भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि | १०६ पत्ता बाहर निकाले। उस पत्ते में जिस नाग का नाम हो, उसी को जल का रक्षक बनाए (१७२)। तैल, हरिद्रा से लिप्त लकड़ी का एक सीधा, बीस हाथ लम्बा शुभ स्तम्भ लाकर व्याहृति और प्रणव का पाठ करते हुए उसे तीर्थ-जल से स्नान कराये। उस स्नापित स्तम्भ में ह्रीं, श्रीं, क्षमा और शान्ति के साथ नाग की पूजा करे (१७३-७४) । फिर प्रार्थना करे- नाग ! त्वं विष्णु-शय्याऽसि महादेव-विभूषणम् । स्तम्भमेनमधष्ठाय जल-रक्षां कुरुष्व मे । अर्थात् हे नाग ! तुम विष्णु की शय्या और महादेव के अलङ्कार हो। इस स्तम्भ में स्थान बनाकर मेरे जल की रक्षा करो (१७५) । इसके बाद उस नागाधिष्ठित स्तम्भ को जलाशय के मध्य में स्थापित कर कर्त्ता तड़ाग की प्रदक्षिणा करे (१७६)। यह स्तम्भ यदि पहले से स्थापित हो, तो नाग की पूजा घट में कर उस घट का जल तड़ाग में छोड़कर शेष कर्म समाप्त करे (१७७) । इसी प्रकार गृह-प्रतिष्ठा में भी सङ्कल्प कर वास्तु-पूजा से वसु-धारा और आभ्युदयिक तक के कर्म कर वरुण के स्थान पर 'प्रजापति देव' की विशेष रूप से पूजा करे और प्राजापत्य होम करे (१७८-७६)। पूर्वोक्त मन्त्र से गृह को प्रोक्षित और गन्धादि से अर्पित कर ईशान कोण की ओर मुख कर हाथ जोड़ प्रार्थना करे (१८०)- प्रजा-पति-पते गेह ! पुष्प-माल्यादि-भूषितः । अस्माकं शुभ-वासाय सर्वथा सुखदो भव ।। अर्थात् हे प्रजापति-स्वामी के गृह ! तुम पुष्प-माल्यादि से भूषित होकर मेरे शुभ आवास के लिए सब प्रकार से सुखदायक हो (१८१) । तब दक्षिणा तक कर्म कर शान्ति और आशीर्वाद करे। अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मण, कौल और दरिद्रों को भोजन कराये (१८२) । हे शैलजे ! यदि दूसरे के लिए गृह-प्रतिष्ठा हो, तो सङ्कल्प में 'अमुकस्य वासाय' अर्थात् 'अमुक (नामोल्लेख करे) के वास के लिए' ये शब्द जोड़ ले। देवता के लिए निर्मित गृह की प्रतिष्ठा की विधि सुनो (१८३)। उक्त प्रकार गृह-संस्कार कर शंख-तूर्यादि वाद-ध्वनि करते हुए देवता के पास जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (१८४)- उत्तिष्ठ देव-देवेश ! भक्तानां वाञ्छित-प्रद ! आगत्य जन्म-साफल्यं कुरु मे करुणा-निधे ।। अर्थात् हे देव-देवेश ! हे भक्त के अभीष्ट को देनेवाले ! हे दयासागर ! उठिये, आकर मेरे जन्म को सफल बनायें (१८५) । इस प्रकार प्रार्थना कर साधक देवता को गृह के समीप लाकर स्थापन-पूर्वक उसके सम्मुख भाग में वाहन की स्थापना करे (१८६)। गृह के ऊपर त्रिशूल या चक्र स्थापित मन्दिर के ईशान-कोण में पताका-युक्त ध्वजा- रोपण करे (१८७) ! चन्द्रातप, क्षुद्र घण्टे, पुष्प-माल्य और आम्र-पल्लवों से गृह को अच्छी तरह सजाकर दिव्य वस्त्र द्वारा आच्छादन करे (१८८) । आगे बताई विधि से विहित द्रव्यों से उत्तराभिमुख स्थापित देव क, स्नान कराये (१८६)- १. दुग्ध-स्नान- 'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं दुग्धेन स्नापयामि त्वां मातेव परिपालय' अर्थात् दुग्ध से तुम्हें स्नान कराता हूँ, माता के समान मेरा पालन करो-इस मन्त्र से देवता को दूध से स्नान कराए। २. दधि-स्नान - 'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं दध्ना त्वां स्नापयाम्यद्य भव-ताप-हरो भव' अर्थात् दही से तुम्हें आज स्नान कराता हूँ, संसार के दुःख-हारी बनो-इस मन्त्र से देवता को दही से स्नान कराए। ३. मधु-स्नान- 'ऐं ह्रीं श्री मूलं मधुना स्नापितः प्रीतो मामानन्द-मयं कुरु' अर्थात् मधु से स्नान कर

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