखा बनाकर एक चतुष्कोण मण्डल बनाए (४८-४६) । हे देवि ! इस मण्डल के एक कोने से दूसरे कोने तक दो रेखाएँ खींचकर मण्डल को चार भागों में इस प्रकार बाँटे कि उस स्थल पर मछली के पूंछ के चार आकार बन जायँ (५०) । उक्त पुच्छ-मूल के भेद कर पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा तक और उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा तक दो रेखाएँ खींचे (५१) । फिर कोण-रेखा-युक्त चतुष्कोणों में कर्णाकर्णि चार रेखाएँ और मध्य स्थल में पश्चिम से पूर्व तक और उत्तर से दक्षिण तक दो रेखाएँ खींचे (५२) । इस प्रकार उक्त मण्डल के सोलह कोष्ठ बनाकर पञ्च-वर्णों के चूर्ण द्वारा उत्तम यन्त्र की रचना करे (५३) । फिर मध्य के चतुष्कोण में एक सुन्दर चतु- र्दल-पद्म अङ्कित करे, जिसकी कर्णिका पीले और लाल रंग की तथा केशर लाल रंग की हो (५४) । तब पद्म के सभी दलों को सफेद या पीले रंग का करे। फिर पद्म के सन्धि-स्थानों को इच्छानुसार रंगों से भरे (५५) । तब ईशान कोण के कोष्ठक से आरम्भ कर बारह कोष्ठ क्रमशः श्वेत, कृष्ण, पीत, रक्त-इन चार रंगों से पूरे (५६) । हे प्रिये ! दक्षिणावर्त्त-क्रम से इन सभी कोष्ठों को पूरे। फिर वामावर्त्त-क्रम से उसमें देव-गण की पूजा करे (५७) । पहले विघ्न की शान्ति के लिए पद्म में वास्तु-दैत्य की और ईशान कोण से आरम्भ कर (वामावर्त-क्रम से) बारह कोष्ठों में कपिलास्य आदि दानवों की पूजा करे (५८) । तब कुशाण्डिकोक्त विधि से अग्नि का संस्कार कर यथा-शक्ति आहुतियाँ देकर 'वास्तु-यज्ञ' समाप्त करे (५६) । हे देवि ! तुमसे यह मंगल-दायिनी 'वास्तु-पूजा' कही गई। इसके करने से मनुष्य वास्तु के विघ्नों से पीड़ित नहीं होता (६०) ।

१०४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र देवी ने कहा—हे नाथ ! वास्तु-देव का मण्डल और वास्तु-पूजा की विधि आपने बताई किन्तु वास्तुदेव का ध्यान आपने नहीं कहा। अब इसे प्रकट करें (६१)। श्री सदाशिव ने कहा--हे महेश्वरि ! वास्तु-राक्षस का ध्यान कहता हूँ, सुनो, जिसका अनुशीलन करने से सारी आपत्तियाँ तुरन्त नष्ट हो जाती हैं (६२)— चतुर्भुजं महा-कायं जटा-मण्डित-मस्तकम् । त्रिलोचनं करालास्यं हार-कुण्डल-शोभितम् ॥ लम्बोदरं दीर्घ-कर्णं लोमशं पीत-वाससम् । गदा-त्रिशूल-परशु-खट्वाङ्गं दधतं करैः ॥ असि-चर्म-धरैर्वीरैः कपिलास्यादिभिर्युतम् । शत्रूणामन्तकं साक्षादुद्यदादित्य-सन्निभम् ॥ ध्यायेद् देवं वास्तु-पतिं कूर्म-पद्मासन-स्थितम् । अर्थात् चतुर्भुज, विशाल-काय, जटा-जूट से विभूषित मस्तक, त्रिनेत्र, भयानक मुख, हार और कुण्डल से विभूषित, लम्बोदर, दीर्घ-कर्ण, लोमश, पीत-वस्त्र, चार हाथों में गदा, त्रिशूल, परशु और खट्वाङ्ग, खड्ग-चर्म-धारी, कपिलास्य आदि वीर-गणों से वेष्ठित, शत्रु-संहार-कारी, साक्षात् उदय होते हुए सूर्य के समान तेजस्वी, कूर्म के ऊपर पद्मासन पर बैठे हुए 'वास्तु-पति देव' का ध्यान करना चाहिए। महामारी, रोग, डाकिनी-भय, उपद्रव, सन्तान के दोष, सर्प या राक्षस-भय के होने पर उक्त प्रकार का ध्यान कर सपरिवार 'वास्तु-देव' को पूजा करे (६३-६७)। फिर तिल, घृत और पायस से होम करे, तो सभी बातों में शान्ति मिलती है। हे सुव्रते ! पूर्वोक्त कर्मों में जिस प्रकार 'वास्तु-पुरुष' पूज्य हैं, उसी प्रकार 'नव-ग्रह', 'दश-दिक्पाल' और 'ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, वाग्-देवी, लक्ष्मी, शङ्करी, मातृ-गण, गणेश' व 'वसु-गण' भी पूजनीय हैं। हे कालिके ! उक्त सभी कर्मों में यदि 'पितृ-गण' तृप्त नहीं हैं, तो कर्त्ता का सभी कुछ व्यर्थ जाता है और उसके पग-पग पर विघ्न आते हैं, अतः हे महेश्वरि ! यत्न करके उक्त संस्कार-कर्मों में और इसमें 'पितृ-गण' की तृप्ति के लिए 'आभ्युदयिक श्राद्ध' करें। अब सर्व-शान्ति-विधायक 'ग्रह-यन्त्र' बताता हूँ (६८-७२), जिसमें 'ग्रह-गण' और 'इन्द्रादि दिक्-पाल- गण' पूजित होकर वांञ्छित वर देते हैं (७३)। तीन त्रिकोण बनाकर उनके बाहर एक वृत्त बनाए। उस वृत्त के बाहर उससे लगे हुए आठ दल (पंखड़ियाँ) बनाए। उनके बाहर चार द्वारों सहित एक सुन्दर भूपुर बनाए (७४)। भूपुर के बाहर पूर्व और ईशान कोण के मध्य में प्रादेश बराबर एक वृत्त बनाए (७५)। फिर पश्चिम और नैर्ऋत कोण के मध्य में भी ऐसा ही एक और वृत्त बनाए (७६)। तब नव-ग्रह के रङ्गों द्वारा इस यन्त्र के नौ कोणों को भरे (७७)। मध्य त्रिकोण को दाईं और बाईं ओर क्रमशः श्वेत और पीत रंग भरे। उसका पीछे का भाग काला रंगे। अष्ट-दलों का अष्ट-दिक्-पाल के रङ्गों से भरे (७८)। श्वेत, रक्त और कृष्ण रंग के चूर्ण से भूपुर की प्राचीर रंगे। हे देवि ! भूपुर के बाहर स्थित प्रादेश-बराबर दोनों वृत्तों के ऊपर और बीच के भागों को क्रमशः रक्त और श्वेत रङ्ग का बनाए। सारे सन्धि-स्थानों को स्वेच्छानुसार रंग से भरे (७६-८०)। जिस प्रकोष्ठ में जिस ग्रह का और जिस दल में जिस दिक्-पाल की पूजा करनी है तथा जिस द्वार में जिस देवता की स्थिति है, उनका क्रम अब बताता हूँ, सुनो (८१) - मध्य कोण में 'सूर्य' की पूजा करे, उनके दोनों ओर 'अरुण' और 'शिखा' की पूजा करे। सूर्य के पीछे के भाग में 'प्रचण्ड' और 'उद्दण्ड' की पूजा करे (८२)। सूर्य के ऊर्ध्व-कोण में पूर्व-दिशा में 'चन्द्र' का, अग्नि-कोण में 'मङ्गल' की, दक्षिण दिशा में 'बुध' की, नैर्ऋत-कोण में 'बृहस्पति' को, पश्चिम दिशा में 'शुक्र' की, वायु-कोण में 'शनि' की, उत्तर-दिशा में 'राहु' को,

तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०५ ईशान-कोण में 'केतु' की और चन्द्र के चारों ओर 'नक्षत्र-मण्डल' की पूजा करे । (८३-८४) । १. 'सूर्य' रक्त-वर्ण, २. 'चन्द्र' श्वेत-वर्ण, ३. 'मङ्गल' अरुण-वर्ण, ४. 'बुध' पाण्डु-वर्ण, ५. 'बृहस्पति' पीत-वर्ण, ६ 'शुक्र' श्वेत-वर्ण, ७. 'शनि' कृष्ण-वर्ण, ८. 'राहु' और 'केतु' अनेक-वर्ण हैं । 'सूर्य' के दो हाथों में दो पद्म और दो हाथों में वर-अभय हैं- ऐसा उन्हें चार हाथों वाला ध्यान करे (८५) । 'चन्द्र' के दो हाथों में वर-मुद्रा और अमृत का ध्यान करे । 'मङ्गल' को कुछ कुबड़े शरीरवाला और दोनों हाथों से दण्ड लिए ध्यान करे । 'बुध' को बाल-रूप और ललाट पर गिरे हुए घुँघराले केशों सहित ध्यान करे (८६-८७) । 'बृहस्पति' को यज्ञोपवीत-युक्त और दो हाथों में पुस्तक और अक्ष-माला लिए ध्यान करे । 'शुक्र' का भी ध्यान ऐसा ही करे । शनि को काना और खञ्ज ध्यान करे (८८) । 'राहु' को विकृत, क्रूर-कर्मा मस्तक के रूप में और 'केतु' को, विकृत, क्रूर-कर्मा धड़ के रूप में ध्यान करे । उत्तम साधक उक्त प्रकार नौ ग्रहों का ध्यानपूर्वक पूजन कर अष्ट-दलों में पूर्वादि-क्रम से इन्द्रादि दिक्- पालों की पूजा करे । १. पीत-वर्ण 'इन्द्र' को सहस्राक्ष, ऐरावतारूढ़, पीले रेशम वस्त्र पहने, हाथ में वज्र लिए ध्यान कर उनकी पूजा करे । २. रक्त-वर्ण 'अग्नि' को छागारूढ़, हाथ में शक्ति लिए और ३. कृष्ण-वर्ण 'यम' को महिषारूढ़, हाथ में दण्ड लिए ध्यान करे । ४. श्याम-वर्ण 'निरृति' को अश्वारूढ़ खड्ग लिए; ५. शुक्ल-वर्ण 'वरुण' को मकरारूढ़, पाश लिए; ६ कृष्ण-वर्ण 'वायु' को मृगारूढ़, अंकुश लिए; ७. सुवर्ण-वर्ण 'कुबेर' को रत्न- सिंहासनारूढ़, यक्षों द्वारा स्तुत, पाश व अंकुश लिए; ८. शुक्ल-वर्ण 'ईशान' को वृषारूढ़, व्याघ्र-चर्म पहने, त्रिशूल व वर-मुद्रा लिए ध्यान करे (८६-६५) । इन सबकी ध्यानपूर्वक यथा-क्रम पूजा कर भूपूर के बाहर ऊर्ध्व और अधो वृत्त में क्रमशः 'ब्रह्मा' और 'अनन्त' की पूजा करे । तब द्वार-देवताओं को पूजा करे (६६) - १ उग्र, २ भीम, ३ प्रचण्ड, ४ ईश-ये चार पूर्व-द्वारी; १ जयन्त, २ क्षेत्रपाल, ३ नकुलेश, ४ बृहत्-शिरा - ये दक्षिण-द्वारी; १ वृक, २ अश्व, ३ आनन्द, ४ दुर्जय-ये पश्चिम-द्वारी; १ त्रिशिरा, २ पुरुजित, ३ भीमनाद, ४ महादेव-ये उत्तर-द्वारी हैं । ये सभी द्वार- देवता शस्त्रधारी हैं (६७-६८) । हे सुव्रते ! ब्रह्मा और अनन्त के ध्यान सुनो :- रक्तोत्पल-निभो ब्रह्मा चतुरास्यश्चतुर्भुजः । हंसारूढो वराभीति-माला-पुस्तक-पाणिकः ।। अर्थात् 'ब्रह्मा' रक्त-कमल के समान प्रभाववाले, चतुर्मुख, चतुर्भुज, हंस पर आसीन हैं और हाथों में वर, अभय, अक्षमाला व पुस्तक लिए हैं (६६-१००) । हिम-कुन्देन्दु-धवलः सहस्राक्षः सहस्र-पात् । सहस्र-पाणि-वदनो ध्येयोऽनन्तः सुरासुरैः ।। अर्थात् 'अनन्त' हिम, कुन्द, पुष्प और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल वर्णवाले, सहस्र-नेत्र, सहस्र-चरण, सहस्र-मुख हैं और सुर व असुरों द्वारा ध्येय हैं (१०१) । हे प्रिये ! ध्यान, पूजा-विधि और यन्त्र का वर्णन हो चुका । अब 'वास्तु' से लेकर 'अनन्त' तक सब देवों के मन्त्र भी सुनो (१०२)- १ वास्तु-मन्त्र-क्षाँ क्षीँ क्षूँ क्षैँ क्षौं क्षः । २ सूर्य-मन्त्र-ॐ ह्रीँ तिग्म-रश्मे आरोग्यदाय स्वाहा ३ सोम-मन्त्र-क्लीँ ह्रीँ ऐँ अमृत-कराऽमृतं प्लावय प्लावय स्वाहा ४ मङ्गल-मन्त्र-ऐँ ह्राँ ह्रीँ सर्व-दुष्टान् नाशय नाशय स्वाहा फा०-१४

१०६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र ५ बुद्ध-मन्त्र—ह्रीँ श्रीँ सौम्य सर्वान् कामान् पूरय स्वाहा ६ वृहस्पति-मन्त्र—ॐ ऐँ ॐ सुर-गुरो अभीष्टं यच्छ यच्छ स्वाहा ७ शुक्र-मन्त्र—शाँ शीँ शूं शैँ शौँ शः ८ शनि-मन्त्र—ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ सर्व-शत्रून् विद्रावय विद्रःवय मार्तण्ड-सूनवे नमः ९ राहु-मन्त्र—राँ ह्राँ भ्रौं ह्रीँ सोम-शत्रो शत्रून् विध्वंसय विध्वंसय राहवे नमः १० केतु-मन्त्र—हूँ ह्लूँ कैँ केतवे स्वाहा ११ दश-दिक्पाल-मन्त्र—१ लं इन्द्राय नमः, २ रं अग्नये नमः, ३ मृं यमाय नमः, ४ स्त्रूं निर्ऋतये नमः, ५ वं वरुणाय नमः, ६ यं वायवे नमः, ७ क्षं कुबेराय नमः, ८ ह्रौं ईशानाय नमः, ६ ब्रीं ब्रह्मणे नमः, १० अं अनन्ताय नमः। (१०३-१३) अन्य परिवार-देवताओं के नाम ही उनके मन्त्र हैं। जहाँ मन्त्र नहीं बताया है, वहाँ नाम ही मन्त्र होता है (११४)। जिस मन्त्र के अन्त में 'नमः' लगा है, उसमें 'नमः' न जोड़े। इसी प्रकार स्वाहान्त मन्त्र में 'स्वाहा' शब्द न जोड़े (११५)। नौ ग्रहों और दश दिक्पालों को उनके वर्ण के अनुरूप रङ्ग के पुष्प, वस्त्र व आभूषण दें अन्यथा वे प्रसन्न नहीं होते (११६)। ज्ञाना व्यक्ति कुशण्डिकोक्त विधि से वह्नि-स्थापन कर विविध पुष्पों व समिधा द्वारा होम करे (११७)। शान्ति और पुष्टि-कर्मों में 'वरद' नामक अग्नि, प्रतिष्ठा-कर्म में 'लोहिताक्ष' नामक और क्रूर कर्मों अर्थात् अभिचारादि म 'शत्रुहा' नामक अग्नि में होम करे (११८)। हे महेशानि ! शान्ति, पुष्टि व क्रूर कर्मों में 'ग्रह-याग' करने से अभीष्ट फल मिलता है (११६)। प्रतिष्ठा- कार्यों में जैसे देव-पूजा और पितृ-तर्पण अर्थात् आभ्युदयिक श्राद्ध कर्त्तव्य हैं वैसे ही वास्तु-याग और ग्रह-याग में भी करे (१२०)। यदि एक ही दिन दो-तीन प्रतिष्ठा व वास्तु-यागादि करने हों, तो उन सब कार्यों के लिए एक बार देव-पूजन, पितृ-श्राद्ध और अग्नि-संस्कार करे (१२१)। फल चाहनेवाले व्यक्ति जलाशय, गृह, उपवन, सेतु, संक्रम, वृक्ष, वाहन और अन्य दूसरी देय वस्तु को 'प्रोक्षण' किये बिना देवता को न दे (१२२-१२३)। सभी काम्य कर्मों में पूरा फल पाने के लिए विधि-वाक्य के अनुसार 'सङ्कल्प' करे (१२४)। शोधित और अर्चित द्रव्य का नामोल्लेख कर 'सम्प्रदाय' अर्थात् जिसे दान देना है, उसक नाम का उच्चारण कर दान करने से ठीक फल मिलता है (१२५)। जलाशय, गृह, उपवन, सेतु, संक्रम और वृक्ष के 'प्रोक्षण-मन्त्र' कहते हैं। इन सभी मन्त्रों का प्रयोग 'ब्रह्म-विद्या' अर्थात् गायत्री के साथ करे (१२६)। १ जलाशय-प्रोक्षण-मन्त्र—'जीवनाधार ! जीवानां जीवन-प्रद ! वरुण ! प्रोक्षणे तव तृ प्यन्तु जल- चर-भूचर-खेचराः ।।' अर्थात् हे जलाधार ! हे प्राणियों के जोवन-दाता ! हे वरुण ! तुम्हारे प्रोक्षण से जल-चर, भू-चर और खेचर सभी तृप्त हों (१२७)। २ गृह-प्रोक्षण-मन्त्र—'तृण-काष्ठादि-सम्भूत वासेय ! ब्रह्मणः प्रिय ! त्वां प्रोक्षयामि तोयेन प्रीतये भव सर्वदा ।।' अर्थात् हे तृण-काष्ठादि-सम्भूत रहने योग्य गृह ! हे ब्रह्मा के प्रिय ! तुम्हें जल से प्रोक्षित करता हूँ। सदा मुझे प्रसन्न रखो (१२८)। ईंट का गृह हो तो 'इष्ठकादि-सम्भूत' कहे (१२६)। ३ उपवन-प्रोक्षण-मन्त्र—'फलैः पत्रैश्च शाखाभिश्छायाभिश्च प्रियङ्कराः । यच्छन्तु मेऽखिलान् कामान् प्रोक्षितास्तीर्थ-वारिभिः ।' अर्थात् फल, पत्तों, डालियों और छायाओं द्वारा प्रसन्न करनेवाले हे उपवन ! तीर्थ-

तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि | १०७ जल से प्रोक्षित होकर मेरी सभी इच्छाओं को पूरा करो (१३०)। ४ सेतु-प्रोक्षण-मन्त्र—'सेतुस्त्वं भव-सिन्धूनां पारदः पथिक-प्रियः। मया संप्रोक्षितः सेतो ! यथोक्त- फलदो भव ।।' अर्थात् हे सेतु ! तुम ससार-सागर से पार करनेवाले, पथिकों के प्रिय हो। मुझसे प्रोक्षित होकर निर्दिष्ट फल-दाता बनो (१३१)। ५ संक्रम-प्रोक्षण-मन्त्र—'संक्रम ! त्वां प्रोक्षयामि लोकानां संक्रमं यथा । ददासीह तथा स्वर्गे संक्रमो मे प्रदीयताम् ।।' अर्थात् हे संक्रम ! तुम्हें प्रोक्षित करता हूँ। इस संसार में जैसे लोगों को पार करते हो, वैसे ही मुझे स्वर्ग में गति प्रदान करो (१३२) । हे प्रिये ! उपवन-प्रोक्षण-मन्त्र का ही प्रयोग वृक्ष के संस्कार में करे (१३३)। हे अम्बिके ! सर्व-साधारण द्रव्य के प्रोक्षण का मन्त्र है—ॐ वं फट् (१३४)। 'वाहन' यदि स्नान कराने योग्य हो, तो उसे गायत्री मन्त्र से स्नान कराये; स्नान कराने योग्य न हो, तो कुशाग्र से अर्घ्य-जल द्वारा उसे शोधित करे (१३५)। प्राण-प्रतिष्ठा कर उस 'वाहन' का नामोल्लेख कर, पूजाकर और सजाकर उसे देवता को प्रदान करे (१३६)। जलाशय की प्रतिष्ठा में जल-जन्तु के अधिपति 'वरुण देव', गृह-प्रतिष्ठा में 'ब्रह्मा प्रजापति' और उपवन, सेतु, संक्रम-प्रतिष्ठा में त्रिभुवन-रक्षक सर्वात्मा, सर्वज्ञ प्रभु 'विष्णु' पूजनीय हैं (१३७) । देवी ने कहा—विविध विधान आपने बताये हैं, किन्तु कर्मों का 'क्रम' नहीं बताया है (१३८) । क्रम- रहित कर्म बहुत प्रयत्न के साथ करने पर भी पूरा फल नहीं देता (१३६) । श्री सदाशिव ने कहा — हे परमेश्वरि ! माता के समान हित करनेवाली ! तुमने क्रमानुसार कार्य करने की जो बात पूछी है, वह लोगों के लिए बड़ी मङ्गलकारी है (१४०) । हे देवि ! 'वास्तु-याग' से लेकर उक्त सभी कार्यों के अनुष्ठान का क्रम मैं बताता हूँ (१४१)। पूर्व-दिन में आहार-संयम कर अगले दिन प्रातः स्नान करे । फिर पूर्वाह्न-कर्म सम्पन्न कर गुरु और नारायण की पूजा करे (१४२) । तब अपनो कामना का उल्लेख करते हुए विधिपूर्वक सङ्कल्प कर गणेशादि की पूजा करे (१४३) । गणेश का ध्यान— बन्धूकाभं त्रिनेत्रं द्विरद-वर-मुखं नाग-यज्ञोपवीतं, शङ्खं चक्रं कृपाणं विमल-सरसिजं हस्त-पद्मैर्दधानम् ॥ उद्यद्-बालेन्दु-मौलिं दिनकर-किरणोद्दीप्त-वस्त्राङ्ग-शोभं, नानालङ्कार-युक्तं भजत गण-पतिं रक्त-पद्मोपविष्टम् ॥ अर्थात् बन्धूक पुष्प के समान रक्त-वर्ण, त्रिनेत्र, गजेन्द्र-वदन, सर्प-मय-यज्ञोपवीत-धारी, चार कर-कमलों में शङ्ख, चक्र, खड्ग और खिला हुआ कमल लिए, उदोयमान बाल-चन्द्र से शोभित मस्तक, सूर्य की किरणों के समान उज्ज्वल वस्त्र और विविध आभूषणों से शोभित शरीर, रक्त कमल पर विराजमान गणपति का भजन करता हूँ (१४४)। इस प्रकार गणेश का ध्यान कर यथा-शक्ति उनकी पूजा करे। फिर ब्रह्मा-सरस्वती और विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करे (१४५)। शिव, नव-दुर्गा, षोडश-मातृका और घृत-धारा से वसु-गण की पूजा कर आभ्युदयिक करे (१४६)। तब उक्त विधि के अनुसार वास्तु-राक्षस के मण्डल को बनाकर उसमें सपरिवार वास्तु-देव की पूजा करे (१४७)। फिर स्थण्डिल में पूर्ववत् अर्थात् कुशाण्डिकोक्त विधि से अग्नि-संस्कार व धारा-होम तक के कर्म समाप्त

१०८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कर वास्तु-होम आरम्भ करे (१४८) । वास्तु को, वास्तु के परिवार-गण को और पूजित देवतादि को यथा-शक्ति आहुति देकर कर्म समाप्त करे (१४६) । वास्तु-याग में पृथक् भाव से कर्तव्य यह 'क्रम' तुमसे मैंने कहा। हे प्रिये ! ग्रह-यज्ञ में भी यही 'क्रम' विहित है। ग्रह-याग में ग्रहों को प्रधानता होने से अङ्ग-भाव में उनकी पूजा मना है, अतः सङ्कल्प के बाद अङ्ग-भाव से वास्तु-दैत्य की पूजा कर्तव्य है—यह विशेषता है (१५०-५१) । गणेशादि देव-पूजादि सभी कर्म वास्तु-याग के विधान के अनुसार होंगे। ग्रहादि के यन्त्र, मन्त्र और ध्यान पहले हो बताए हैं (१५२) । प्रसङ्ग- क्रम से ग्रह-याग और वास्तु-याग का 'क्रम' कहा जायगा। अब पूर्व-प्रस्तावित कर्मों में से 'कूप-संस्कार' की विधि कहता हूँ (१५३) । यथा-विधि सङ्कल्प कर मण्डल पर स्थापित घट या शालग्राम के मध्य में, जिसमें भी रुचि हो, वास्तु-पूजा करे (१५४) । तब गणपति, ब्रह्मा- सरस्वती, हरि-लक्ष्मी, शिव-दुर्गा की पूजा करे और नौ ग्रह, दश दिक्-पाल, मातृ-गण एवं अष्टवसु भी पूजनीय हैं। फिर पितृ-कार्य करे। 'कूप-संस्कार' में 'वरुण' की प्रधानता है, अतः उनकी पूजा विशेष रूप से करे (१५५- ५६) । यथा-शक्ति विविध उपहारों से 'वरुण' की पूजा कर यथा-विधि संस्कृत अग्नि में 'वरुण देवता' के लिए होम करे। पूजित देव-गण में से प्रत्येक को आहुति देकर पूर्णाहुति तक का सारा कार्य कर होम समाप्त करे (१५७-५८) । तब ध्वज-पताका-माल्य-चन्दन-सिन्दूर से चर्चित उत्तम जलाशय को पूर्वोक्त प्रोक्षण-मन्त्र से प्रोक्षित करे (१५६) । फिर अपनी कामना-पूर्ति के लिए या देवता को प्रीति के लिए सभी समयों में प्राणियों को प्रसन्न करनेवाले कृपादि जलाशय को उत्सर्ग करे (१६०) । श्रेष्ठ साधक हाथ जोड़कर प्रार्थना करे कि— सुप्रीयन्तां सर्व-भूता नभो-भू-तोय-वासिनः, उत्सृष्टं सर्व-भूतेभ्यो मयैतज्जालमुत्तमम् । तृप्यन्तु सर्व-भूतानि स्नान-पानावगाहनैः, सामान्यं सर्व-जीवेभ्यो मया दत्तमइदं जलम् । ये च केचिद् विपद्यन्ते स्व-स्व-कर्म-विपाकतः, तत्-पापेर्न प्रलिप्येऽहं सफलास्तु मम क्रिया ॥ अर्थात् खेचर, भूचर, जलचर—सभी प्राणी प्रसन्न हों, सभी प्राणियों के लिए मैं इस उत्तम जल को उत्सर्ग करता हूँ। सभी प्राणी स्नान, अङ्ग-प्रक्षालनादि, पान और अवगाहन कर तृप्त हों। मैं इस जल को सामान्यतः सब जीवों के लिए दान करता हूँ अर्थात् मैं इस भाव से दान करता हूँ कि इस पर सभी जीवों का समान अधि- कार हो। अपने-अपने कर्म-फल से जो कोई व्यक्ति इसमें देह-त्याग करें, उसके पाप में मैं लिप्त न होऊँ। मेरी क्रिया सफल हो। इसके बाद दक्षिणा तक कार्य कर शान्ति-कर्म करने के बाद ब्राह्मण, कौल और भूखे दरिद्र लोगों को भोजन कराए। हे शिवे ! सभी जलाशयों की प्रतिष्ठा का यही 'क्रम' है (१६१-६५) । तड़ागादि की प्रतिष्ठा में नाग, स्तम्भ और जलचर का भी निर्माण करना होता है (१६६) । मत्स्य, मण्डूक, मकर और कूर्म—ये सभी जल-जन्तु या जलचर कर्त्ता की सम्पत्ति के अनुसार धातु के बनवाये (१६७) । मत्स्य-मिथुन और मण्डूक-मिथुन स्वर्ण के, मकर-मिथुन रजत के, कूर्म-मिथुन ताम्र या पीतल के बनवाये (१६८) । इन सब जलचरों के सहित तड़ाग, दीर्घिका, या सागर का उत्सर्ग कर 'सुप्रीयन्तां ०' इत्यादि श्लोकों से प्रार्थना करे। फिर नाग-पूजा करे (१६६)— १ अनन्त, २ वासुकि, ३ पद्म, ४ महा-पद्म, ५ तक्षक, ६ कुलीर, ७ कर्कट, ८ शङ्ख—ये आठ नाग जल के रक्षक हैं (१७०) । आठ अश्वत्थ के पत्तों पर इन नागों के नाम लिखकर प्रणव और गायत्री का स्मरण करते हुए उन पत्तों को घट के मध्य में छोड़ दे (१७१) । चन्द्र और सूर्य को साक्षी कर घट के भीतर विलोडन कर एक

तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि | १०६ पत्ता बाहर निकाले। उस पत्ते में जिस नाग का नाम हो, उसी को जल का रक्षक बनाए (१७२)। तैल, हरिद्रा से लिप्त लकड़ी का एक सीधा, बीस हाथ लम्बा शुभ स्तम्भ लाकर व्याहृति और प्रणव का पाठ करते हुए उसे तीर्थ-जल से स्नान कराये। उस स्नापित स्तम्भ में ह्रीं, श्रीं, क्षमा और शान्ति के साथ नाग की पूजा करे (१७३-७४) । फिर प्रार्थना करे- नाग ! त्वं विष्णु-शय्याऽसि महादेव-विभूषणम् । स्तम्भमेनमधष्ठाय जल-रक्षां कुरुष्व मे । अर्थात् हे नाग ! तुम विष्णु की शय्या और महादेव के अलङ्कार हो। इस स्तम्भ में स्थान बनाकर मेरे जल की रक्षा करो (१७५) । इसके बाद उस नागाधिष्ठित स्तम्भ को जलाशय के मध्य में स्थापित कर कर्त्ता तड़ाग की प्रदक्षिणा करे (१७६)। यह स्तम्भ यदि पहले से स्थापित हो, तो नाग की पूजा घट में कर उस घट का जल तड़ाग में छोड़कर शेष कर्म समाप्त करे (१७७) । इसी प्रकार गृह-प्रतिष्ठा में भी सङ्कल्प कर वास्तु-पूजा से वसु-धारा और आभ्युदयिक तक के कर्म कर वरुण के स्थान पर 'प्रजापति देव' की विशेष रूप से पूजा करे और प्राजापत्य होम करे (१७८-७६)। पूर्वोक्त मन्त्र से गृह को प्रोक्षित और गन्धादि से अर्पित कर ईशान कोण की ओर मुख कर हाथ जोड़ प्रार्थना करे (१८०)- प्रजा-पति-पते गेह ! पुष्प-माल्यादि-भूषितः । अस्माकं शुभ-वासाय सर्वथा सुखदो भव ।। अर्थात् हे प्रजापति-स्वामी के गृह ! तुम पुष्प-माल्यादि से भूषित होकर मेरे शुभ आवास के लिए सब प्रकार से सुखदायक हो (१८१) । तब दक्षिणा तक कर्म कर शान्ति और आशीर्वाद करे। अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मण, कौल और दरिद्रों को भोजन कराये (१८२) । हे शैलजे ! यदि दूसरे के लिए गृह-प्रतिष्ठा हो, तो सङ्कल्प में 'अमुकस्य वासाय' अर्थात् 'अमुक (नामोल्लेख करे) के वास के लिए' ये शब्द जोड़ ले। देवता के लिए निर्मित गृह की प्रतिष्ठा की विधि सुनो (१८३)। उक्त प्रकार गृह-संस्कार कर शंख-तूर्यादि वाद-ध्वनि करते हुए देवता के पास जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (१८४)- उत्तिष्ठ देव-देवेश ! भक्तानां वाञ्छित-प्रद ! आगत्य जन्म-साफल्यं कुरु मे करुणा-निधे ।। अर्थात् हे देव-देवेश ! हे भक्त के अभीष्ट को देनेवाले ! हे दयासागर ! उठिये, आकर मेरे जन्म को सफल बनायें (१८५) । इस प्रकार प्रार्थना कर साधक देवता को गृह के समीप लाकर स्थापन-पूर्वक उसके सम्मुख भाग में वाहन की स्थापना करे (१८६)। गृह के ऊपर त्रिशूल या चक्र स्थापित मन्दिर के ईशान-कोण में पताका-युक्त ध्वजा- रोपण करे (१८७) ! चन्द्रातप, क्षुद्र घण्टे, पुष्प-माल्य और आम्र-पल्लवों से गृह को अच्छी तरह सजाकर दिव्य वस्त्र द्वारा आच्छादन करे (१८८) । आगे बताई विधि से विहित द्रव्यों से उत्तराभिमुख स्थापित देव क, स्नान कराये (१८६)- १. दुग्ध-स्नान- 'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं दुग्धेन स्नापयामि त्वां मातेव परिपालय' अर्थात् दुग्ध से तुम्हें स्नान कराता हूँ, माता के समान मेरा पालन करो-इस मन्त्र से देवता को दूध से स्नान कराए। २. दधि-स्नान - 'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं दध्ना त्वां स्नापयाम्यद्य भव-ताप-हरो भव' अर्थात् दही से तुम्हें आज स्नान कराता हूँ, संसार के दुःख-हारी बनो-इस मन्त्र से देवता को दही से स्नान कराए। ३. मधु-स्नान- 'ऐं ह्रीं श्री मूलं मधुना स्नापितः प्रीतो मामानन्द-मयं कुरु' अर्थात् मधु से स्नान कर

११० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रसन्न हो, मुझे आनन्द-मय करो—इस मन्त्र से देवता को मधु से स्नान कराये । ४. घृत-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं सावित्रीं ॐ देव-प्रियेण हविषा आयुः शुक्रेण तेजसा । स्नानं ते कल्प- यामीश ! मामरोगं सदा कुरु' अर्थात् हे ईश ! देव-प्रिय, आयु, वीर्य और तेज-स्वरूप घृत से तुम्हें स्नान कराता हूँ, मुझे सदा नीरोग रखो—इस मन्त्र से देवता को घृत से स्नान कराये (१६०-६३) । ५. शर्करा-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं व्याहृतिं गायत्रीं देवेश ! शर्करा-तोयैः स्नातो मे यच्छ वांछितम्' अर्थात् हे देवेश ! शर्करा-जल से स्नान कर मुझे मेरा अभीष्ट फल प्रदान करो —इस मन्त्र से देवता को शर्करा-जल से स्नान कराये (१६४) । ६. नारिकेल-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं गायत्रीं वं विधात्रा निर्मितैर्दिव्यैः प्रियैः स्निग्धैरलौकिकैः, नारि- केलोदकैः स्नानं कल्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् ब्रह्मा द्वारा निर्मित दिव्य, प्रिय, स्निग्ध और अलौकिक नारि- केल-जल से तुम्हें स्नान कराता हूँ, तुम्हें नमस्कार है—इस मन्त्र से देवता को नारिकेल-जल से स्नान कराये । ७. इक्षु-स्नान—'गायत्रीं मूलं इक्षुजैः रसैः स्नापयामि' मन्त्र से ईख के रस से देवता को स्नान कराये । ८. कर्परा स्नान—'क्लीं ॐ गायत्रीं मूलं कर्पूरागुरु-काश्मीर-, स्तूरी-चन्दनोदकैः, सुस्नातो भव सुप्रीतो भुक्ति-मुक्ती प्रय ' अर्थात् कपूर, अगुरु, कुंकुम कस्तूरी और चन्दन-युक्त जल से सुस्नात होकर प्रसन्न हों ओर मुझे भोग व मोक्ष प्रदान करें—इस मन्त्र से उक्त प्रकार सुगन्धित जल से देवता को स्नान कराये (१६५-६७) । इस प्रकार आठ कलशों से स्नान कराकर जगत्पति को मन्दिर के भीतर लाकर आसन के ऊपर स्थापित करे (१६८) । देव-प्रतिमा यदि स्नान कराने योग्य न हो, तो यन्त्र में या देवता के मूल-मन्त्र में या शालग्राम शिला में स्नान कराकर पूजा करे (१६६) । दुग्धादि से उक्त प्रकार स्नान कराने में यदि असमर्थ हो, तो यथा-शक्ति शुद्ध जल से भरे हुए आठ, सात या पाँच कलश द्वारा स्नान कराये (२००) । चक्र-पूजा के प्रसङ्ग में कलश का परिमाण बताया है, आगमोक्त सभी कर्मों में उसी प्रकार का घट विहित है (२०१) । इसके बाद अपनी-अपनी पूजा-विधि के अनुसार महादेव की पूजा करे । उस पूजा के सभी उपचारों को बताता हूँ, हे परात्परे ! सुनो (२०२) —१. आसन, २, स्वागत, ३. पाद्य, ४. अर्घ्य, ५. आचमनीय, ६. मधु- पर्क, ७. पुनः आचमनीय, ८. स्नानीय, ६. वस्त्र, १०. भूषण, ११. गन्ध, १२. पुष्प, १३. धूप, १४. दीप, १५. नैवेद्य और १६. वन्दना—ये षोडश उपचार देव-पूजा में कहे हैं (२०३-४) । १. पाद्य, २. अर्घ्य, ३. आच- मन, ४. मधुपर्क, ५. पुनः आचमन, ६. गन्ध, ७. पुष्प, ८. धूप, ६. दीप, १०. नैवेद्य—ये 'दशोपचार' माने गए हैं (२०५) । १. गन्ध, २. पुष्प, ३. धूप, ४. दीप और ५. नैवेद्य—ये 'पञ्चोपचार' कहे हैं (२०६) । 'फट्' मन्त्र से अर्घ्य-पात्र के जल से अभिषेक कर धेनु-मुद्रा दिखाने के बाद गन्ध-पुष्प से पूजा कर देय द्रव्य का नामोल्लेख करे (२०७) । आगे बताए मन्त्र और मूल-मन्त्र का स्मरण कर चतुर्थी विभक्ति-युक्त देव-नाम का उच्चारण कर त्यागार्थ वचन का पाठ करे (२०८) । देवता के लिए देय सभी वस्तुओं के निवेदन को यहीं विधि है; इसी के अनु- सार देवता को द्रव्य प्रदान करे (२०६) । आद्या की पूजा-विधि में पाद्य, अर्घ्यादि देने और कारणादि के अर्पण करने का विधि बताई जा चुकी है (२१०) । वहाँ जो मन्त्र नहीं बताए हैं, उन्हें यहां बताता हूँ, सुनो । आसनादि उपचारों के देने में इन्हीं का प्रयोग करे (२११)— १. आसन—'सर्व-भूतान्तरस्थाय सर्व-भूतान्तरात्मने कल्पयाम्युपवेशार्थमासनं ते नमो' नमः अर्थात् सब प्राणियों के अन्तर में स्थित और सब प्राणियों के अन्तरात्मा-स्वरूप तुम्हें बैठने हेतु आसन देता हूँ । तुम्हें

तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १११ बारम्बार नमस्कार (२१२) । २ स्वागत--हाथ जोड़कर स्वागत की प्रार्थना करे : 'देवाः स्वाभीष्ट-सिद्धयर्थं यस्य वाञ्छन्ति दर्शनं, सुस्वागतं स्वागतं मे तस्मै ते परमात्मने । अद्य मे सफलं जन्म जीवनं सफलाः क्रियाः, स्वागतं यत् त्वया तन्मे तपसां फलमागतम्' अर्थात् सभी देवता अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए जिनके दर्शन की चाह करते हैं, उन तुम परमात्मा का मैं स्वागत करता हूँ। आज मेरा जन्म, जीवन और सारा कर्म सफल है क्योंकि तुम्हारे स्वागत के रूप में मेरी तपस्या का फल ही मुझे मिला है (२१३-१५) । ३. पाद्य—विहित पाद्य जल को लेकर कहे : 'यत्पाद-जल-संस्पर्शाच्छुद्धिमाप जगत्-त्रयं, तत्-पादाब्ज- प्रोक्षणार्थं पाद्यं ते कल्पयाम्यहम्' अर्थात् जिन चरणों के जल के स्पर्श से तीनों लोक शुद्ध होते हैं, उन तुम्हारे चरणों के धोने हेतु मैं तुम्हें पाद्य देता हूँ (२१६-१७) । ४. अर्घ्य—परमानन्द-सन्दोहो जायते यत्-प्रसादतः, तस्मै सर्वात्म-भूताय आनन्दाघ्यं समर्पये' अर्थात् जिनकी प्रसन्नता से परमानन्द-परम्परा होती है, सबकी आत्मा-स्वरूप उन तुमको मैं अर्घ्य देता हूँ (२१८) । ५. आचमनीय—प्रोक्षित और चर्चित जातो-लवङ्ग-कक्कोल से सुगन्धित जल या केवल शुद्ध जल लेकर कहे : 'यदुच्छिष्टमुपस्पृष्टं शुद्धिमेत्यखिलं जगत्, तस्मै मुखारविन्दाय आचामं कल्पयामि ते' अर्थात् जिसके जूठे के स्पर्श से सारा जगत् शुद्धि को प्राप्त करता है, तुम्हारे उसी मुख-कमल के लिए मैं आचमन देता हूँ (२१६-२०) । ६. मधुपर्क—मधुपर्क को लेकर भक्ति-पूर्वक उसे आगे के मन्त्र से अर्पित करे : 'ताप-त्रय-विनाशार्थम- खण्डानन्द-हेतवे, मधुपर्कं ददाम्यद्य प्रसीद परमेश्वर' अर्थात् तीनों दुःखों के नाश के लिए अखण्डानन्द के कारण-स्वरूप तुम्हें मधुपर्क देता हूँ। हे परमेश्वर, प्रसन्न होओ (२२१-२२) । ७. पुनराचमनीय—'अशुचिः शुचितामेति यत्-स्पृष्ट-स्पर्श-मात्रतः, तस्मिंस्ते वदनाम्भोजे पुनराचम- नीयकम्' अर्थात् जिससे छुए के स्पर्श मात्र से अपवित्र भी पवित्र हो जाता है, तुम्हारे उसी मुख-कमल में पुनः आचमन अर्पित है (२२३) । ८. स्नानीय—स्नान हेतु पूर्ववत् प्रोक्षित और चर्चित जल देवता के सामने रखकर कहे : 'यत्-तेजसा जगद् व्याप्तं यतो जातमिदं जगत्, तस्मै ते जगदाधार ! स्नानार्थं तोयमर्पये' अर्थात् जिनके तेज से जगत् व्याप्त है, जिनसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है, हे जगदाधार ! उन्हीं तुमको स्नान के लिए जल देता हूँ (२२४-२५) । स्नान, वस्त्र और नैवेद्य देने के बाद आचमन देना चाहिए । अन्य द्रव्यों के देने के बाद एक-एक बार जल छोड़ना चाहिए (२२६) । ६. वस्त्र—दो वस्त्र लेकर पूर्ववत् शोधित कर दोनों हाथों में उन्हें उठाकर कहे : सर्वावरण-हीनाय माया- प्रच्छन्न-तेजसे, वाससी परिधानाय कल्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् सब प्रकार के आवरणों से रहित, अविद्या से छिपे हुए तेजवाले तुम्हारे लिए उत्तरीय के साथ वस्त्र देता हूँ, तुम्हें नमस्कार (२२७-२८) । १०. आभूषण—स्वर्ण, रोप्य आदि के बने विविध आभूषणों का प्रोक्षण और अर्चन कर कहे : 'विश्वा- भरण-भूताय विश्व-शोभैक-योनये, माया-विग्रह-भूषार्थं भूषणानि समर्पये' अर्थात् विश्व के आभूषण-स्वरूप एवं विश्व को शोभा के एकमात्र कारण, तुम्हारे माया-मय शरीर के सजाने हेतु आभूषण देता हूँ (२२६-३०) । ११ गन्ध—'गन्ध-तन्मात्रया सृष्टा येन गन्ध-धरा धरा, तस्मै परात्मने तुभ्यं परमं गन्धमर्पये' अर्थात् जिनके द्वारा गन्ध-तन्मात्रा से गन्धवती पृथ्वी रची गई है, उन्हीं परात्मा-स्वरूप तुम्हें परम गन्ध देता हूँ (२३१) । १२ पुष्प—'पुष्पं मनोहरं रम्यं सुगन्ध देव-निर्मितं, मया निवेदितं भक्त्या पुष्पमेतत् प्रगृह्यताम्'

११२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् मनोहर, सुन्दर, सुगन्धित, देवों द्वारा बनाए इस पुष्प को भक्तिपूर्वक देता हूँ, इसे ग्रहण करो (२३२) । १३ धूप- 'वनस्पति-रसो दिव्यो गन्धाढ्यः सुमनोहरः आघ्रेयः सर्व-भूतानां धूपो घ्राणाय तेऽप्यंते' अर्थात् वनस्पति का दिव्य रस, गन्ध-युक्त, बहुत मनोहर, सभी प्राणियों के सूंघने योग्य धूप तुम्हारे सूंघने के लिए देता हूँ (२३३) । १४ दीप--'सुप्रकाशो महा-दीप्तः सर्वतस्तिमिरपहः, स-बाह्याभ्यन्तर-ज्योतिर्दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्' अर्थात् सुन्दर प्रकाशवाला, अति दीप्ति-शाली, सभी दिशाओं का अँधेरा दूर करनेवाला, बाह्य और अन्तर को ज्योतिर्मय करनेवाला यह दीपक ग्रहण करो (२३४) । १५ नैवेद्य - 'नैवेद्यं स्वादु-संयुक्तं नाना-भक्ष्य-समन्वितं, निवेदयामि भक्त्येदं जुषाण परमेश्वर' अर्थात् स्वादिष्ट, विविध खाने योग्य वस्तुओं से युक्त यह नैवेद्य भक्ति के साथ देता हूँ। हे परमेश्वर, इसे ग्रहण करो (२३५) । आचमन—'...र्थं सलिलं देव ! कर्पूरादि-सुवासितं, सर्व-तृप्ति-करं स्वच्छमर्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् हे देव ! क... से गन्धित, पूर्ण तृप्ति-दायक, निर्मल जल पीने के लिए देता हूँ। तुम्हें नमस्कार (२३६) । १६ ताम्बू—'कर्पूर- लवंगैलादिभिर्युतं ताम्बूलं निवेदयामि' अर्थात् कपूर, कत्था लौंग आदि से युक्त पान देता हूँ। अब पुनः आचमनीय देकर वन्दना करे (२३७) । उपचार का आधार देते समय 'साधारं' अर्थात् तेज- साधार-सहित इत्यादि यथा-सम्भव कहकर द्रव्य का नाम ले या उस आधार का नाम लेकर उसे अलग से प्रदान करे (२३८) । इस प्रकार पूजित देवता को तीन पुष्पाञ्जलियां देकर आच्छादन-युक्त गृह का प्रोक्षण कर हाथ जोड़कर निम्न मन्त्र पढ़े (२३६)- गेह ! त्वं सर्व-लोकानां पूज्यः पुण्य-यशः-प्रदः, देवता-स्थिति-दानेषु सुमेरु-सदृशो भव । त्वं कैलासश्च वैकुण्ठस्त्वं ब्रह्म-भवनं गृह । यत् त्वया विधृतो देवस्तस्मात् त्वं सुर-वन्दितः । यस्य कुक्षौ जगत् सर्वं वरीवर्ति चराचरम्, माया-विधृत-देहस्य तस्य मूर्तेर्विधारणात् । देव-मातृ-समस्त्वं हि सर्व-तीर्थ-मयस्तथा, सर्व-काम-प्रदो भूत्वा शान्ति मे कुरु ते नमः ॥ अर्थात् हे गृह ! तुम सब लोकों के पूज्य, पुण्य और यश-दाता देवता को स्थिति देकर सुमेरु के समान बनो (२४०)। हे गृह ! तुम कैलास हो, तुम वैकुण्ठ हो, तुम ब्रह्म-भवन हो; क्योंकि तुम देवता को धारण करते हो, इससे देवता तुम्हारी वन्दना करते हैं (२४१) । जिनके पेट में सारा जगत् है, माया से शरीर धारण करने- वाले उसी ब्रह्म की मूर्ति को धारण करने से तुम देव-माता के समान हो और सभी तीर्थों से युक्त हो। तुम सब कामनाओं की पूर्ति-कर्ता होकर मुझे शान्ति दो, तुम्हें नमस्कार है (२४२-४३) । गृह को तीन बार नमस्कार कर साधक अपनी अभिलाषा-पूर्ति के लिए चक्रादि-युक्त उस गृह को निवेदित करे (२४४) । विश्वावासाय विश्वाय गृहं ते विनिवेदितं, अङ्गीकुरु महेशान ! कृपया सन्निधीयताम् । अर्थात् विश्वावास-स्वरूप तुम्हें रहने के लिए यह गृह निवेदित करता हूँ। हे महेशान ! इसे गृहण करें और कृपया इसमें सन्निहित हों (२४५) । इस प्रकार गृह को अर्पण कर देवता के लिए दक्षिणा देकर शङ्ख, तूर्यादि की ध्वनि करते हुए वेदी के

तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । ११३ ऊपर देव-स्थापन करे (२४६) । देवता के दोनों पैर छूकर—'मूलं स्थां स्थों स्थिरोभव वासस्ते कल्पितो मया' अर्थात् 'तुम्हारे आवास को मैंने बनाया है, इसमें स्थिर हों', इस मन्त्र से देवता को स्थिर कर पुनः गृह की प्रार्थना करे (२४७)— गृह ! देव-निवासाय सर्वथा प्रीतिदो भव, उत्सृष्टे त्वयि मे लोकाः स्थिराः सन्तु निरामयाः । द्वि-सप्तातीत-पुरुषान् द्वि-सप्तानागतानपि, मां च मे परिवारांश्च देव-धाम्नि निवासय । यजनात् सर्व-यज्ञानां सर्व-तीर्थ-निषेवणात्, यत्-फलं तत्-फलं मेऽद्य जायतां त्वत्-प्रसादतः । यावत् वसुन्धरा तिष्ठेत् यावदेते धरा-धराः, यावद्-दिवा-निशा-नाथौ तावन्मे वर्ततां कुलम् ।। अर्थात् हे गृह ! देव-निवास के लिए सब प्रकार से प्रीति-दायक हो । तुम्हें देने से मेरे लिए सभी लोक पुण्यद हों (२४८) । मेरे पिछले चौदह पुरखों और अगले चौदह वंशजों को, मुझे और मेरे परिवार-जनों को देव-लोक-वासी बनाओ (२४९) । सब यज्ञों और सब तीर्थों के सेवन से जो फल मिलता है, वह फल आज तुम्हारी प्रसन्नता से मुझे मिले (२५०) जब तक पृथ्वी, पर्वत, सूर्य, चन्द्र हैं, तब तक मेरा कुल रहे (२५१) । इस प्रकार गृह की प्रार्थना कर पुनः देवार्चन कर दर्पणादि अन्य वस्तुएँ और ध्वज प्रदान करे (२५२) । तब देवता के योग्य वाहन दान करे। महादेव को 'वृषभ' का दान देकर हाथ जोड़कर उसकी प्रार्थना करे (२५३)— वृषभ ! त्वं महा-कायस्तीक्ष्ण-शृङ्गोऽरि-घातकः, पृष्ठे वहसि देवेशं पूज्योऽसि त्रिदशैरपि । खुरेषु सर्व-तीर्थानि रोम्नि वेदाः सनातनाः, निगमागम-तन्त्राणि दशनाग्रे वसन्ति ते । त्वयि दत्ते महा-भाग ! सुप्रीतः पार्वती-पतिः, वासः ददातु कैलासे त्वं मां पालय सर्वदा । अर्थात् हे वृषभ ! तुम बड़े शरीरवाले, तेज सींगवाले और शत्रु-घाती हो । तुम देवेश को पीठ पर बैठाते हो, अतः देवों द्वारा भी पूज्य हो (२५४) । तुम्हारे खुरों में सब तीर्थ, रोमों में चारों सनातन वेद और दाँतों के अग्र-भाग में निगमागम तन्त्र रहते हैं (२५५) । हे महा-भाग ! तुम्हारे दिए जाने से पार्वती के पति प्रसन्न होकर कैलास में मुझे आवास दें। तुम सदा मेरा पालन करो (२५६) । महा-देवो को 'सिंह' और विष्णु को 'गरुड़' का दान देकर उन वाहनों की स्तुति क्रमशः जिस प्रकार करे, वह बताता हूँ, सुनो (२५७)— सुरासुर-नियुद्धेषु महा-बल-पराक्रमः, देवानां जयदो भीमो दनुजानां विनाश-कृत् । सदा देवी-प्रियोऽसि त्वं ब्रह्म-विष्णु-शिव-प्रियः, देव्यै समर्पितो भक्त्या जहि शत्रून्नमोऽस्तु ते ॥ अर्थात् हे सिंह ! देवासुर-संग्राम में तुम महा-बली, पराक्रमी हो, देवों को जय-दाता हो, भयङ्कर और असुर-नाशक हो (२५८) । तुम सदा देवों और ब्रह्मा, विष्णु, शिव के प्रिय हो; भक्ति-पूर्वक देवी के लिए अर्पित होकर तुम मेरे सभी शत्रुओं का नाश करो। तुम्हें नमस्कार है (२५९) । गरुत्मन् ! पतग-श्रेष्ठ ! श्री-पति-प्रीति-दायक ! वज्र-चञ्चो ! तीक्ष्ण-नख ! तव पक्षा हिरण्मयाः । नमस्तेऽस्तु खगेन्द्राय पक्षिराज ! नमोऽस्तु ते । यथा कर-पुटेन त्वं संस्थितो विष्णु-सन्निधौ । तथा मामरि-दर्पघ्न ! विष्णोरग्रे निवासय । त्वयि प्रीते जगन्नाथः प्रीतः सिद्धिं प्रयच्छति ॥ फा०—१५

११४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् हे गरुत्मन् ! हे पक्षि-राज ! हे नारायण-प्रीति-प्रद ! हे वज्र-चोंच ! हे तीक्ष्ण-नख ! तुम्हारे पक्ष स्वर्ण-मय हैं। हे खगेन्द्र ! हे पक्षि-राज ! तुम्हें बारम्बार नमस्कार है (२६०) । हे अरि-दर्पघ्न ! तुम जैसे विष्णु के पास हाथ जोड़कर बैठते हो, वैसे ही मुझे भी विष्णु के आगे बैठाओ (२६१) । तुम्हारे प्रसन्न होने पर जगन्नाथ प्रसन्न होकर सिद्धि देते हैं। देवता के लिए दिए द्रव्यों को दक्षिणा देवता को प्रदान करे (२६२) । इसी प्रकार भक्ति-पूर्वक कर्म-फल भी देवता को प्रदान करे (२६३) । नृत्य, गीत और वाद्य करते-करते बान्धवों के साथ गृह की प्रदक्षिणा कर देवता को नमस्कार कर सभी ब्राह्मणों को भोजन कराये (२६४) । देव-गृह की प्रतिष्ठा में जो यह क्रम कहा है, यही उपवन, सेतु, संक्रम और वृक्ष की भी प्रतिष्ठा में विहित है (२६५) । विशेष कर इन सभी कर्मों में सनातन विष्णु पूज्य हैं। पूजा, होम और अन्य सभी कर्म गृह- दान की विधि के समान करे (२६६) । अप्रतिष्ठित देवता को गृहादि कुछ भी न दे; प्रतिष्ठित और अर्चित देव के लिए ही पूजा, दान विहित है (२६७) । अब 'आद्या' की प्रतिष्ठा का क्रम बताता हूँ, जिसके अनुसार प्रतिष्ठिता देवी शीघ्र ही वाञ्छित फल देती हैं (२६८) । 'आद्या' की प्रतिष्ठा के दिन साधक स्नान कर शुद्ध हो विधि-वत् सङ्कल्प-पूर्वक वास्तु-पति की पूजा करे (२६६) । ग्रह, दिक्-पाल और गणेशादि-पूजा और पितृ-कर्म (आभ्युदयिक) कर साधक सभी विप्रों के साथ प्रतिमा के पास जाये (२७०) । प्रतिष्ठित गृह में या किसी सुन्दर स्थान में साधक उत्तम प्रतिमा को लाकर पूजा- पूर्वक स्नान कराये (२७१) । पहले भस्म से, फिर वल्मीक की मिट्टी से, तब क्रमशः वराह-दन्त और हस्ति-दन्त की मृत्तिका से स्नान कराये (२७२) । फिर 'पञ्च-कषाय' और 'त्रि-पत्र' से स्नान कराये (२७३) । वाट्याल, बेर जामुन, वकुल (मोलसिरो) और शाल्मली—ये पाँच वृक्ष 'पञ्च-कषाय' कहे गये हैं (२७४) । करवीर, जाती, चम्पक, पद्म और पाटली (गुलाब)—ये 'पञ्च-पुष्प' कहे हैं (२७५) । बर्बुरा, तुलसी और बिल्व—ये 'त्रि-पत्र' कहे हैं (२७६) । इन सभी द्रव्यों को जल में मिलाकर स्नान कराना विहित है किन्तु पञ्चामृत और गन्ध-तैल में जल न मिलाये (२७७) । व्याहृति-सहित प्रणव, गायत्री और मूल-मन्त्र का उच्चारण कर अमुक द्रव्य के जल से तुम्हें स्नान कराता हूँ, तुम्हें नमस्कार—यह कहकर स्नान कराये (२७८) । तदनन्तर पूर्वोक्त विधि से दुग्धादि अष्ट घटों से और कुछ उष्ण जल से प्रतिमा को स्नान कराये (२७६) । श्वेत गोधूम-चूर्ण या तिल-कल्क या शालि- तण्डुल-चूर्ण से मार्जन कर उसे सुखाये (२८०) । तीर्थ-जल से पूर्ण आठ घड़ों से स्नान कराकर सुन्दर वस्त्र से पोंछकर स्वच्छ अङ्गोंवाली प्रतिमा को सजाकर पूजा-स्थान में ले जाये (२८१) । यदि तीर्थ-जल का संग्रह न कर सके, तो पच्चास घड़े शुद्ध जल से भक्ति-पूर्वक प्रतिमा का स्नान कराये (२८२) । यदि समर्थ हो, तो प्रति स्नान के बाद पूजा करे (२८३) । तब सुन्दर आसन पर प्रतिमा को स्थित कर पाद्यार्घ्यादि से पूजा कर हाथ जोड़कर उसकी प्रार्थना करे (२८४)— नमस्ते प्रतिमे ! तुभ्यं विश्वकर्म-विनिर्मिते ! नमस्ते देवतावासे भक्ताभीष्ट-प्रदे नमः । त्वयि सम्पूजयाम्यादां परमेशीं परात्परां, शिल्प-दोषावशिष्टाङ्गं सम्पन्नं कुरु ते नमः । अर्थात् हे विश्वकर्मा द्वारा निर्मित प्रतिमे ! तुम्हें नमस्कार । हे देवतावासे ! तुम्हें नमस्कार । हे भक्ताभीष्ट- प्रदे ! तुम्हें नमस्कार । तुममें परात्परा परमेश्वरी आद्या की पूजा करता हूँ; शिल्प-दोष से बचे अङ्ग को सम्पन्न करो; तुम्हें नमस्कार (२८५-८६) । अब शान्त हो प्रतिमा के मस्तक पर हाथ रखकर १०८ बार मूल-मन्त्र का जप कर प्रतिमा के सारे

तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । ११५ शरीर को छुये (२८७) । तब प्रतिमा के अंगों में षडंग और मातृका-न्यास कर आकारादि-षड्-दीर्घ स्वरों से युक्त मूल-मन्त्र द्वारा षडग-न्यास करे (२८८) । 'नमः' पदान्त, बिन्दु-युक्त, 'ॐ' कार, माया-बीज (ह्रीं) और रमा-बीज (श्रीं) को आदि में लगाकर अष्ट-वर्गों से वर्ण-न्यास करे (२८६) । मुख में सारे स्वर का, कण्ठ-देश में क-वर्ग का न्यास करे; उदर में च-वर्ग, दक्ष-बाहु में ट-वर्ग, बाम बाहु में त-वर्ग, दक्षिण और वाम दोनों उरुओं में क्रमशः प-वर्ग और य-वर्ग का तथा मस्तक में श-वर्ग का न्यास करे (२६०-६१) । इस प्रकार वर्ण-न्यास कर तत्त्व-न्यास करे (२६२)-दोनों पैरों में पृथिवी-तत्त्व, लिंग-देश में जल-तत्त्व, नाभि-देश में तेजस्तत्त्व, हृदय-कमल में वायु- तत्त्व, मुख में आकाश-तत्त्व, दोनों आँखों में रूप-तत्त्व, दोनों नाकों में गन्ध-तत्त्व, दोनों कानों में शब्द-तत्त्व, जिह्वा में रस-तत्त्व, त्वचा में स्पर्श-तत्त्व का न्यास करे । भ्रू-मध्य में, सहस्र-दल कमल में नमस्तत्त्व का न्यास करे । इसी प्रकार वक्षःस्थल में शिव-तत्त्व, ज्ञान-तत्त्व, पर-तत्त्व, जीव-तत्त्व और प्रकृति-तत्त्व का न्यास करे । सर्वाङ्ग में क्रमशः महत्-तत्त्व और अहङ्कार-तत्त्व का न्यास करे (२६३-६६) । आदि में प्रणव, माया और रमा- बीज, अन्त में चतुर्थी एक-वचन की विभक्ति और 'नमः' लगाकर इन सब तत्त्वों का न्यास करे, यथा- 'ॐ ह्रीं श्रीं पृथिवी-तत्त्वाय नमः' इत्यादि (२६७) । बिन्दु-युक्त मातृका-वर्णों से पुटित, 'नमः' पदान्त मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए मातृका-स्थानों में मन्त्र-न्यास करे (२६८) । तब प्रार्थना करे- सर्व-यज्ञ-मयं तेजः सर्व-भूत-मयं वपुः, इयं ते कल्पिता मूर्तिरत्र त्वां स्थापयाम्यहम् । अर्थात् तुम्हारा तेज सर्व-यज्ञ-मय है और शरीर सर्व-भूत-मय है । तुम्हारी यह मूर्ति कल्पित हुई है, इसमें तुम्हें मैं स्थापित करता हूँ (२६६)। तदनन्तर-पूजा विधि के अनुसार ध्यान, आवाहनादि प्राण-प्रतिष्ठा तक के कर्म कर देवता की पूजा करे (३००) । देव-गृह के दान में जो सब मन्त्र कहे हैं, उन्हीं सबका प्रयोग इस पूजा में करे (३०१) । विधिवत् संस्कृत अग्नि में सभी अर्चित देवताओं को आहुति देकर देवी का आवाहन कर जातकर्मादि करे (३०२) । १. जात- कर्म, २. नामकरण, ३. निष्क्रमण ४. अन्न-प्राशन, ५. चूड़ा और ६. उपनयन-ये छः संस्कार शिवोक्त हैं (३०३) । प्रणव (ॐ), व्याहृति ( भूर्भुवः स्वः ), गायत्री, मूल-मन्त्र, सम्बोधनान्त नाम ( हे आद्ये ! ) तुम्हारे जातकर्मादि अर्थात् संस्कार-विशेष का नामोल्लेख कर 'सम्पादयामि स्वाहा' अर्थात् सम्पादित करता हूँ-यह कह कर पाँच-पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (३०४) । पूर्वोक्त नामोल्लेख करते हुए मूल-मन्त्र उच्चारण कर देवी को सौ आहुतियाँ देकर आहुति का अंश प्रतिमा के मस्तक पर छोड़े (३०५-६) । प्रायश्चित्तादि द्वारा अवशिष्ट कर्म सम्पन्न कर साधकों को भोजन कराये और अनाथ एवं दीनों को सन्तुष्ट करे (३०७) । उक्त कर्म करने में यदि अशक्त हो, तो सात घड़े जल से प्रतिमा को स्नान कराकर यथा-शक्ति पूजापूर्वक देवता को नाम सुनाये (३०८) । हे प्रिये ! यही 'श्रीमदाद्या की प्रतिष्ठा-विधि' है । इसी प्रकार 'दुर्गादि सभी विद्याओं' और 'महेशादि सभी देवों' की प्रतिष्ठा करे (३०६) । 'सचल शिव-लिङ्ग' की प्रतिष्ठा में भी मन्त्र द्वारा इसी विधि का प्रयोग सन्देह- रहित होकर करे (३१०)।

चौदहवाँ उल्लास--शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण श्री देवी ने कहा- हे कृपा-नाथ ! आद्या शक्ति कालिका के प्रसंग में आपने कृपा कर बहुत से साधन बताए। मैं आपके भाव से तृप्त हूँ। आपने 'सचल शिव-लिंग' की प्रतिष्ठा-विधि बताई है किन्तु उसका फल क्या है और उसकी विधि किस प्रकार है ? उसे विशेष रूप से कहिए। हे जगतो-नाथ ! इस परम तत्त्व-जिज्ञासा के लिए मैं किसे वरण करूँ ? आपकी अपेक्षा दयालु, सर्वज्ञ, प्रभु, आशुतोष, दोनानाथ और मुझे आनन्द देनेवाला अन्य कौन है (१-४) ? श्री सदाशिव ने कहा--शिव-लिंग की स्थापना का माहात्म्य तुमसे क्या कहूँ ! उसकी स्थापना से मनुष्य महा-पाप से छूटकर परम पद को प्राप्त करता है (५)। स्वर्ण-पूर्ण पृथिवी का दान और दस सहस्र अश्वमेध यज्ञ करने, निर्जल प्रदेश में जलाशय बनवाने, दीन और आतुर लोगों को सन्तुष्ट करने से मनुष्य जो फल पाते हैं, उससे कोटि गुना अधिक फल शिव-लिंग की प्रतिष्ठा करने से मिलता है, इसमें सन्देह नहीं (६-७)। हे कालिके ! जिस स्थान में लिंग-रूपी महादेव रहते हैं, उसी स्थान में ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र-सहित अन्यान्य देव-गण वास करते हैं (८) । साढ़े तीन कोटि तीर्थ और गुप्त एवं अप्रकाशित सभी पुण्य-क्षेत्र शिव के निकट रहते हैं (६) । लिंग-रूपी शिव के सब ओर सौ हाथ तक 'शिव-क्षेत्र' कहा जाता है (१०) । यह 'शिव-क्षेत्र' महा-पुण्य-जनक और सब तीर्थों से श्रेष्ठ होता है, जिसमें देव-गण और सभी तीर्थ सदा विराजते हैं (११) । जो व्यक्ति क्षण भर भी शिव-भाव-परायण होकर 'शिव-क्षेत्र' में रहता है, वह सब पापों से छूटकर अन्त में शिव-लोक में जाता है (१२) । इस 'शिव-क्षेत्र' में अल्प या बहु मात्रा में जो कर्म किया जाता है, वह महादेव के प्रभाव से कोटि गुणा हो जाता है (१३) । शिव के सामीप्य से जहाँ-तहाँ किए पाप से तो मुक्ति मिल जाती है किन्तु 'शिव-क्षेत्र' में किया पाप वज्र-लेप के समान होता है अर्थात् उससे छुटकारा नहीं मिलता (१४) । पुरश्चरण, जप, दान, श्राद्ध एवं तर्पण आदि जो कोई कर्म 'शिव-क्षेत्र' में किया जाता है, उसका अनन्त फल होता है (१५) । चन्द्र या सूर्य- ग्रहण में सौ पुरश्चरण करने से जो फल होता है, वह शिव के पास एक बार ही जप करने से मिल जाता है (१६) । गया, गङ्गा और प्रयाग में कोटि पिण्ड-दान करने से जो फल मिलता है, वह 'शिव-क्षेत्र' में एक बार पिण्ड-दान करने से मिल जाता है (१७) । जो अति-पापी या महा-पापी थे, उनको भी इस 'शिव-क्षेत्र' में एक बार ही श्राद्ध करने से परम गति प्राप्त हो जाती है (१८) । लिंग-रूपी जगन्नाथ-श्रीदुर्गा के साथ जिस स्थान पर रहते हैं, उस स्थान में चौदहो भुवन वास करते हैं (१६) । स्थापित महादेव का यह कुछ माहात्म्य तुमसे कहा है। जो महादेव अनादि-लिंग हैं, उनकी महिमा वाक्य के भी परे है (२०) । हे सुव्रते ! 'महा-पीठ'-स्थानों में तुम्हारी पूजा में अस्पृश्य-स्पर्श का दोष है, किन्तु लिंग-रूपी महेश्वर में यह दोष नहीं है (२१) । हे देवि, हे कालिके ! चक्रार्चन-काल में जिस प्रकार कोई दोष नहीं होता, उसी प्रकार महा-तीर्थ-स्वरूप 'शिव-क्षेत्र' में स्पर्श-दोष न माने (२२) । इस विषय में अधिक क्या कहूँ; तुमसे सत्य कहता हूँ, शिव-लिंग के पूर्ण प्रभाव को व्यक्त करना मेरी शक्ति में नहीं है (२३) ! शिव-लिंग गौरी-पट्ट से संयुक्त हो या न हो, साधक अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करे (२४) । जो साधक देवता की प्रतिष्ठा के पूर्व-दिवस के सन्ध्या-काल में 'देवता का अधिवास' करता है, वह दश [ ११६ ]

