भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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१०८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कर वास्तु-होम आरम्भ करे (१४८) । वास्तु को, वास्तु के परिवार-गण को और पूजित देवतादि को यथा-शक्ति आहुति देकर कर्म समाप्त करे (१४६) । वास्तु-याग में पृथक् भाव से कर्तव्य यह 'क्रम' तुमसे मैंने कहा। हे प्रिये ! ग्रह-यज्ञ में भी यही 'क्रम' विहित है। ग्रह-याग में ग्रहों को प्रधानता होने से अङ्ग-भाव में उनकी पूजा मना है, अतः सङ्कल्प के बाद अङ्ग-भाव से वास्तु-दैत्य की पूजा कर्तव्य है—यह विशेषता है (१५०-५१) । गणेशादि देव-पूजादि सभी कर्म वास्तु-याग के विधान के अनुसार होंगे। ग्रहादि के यन्त्र, मन्त्र और ध्यान पहले हो बताए हैं (१५२) । प्रसङ्ग- क्रम से ग्रह-याग और वास्तु-याग का 'क्रम' कहा जायगा। अब पूर्व-प्रस्तावित कर्मों में से 'कूप-संस्कार' की विधि कहता हूँ (१५३) । यथा-विधि सङ्कल्प कर मण्डल पर स्थापित घट या शालग्राम के मध्य में, जिसमें भी रुचि हो, वास्तु-पूजा करे (१५४) । तब गणपति, ब्रह्मा- सरस्वती, हरि-लक्ष्मी, शिव-दुर्गा की पूजा करे और नौ ग्रह, दश दिक्-पाल, मातृ-गण एवं अष्टवसु भी पूजनीय हैं। फिर पितृ-कार्य करे। 'कूप-संस्कार' में 'वरुण' की प्रधानता है, अतः उनकी पूजा विशेष रूप से करे (१५५- ५६) । यथा-शक्ति विविध उपहारों से 'वरुण' की पूजा कर यथा-विधि संस्कृत अग्नि में 'वरुण देवता' के लिए होम करे। पूजित देव-गण में से प्रत्येक को आहुति देकर पूर्णाहुति तक का सारा कार्य कर होम समाप्त करे (१५७-५८) । तब ध्वज-पताका-माल्य-चन्दन-सिन्दूर से चर्चित उत्तम जलाशय को पूर्वोक्त प्रोक्षण-मन्त्र से प्रोक्षित करे (१५६) । फिर अपनी कामना-पूर्ति के लिए या देवता को प्रीति के लिए सभी समयों में प्राणियों को प्रसन्न करनेवाले कृपादि जलाशय को उत्सर्ग करे (१६०) । श्रेष्ठ साधक हाथ जोड़कर प्रार्थना करे कि— सुप्रीयन्तां सर्व-भूता नभो-भू-तोय-वासिनः, उत्सृष्टं सर्व-भूतेभ्यो मयैतज्जालमुत्तमम् । तृप्यन्तु सर्व-भूतानि स्नान-पानावगाहनैः, सामान्यं सर्व-जीवेभ्यो मया दत्तमइदं जलम् । ये च केचिद् विपद्यन्ते स्व-स्व-कर्म-विपाकतः, तत्-पापेर्न प्रलिप्येऽहं सफलास्तु मम क्रिया ॥ अर्थात् खेचर, भूचर, जलचर—सभी प्राणी प्रसन्न हों, सभी प्राणियों के लिए मैं इस उत्तम जल को उत्सर्ग करता हूँ। सभी प्राणी स्नान, अङ्ग-प्रक्षालनादि, पान और अवगाहन कर तृप्त हों। मैं इस जल को सामान्यतः सब जीवों के लिए दान करता हूँ अर्थात् मैं इस भाव से दान करता हूँ कि इस पर सभी जीवों का समान अधि- कार हो। अपने-अपने कर्म-फल से जो कोई व्यक्ति इसमें देह-त्याग करें, उसके पाप में मैं लिप्त न होऊँ। मेरी क्रिया सफल हो। इसके बाद दक्षिणा तक कार्य कर शान्ति-कर्म करने के बाद ब्राह्मण, कौल और भूखे दरिद्र लोगों को भोजन कराए। हे शिवे ! सभी जलाशयों की प्रतिष्ठा का यही 'क्रम' है (१६१-६५) । तड़ागादि की प्रतिष्ठा में नाग, स्तम्भ और जलचर का भी निर्माण करना होता है (१६६) । मत्स्य, मण्डूक, मकर और कूर्म—ये सभी जल-जन्तु या जलचर कर्त्ता की सम्पत्ति के अनुसार धातु के बनवाये (१६७) । मत्स्य-मिथुन और मण्डूक-मिथुन स्वर्ण के, मकर-मिथुन रजत के, कूर्म-मिथुन ताम्र या पीतल के बनवाये (१६८) । इन सब जलचरों के सहित तड़ाग, दीर्घिका, या सागर का उत्सर्ग कर 'सुप्रीयन्तां ०' इत्यादि श्लोकों से प्रार्थना करे। फिर नाग-पूजा करे (१६६)— १ अनन्त, २ वासुकि, ३ पद्म, ४ महा-पद्म, ५ तक्षक, ६ कुलीर, ७ कर्कट, ८ शङ्ख—ये आठ नाग जल के रक्षक हैं (१७०) । आठ अश्वत्थ के पत्तों पर इन नागों के नाम लिखकर प्रणव और गायत्री का स्मरण करते हुए उन पत्तों को घट के मध्य में छोड़ दे (१७१) । चन्द्र और सूर्य को साक्षी कर घट के भीतर विलोडन कर एक