भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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११० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रसन्न हो, मुझे आनन्द-मय करो—इस मन्त्र से देवता को मधु से स्नान कराये । ४. घृत-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं सावित्रीं ॐ देव-प्रियेण हविषा आयुः शुक्रेण तेजसा । स्नानं ते कल्प- यामीश ! मामरोगं सदा कुरु' अर्थात् हे ईश ! देव-प्रिय, आयु, वीर्य और तेज-स्वरूप घृत से तुम्हें स्नान कराता हूँ, मुझे सदा नीरोग रखो—इस मन्त्र से देवता को घृत से स्नान कराये (१६०-६३) । ५. शर्करा-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं व्याहृतिं गायत्रीं देवेश ! शर्करा-तोयैः स्नातो मे यच्छ वांछितम्' अर्थात् हे देवेश ! शर्करा-जल से स्नान कर मुझे मेरा अभीष्ट फल प्रदान करो —इस मन्त्र से देवता को शर्करा-जल से स्नान कराये (१६४) । ६. नारिकेल-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं गायत्रीं वं विधात्रा निर्मितैर्दिव्यैः प्रियैः स्निग्धैरलौकिकैः, नारि- केलोदकैः स्नानं कल्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् ब्रह्मा द्वारा निर्मित दिव्य, प्रिय, स्निग्ध और अलौकिक नारि- केल-जल से तुम्हें स्नान कराता हूँ, तुम्हें नमस्कार है—इस मन्त्र से देवता को नारिकेल-जल से स्नान कराये । ७. इक्षु-स्नान—'गायत्रीं मूलं इक्षुजैः रसैः स्नापयामि' मन्त्र से ईख के रस से देवता को स्नान कराये । ८. कर्परा स्नान—'क्लीं ॐ गायत्रीं मूलं कर्पूरागुरु-काश्मीर-, स्तूरी-चन्दनोदकैः, सुस्नातो भव सुप्रीतो भुक्ति-मुक्ती प्रय ' अर्थात् कपूर, अगुरु, कुंकुम कस्तूरी और चन्दन-युक्त जल से सुस्नात होकर प्रसन्न हों ओर मुझे भोग व मोक्ष प्रदान करें—इस मन्त्र से उक्त प्रकार सुगन्धित जल से देवता को स्नान कराये (१६५-६७) । इस प्रकार आठ कलशों से स्नान कराकर जगत्पति को मन्दिर के भीतर लाकर आसन के ऊपर स्थापित करे (१६८) । देव-प्रतिमा यदि स्नान कराने योग्य न हो, तो यन्त्र में या देवता के मूल-मन्त्र में या शालग्राम शिला में स्नान कराकर पूजा करे (१६६) । दुग्धादि से उक्त प्रकार स्नान कराने में यदि असमर्थ हो, तो यथा-शक्ति शुद्ध जल से भरे हुए आठ, सात या पाँच कलश द्वारा स्नान कराये (२००) । चक्र-पूजा के प्रसङ्ग में कलश का परिमाण बताया है, आगमोक्त सभी कर्मों में उसी प्रकार का घट विहित है (२०१) । इसके बाद अपनी-अपनी पूजा-विधि के अनुसार महादेव की पूजा करे । उस पूजा के सभी उपचारों को बताता हूँ, हे परात्परे ! सुनो (२०२) —१. आसन, २, स्वागत, ३. पाद्य, ४. अर्घ्य, ५. आचमनीय, ६. मधु- पर्क, ७. पुनः आचमनीय, ८. स्नानीय, ६. वस्त्र, १०. भूषण, ११. गन्ध, १२. पुष्प, १३. धूप, १४. दीप, १५. नैवेद्य और १६. वन्दना—ये षोडश उपचार देव-पूजा में कहे हैं (२०३-४) । १. पाद्य, २. अर्घ्य, ३. आच- मन, ४. मधुपर्क, ५. पुनः आचमन, ६. गन्ध, ७. पुष्प, ८. धूप, ६. दीप, १०. नैवेद्य—ये 'दशोपचार' माने गए हैं (२०५) । १. गन्ध, २. पुष्प, ३. धूप, ४. दीप और ५. नैवेद्य—ये 'पञ्चोपचार' कहे हैं (२०६) । 'फट्' मन्त्र से अर्घ्य-पात्र के जल से अभिषेक कर धेनु-मुद्रा दिखाने के बाद गन्ध-पुष्प से पूजा कर देय द्रव्य का नामोल्लेख करे (२०७) । आगे बताए मन्त्र और मूल-मन्त्र का स्मरण कर चतुर्थी विभक्ति-युक्त देव-नाम का उच्चारण कर त्यागार्थ वचन का पाठ करे (२०८) । देवता के लिए देय सभी वस्तुओं के निवेदन को यहीं विधि है; इसी के अनु- सार देवता को द्रव्य प्रदान करे (२०६) । आद्या की पूजा-विधि में पाद्य, अर्घ्यादि देने और कारणादि के अर्पण करने का विधि बताई जा चुकी है (२१०) । वहाँ जो मन्त्र नहीं बताए हैं, उन्हें यहां बताता हूँ, सुनो । आसनादि उपचारों के देने में इन्हीं का प्रयोग करे (२११)— १. आसन—'सर्व-भूतान्तरस्थाय सर्व-भूतान्तरात्मने कल्पयाम्युपवेशार्थमासनं ते नमो' नमः अर्थात् सब प्राणियों के अन्तर में स्थित और सब प्राणियों के अन्तरात्मा-स्वरूप तुम्हें बैठने हेतु आसन देता हूँ । तुम्हें