चौदहवां उल्लास : शिव-लिङ्ग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । ११७ सहस्र अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है (२५)। १ मही, २ गन्ध, ३ शिला, ४ धान्य, ५ दूर्वा, ६ पुष्प, ७ फल, ८ दधि, ६ घृत, १० स्वस्तिक, ११ सिन्दूर, १२ शंख, १३ कज्जल, १४ रोचना, १५ श्वेत सर्षप, १६, सुवर्ण, १७ रौप्य, १८ ताम्र, १६ दीप, २० दर्पण-ये बीस द्रव्य 'अधिवास' में लगाए (२६-२७)। इनमें से एक-एक द्रव्य को लेकर 'माया' (ह्रीं) और गायत्री का पाठ करते हुए कहे कि इस द्रव्य द्वारा इस देवता का शुभाधिवासन हो (२८)। 'ह्रीं गायत्र्यै अनेन द्रव्येणामुष्य दैवतस्य शुभमधि-वासनमस्तु।' उक्त मन्त्र द्वारा 'मही' आदि प्रत्येक वस्तु से देवता के ललाट को छुए। इसी प्रकार प्रशस्ति-पात्र द्वारा तीन बार अधिवास करे (२६)। इस विधि से देवता का अधिवास कर गृह-प्रतिष्ठा-विधि के अनुसार दुग्धादि द्वारा उस देवता को स्नान कराए (३०)। स्नान कराने के बाद वस्त्र से शिव-लिंग को मार्जित कर, आसन पर स्थापित कर, पूजानुष्ठान की विधि से गणेशादि देवताओं का अर्चन करे (३१)। प्रणव से करांग-न्यास और प्राणायाम कर कोटि-चन्द्र के समान प्रभाववाले, शान्त-स्वरूप सदाशिव का ध्यान करे (३२)- व्याघ्र-चर्म-परीधानं नाग-यज्ञोपवीतिनम्, विभूति-लिप्त-सर्वाङ्गं नागालङ्कार-भूषितम्। धूम्र-पीतारुण-श्वेत-रक्तैः पंचभिराननैः, युक्तं त्रि-नयनं विभ्रज्जटा-जूट-धरं विभुम्। गङ्गा-धरं दश-भुजं शशि-शोभित-मस्तकम्, कपालं पावकं पाशं पिनाकं परशुं करैः। वामैर्दधानं दक्षैश्च शूलं वज्रांकुशं शरम्, वरं च विभ्रतं सर्वैर्देवैर्मुनि-वरैः स्तुतम्। परमानन्द-सन्दोहोल्लसत्-कुटिल-लोचनम्, हिम-कुन्देन्दु-सङ्काशं वृषासन-विराजितम्। परितः सिद्ध-गन्धर्वरप्सरोभिरहनिशम्, गीयमानमुमा - कान्तमेकान्त - शरण - प्रियम् ॥ अर्थात् व्याघ्र-चर्म पहने, नाग का यज्ञोपवीत धारण किए, सारे शरीर में भस्म लगाए, नागों के आभू- षणों से शोभित, धूम्र-पीत-अरुण-श्वेत-रक्त इन पाँच वर्णवाले पाँच मुखों से युक्त, त्रिनेत्र, जटा-जूटधारी, प्रभु, गंगा-धर, दश-भुज, चन्द्र-कला से शोभित मस्तकवाले, बाएँ पाँच हाथों में कपाल, अग्नि, पाश, धनुष, परशु- धारी, दाएँ पाँच हाथों में शूल, वज्र, अंकुश, वाण, वर-धारी, सभी देवों और श्रेष्ठ मुनियों द्वारा वन्दित, परमानन्द से उल्लसित बाँके नेत्रोंवाले, हिम, कुन्द पुष्प और चन्द्र के समान श्वेत वर्णवाले बैल पर सवार, चारों दिशाओं में स्थित सिद्धों, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा स्तूयमान, उमा के पति, एकमात्र शरणागत भक्तों के प्रिय सदाशिव का ध्यान करता हूँ (३३-३८)। इस प्रकार महादेव का ध्यान कर मानसिक उपचारों से पूजा कर उसी लिंग पर उनका आवाहन कर यथा-शक्ति उनकी पूजा करे (३६)। आसनादि सभी उपचारों के मन्त्र पहले कहे हैं। अब महात्मा महेश्वर का मूल-मन्त्र बताता हूँ (४०)-माया (ह्रीं), प्रणव (ॐ), शब्द-बीज (ह), 'औ' और चन्द्र-बिन्दु अर्थात् 'ह्रीं ॐ ह्रौं' -यह 'शिव-बीज' कहा है (४१)। फिर सुगन्धित पुष्प-माला और वस्त्र से शिव को ढँककर दिव्य शय्या पर स्थापित कर 'गौरी-पट्ट' का शोधन करे (४२)। 'गौरी-पट्ट' के ऊपर देवी की इस विधि से पूजा करे। पहले 'ह्रीं' बीज से कर-न्यास और प्राणायाम करे (४३)। फिर देवी का ध्यान करे- उद्यद्-भानु-सहस्र-कान्तिममलां वह्न्यर्क-चन्द्रेक्षणाम्, मुक्ता-यन्त्रित-हेम-कुण्डल-लसत्-स्मेराननाम्भोरुहाम्। हस्ताब्जैरभयं वरं च दधतीं चक्रं तथाब्जं दधत्, पीनोत्तुङ्ग-पयोधरां भय-हरां पीताम्बरां चिन्तये ॥

११८ | हिन्दो महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् जिनकी कान्ति उदय होते सहस्र सूर्यों के समान है, जो निर्मला हैं, अग्नि-सूर्य-चन्द्र जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका मुस्कान-युक्त मुख-कमल मोतियों से जटित स्वर्ण-कुण्डलों से शोभायमान है, जो चार कर-कमलों में चक्र, पद्म, वर ओर अभय धारण किए हैं, दोनों पयोधर पीन ओर उत्तुंग हैं, ऐसी भय-हारिणी पीत-वस्त्रा भगवती का मैं ध्यान करता हूँ । इस प्रकार ध्यान कर महा-देवी का यथा-शक्ति पूजन कर दश दिक्-पालों और वृषभ की पूजा करे (४४- ४५) । जिस मन्त्र से जगन्मयी भगवती की आराधना करनी चाहिए, उसे बताता हूँ (४६) । माया (ह्रीं), लक्ष्मी (श्रीं) ओर षष्ठ स्वर से युक्त हकार में चन्द्र-विन्दु जोड़कर (हूँ) उच्चारण करे तथा अन्त में वह्नि-जाया (स्वाहा) जोड़े अर्थात् 'ह्रीं श्रीं हूँ स्वाहा' (४७) । पूर्वं की भाँति देवी को स्थापित कर सब देवों के लिए शर्करा-मिश्रित दधि-युक्त माष-भक्त की बलि दे (४८) । इस बलि को ईशान-कोण में रखकर वरुण-बीज (वं) से उसे शुद्ध करे । फिर गन्ध-पुष्प से उसकी पूजा कर निम्न मन्त्र से उसे उत्सर्ग करे— सर्वे देवाः सिद्ध-गणा गन्धर्बोरग-राक्षसाः । पिशाचो मातरो यक्षा भूताश्च पितरस्तथा ॥ ऋषयो येऽन्य-देवाश्च बलिं गृह्णन्तु संयताः । परिवार्य महा-देवं तिष्ठन्तु गिरिजामपि ॥ अर्थात् सभी देव, सिद्ध-गण, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पिशाच, मातृ-गण, यक्ष, भूत, पितृ-गण, ऋषि और अन्य देव-गण संयत होकर बलि ग्रहण करें तथा ये सब महा-देव और महा-देवी गिरिजा के चारों ओर विराजें (४६-५१) । तब महा-देवी के उक्त मन्त्र 'ह्रीं श्रीं हूँ स्वाहा' का यथा-शक्ति जप करे। फिर उत्तम गीत-वाद्यादि द्वारा मङ्गल-कार्य करे (५२) । इस प्रकार अधिवास कर अगले दिन नित्य-क्रिया कर यथा-विधि सङ्कल्प कर पंच-देवों की पूजा करे (५३) । फिर मातृका-पूजा, वसुधारा और वृद्धि-श्राद्ध कर भक्तिपूर्वक महेश्वर की और नन्दी आदि द्वार-पालों की पूजा करे (५४) । १. नन्दी, २. महा-बल, ३. कोश-वदन ओर ४ गण-नायक—ये शिव के द्वार-पाल हैं। ये सभी अस्त्र-शस्त्र-धारी हैं (५५) । तब वेदी-रूपा तारिणी और शिव-लिङ्ग को लाकर सर्वतोभद्र- मण्डल में या उत्तम आसन पर स्थापित करे (५६) । फिर 'ह्रीं ॐ ह्रीं त्र्यम्बकं यजामहे' मन्त्र का पाठ करते हुए अष्ट-कलश के जल से महा-देव को स्नान कर षोडशोपचार-पूजा करे (५७) । तब 'ह्रीं श्रीं हूँ स्वाहा' मन्त्र से वेदी का स्थापन कर उस पर लिङ्ग को स्थापित कर पूजा करे । फिर हाथ जोड़कर मङ्गल-मय शङ्कर की प्रार्थना करे (५८)— आगच्छ भगवन् ! शम्भो ! सर्व-देव-नमस्कृत ! पिनाक-पाणे ! सर्वेश ! महा-देव ! नमोऽस्तु ते ॥ आगच्छ मन्दिरे देव ! भक्तानुग्रह-कारक ! भगवत्या सहाऽऽगच्छ कृपां कुरु नमो नमः ॥ मातर्देवि ! महा-माये ! सर्व-कल्याण-कारिणि ! प्रसीद शम्भुना सार्धं नमस्तेऽस्तु हर-प्रिये ॥ आयाहि वरदे देवि ! भवनेऽस्मिन् वर-प्रदे ! प्रीता भव महेशानि ! सर्व-सम्पत्-करो भव ॥ उत्तिष्ठ देव-देवेशि ! स्वैः स्वैः परिकरैः सह । सुखं निवसतं गेहे प्रोयेतां भक्त-वत्सलौ ॥ अर्थात् हे भगवन् शम्भो ! हे सब देवों से नमस्कृत ! हे पिनाक-पाणे ! हे सर्वेश ! हे महा-देव ! आओ, तुम्हें नमस्कार । हे देव ! तुम मन्दिर में आओ । हे भक्तों पर कृपा करनेवाले ! कृपया भगवती के साथ आओ । तुम्हें बारम्बार नमस्कार । हे महा-माये ! हे सर्व-कल्याण-कारिणि ! हे हर-प्रिये ! हे मातः ! हे देवि ! महेश्वर