महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि | १०७ जल से प्रोक्षित होकर मेरी सभी इच्छाओं को पूरा करो (१३०)। ४ सेतु-प्रोक्षण-मन्त्र—'सेतुस्त्वं भव-सिन्धूनां पारदः पथिक-प्रियः। मया संप्रोक्षितः सेतो ! यथोक्त- फलदो भव ।।' अर्थात् हे सेतु ! तुम ससार-सागर से पार करनेवाले, पथिकों के प्रिय हो। मुझसे प्रोक्षित होकर निर्दिष्ट फल-दाता बनो (१३१)। ५ संक्रम-प्रोक्षण-मन्त्र—'संक्रम ! त्वां प्रोक्षयामि लोकानां संक्रमं यथा । ददासीह तथा स्वर्गे संक्रमो मे प्रदीयताम् ।।' अर्थात् हे संक्रम ! तुम्हें प्रोक्षित करता हूँ। इस संसार में जैसे लोगों को पार करते हो, वैसे ही मुझे स्वर्ग में गति प्रदान करो (१३२) । हे प्रिये ! उपवन-प्रोक्षण-मन्त्र का ही प्रयोग वृक्ष के संस्कार में करे (१३३)। हे अम्बिके ! सर्व-साधारण द्रव्य के प्रोक्षण का मन्त्र है—ॐ वं फट् (१३४)। 'वाहन' यदि स्नान कराने योग्य हो, तो उसे गायत्री मन्त्र से स्नान कराये; स्नान कराने योग्य न हो, तो कुशाग्र से अर्घ्य-जल द्वारा उसे शोधित करे (१३५)। प्राण-प्रतिष्ठा कर उस 'वाहन' का नामोल्लेख कर, पूजाकर और सजाकर उसे देवता को प्रदान करे (१३६)। जलाशय की प्रतिष्ठा में जल-जन्तु के अधिपति 'वरुण देव', गृह-प्रतिष्ठा में 'ब्रह्मा प्रजापति' और उपवन, सेतु, संक्रम-प्रतिष्ठा में त्रिभुवन-रक्षक सर्वात्मा, सर्वज्ञ प्रभु 'विष्णु' पूजनीय हैं (१३७) । देवी ने कहा—विविध विधान आपने बताये हैं, किन्तु कर्मों का 'क्रम' नहीं बताया है (१३८) । क्रम- रहित कर्म बहुत प्रयत्न के साथ करने पर भी पूरा फल नहीं देता (१३६) । श्री सदाशिव ने कहा — हे परमेश्वरि ! माता के समान हित करनेवाली ! तुमने क्रमानुसार कार्य करने की जो बात पूछी है, वह लोगों के लिए बड़ी मङ्गलकारी है (१४०) । हे देवि ! 'वास्तु-याग' से लेकर उक्त सभी कार्यों के अनुष्ठान का क्रम मैं बताता हूँ (१४१)। पूर्व-दिन में आहार-संयम कर अगले दिन प्रातः स्नान करे । फिर पूर्वाह्न-कर्म सम्पन्न कर गुरु और नारायण की पूजा करे (१४२) । तब अपनो कामना का उल्लेख करते हुए विधिपूर्वक सङ्कल्प कर गणेशादि की पूजा करे (१४३) । गणेश का ध्यान— बन्धूकाभं त्रिनेत्रं द्विरद-वर-मुखं नाग-यज्ञोपवीतं, शङ्खं चक्रं कृपाणं विमल-सरसिजं हस्त-पद्मैर्दधानम् ॥ उद्यद्-बालेन्दु-मौलिं दिनकर-किरणोद्दीप्त-वस्त्राङ्ग-शोभं, नानालङ्कार-युक्तं भजत गण-पतिं रक्त-पद्मोपविष्टम् ॥ अर्थात् बन्धूक पुष्प के समान रक्त-वर्ण, त्रिनेत्र, गजेन्द्र-वदन, सर्प-मय-यज्ञोपवीत-धारी, चार कर-कमलों में शङ्ख, चक्र, खड्ग और खिला हुआ कमल लिए, उदोयमान बाल-चन्द्र से शोभित मस्तक, सूर्य की किरणों के समान उज्ज्वल वस्त्र और विविध आभूषणों से शोभित शरीर, रक्त कमल पर विराजमान गणपति का भजन करता हूँ (१४४)। इस प्रकार गणेश का ध्यान कर यथा-शक्ति उनकी पूजा करे। फिर ब्रह्मा-सरस्वती और विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करे (१४५)। शिव, नव-दुर्गा, षोडश-मातृका और घृत-धारा से वसु-गण की पूजा कर आभ्युदयिक करे (१४६)। तब उक्त विधि के अनुसार वास्तु-राक्षस के मण्डल को बनाकर उसमें सपरिवार वास्तु-देव की पूजा करे (१४७)। फिर स्थण्डिल में पूर्ववत् अर्थात् कुशाण्डिकोक्त विधि से अग्नि-संस्कार व धारा-होम तक के कर्म समाप्त