भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १११ बारम्बार नमस्कार (२१२) । २ स्वागत--हाथ जोड़कर स्वागत की प्रार्थना करे : 'देवाः स्वाभीष्ट-सिद्धयर्थं यस्य वाञ्छन्ति दर्शनं, सुस्वागतं स्वागतं मे तस्मै ते परमात्मने । अद्य मे सफलं जन्म जीवनं सफलाः क्रियाः, स्वागतं यत् त्वया तन्मे तपसां फलमागतम्' अर्थात् सभी देवता अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए जिनके दर्शन की चाह करते हैं, उन तुम परमात्मा का मैं स्वागत करता हूँ। आज मेरा जन्म, जीवन और सारा कर्म सफल है क्योंकि तुम्हारे स्वागत के रूप में मेरी तपस्या का फल ही मुझे मिला है (२१३-१५) । ३. पाद्य—विहित पाद्य जल को लेकर कहे : 'यत्पाद-जल-संस्पर्शाच्छुद्धिमाप जगत्-त्रयं, तत्-पादाब्ज- प्रोक्षणार्थं पाद्यं ते कल्पयाम्यहम्' अर्थात् जिन चरणों के जल के स्पर्श से तीनों लोक शुद्ध होते हैं, उन तुम्हारे चरणों के धोने हेतु मैं तुम्हें पाद्य देता हूँ (२१६-१७) । ४. अर्घ्य—परमानन्द-सन्दोहो जायते यत्-प्रसादतः, तस्मै सर्वात्म-भूताय आनन्दाघ्यं समर्पये' अर्थात् जिनकी प्रसन्नता से परमानन्द-परम्परा होती है, सबकी आत्मा-स्वरूप उन तुमको मैं अर्घ्य देता हूँ (२१८) । ५. आचमनीय—प्रोक्षित और चर्चित जातो-लवङ्ग-कक्कोल से सुगन्धित जल या केवल शुद्ध जल लेकर कहे : 'यदुच्छिष्टमुपस्पृष्टं शुद्धिमेत्यखिलं जगत्, तस्मै मुखारविन्दाय आचामं कल्पयामि ते' अर्थात् जिसके जूठे के स्पर्श से सारा जगत् शुद्धि को प्राप्त करता है, तुम्हारे उसी मुख-कमल के लिए मैं आचमन देता हूँ (२१६-२०) । ६. मधुपर्क—मधुपर्क को लेकर भक्ति-पूर्वक उसे आगे के मन्त्र से अर्पित करे : 'ताप-त्रय-विनाशार्थम- खण्डानन्द-हेतवे, मधुपर्कं ददाम्यद्य प्रसीद परमेश्वर' अर्थात् तीनों दुःखों के नाश के लिए अखण्डानन्द के कारण-स्वरूप तुम्हें मधुपर्क देता हूँ। हे परमेश्वर, प्रसन्न होओ (२२१-२२) । ७. पुनराचमनीय—'अशुचिः शुचितामेति यत्-स्पृष्ट-स्पर्श-मात्रतः, तस्मिंस्ते वदनाम्भोजे पुनराचम- नीयकम्' अर्थात् जिससे छुए के स्पर्श मात्र से अपवित्र भी पवित्र हो जाता है, तुम्हारे उसी मुख-कमल में पुनः आचमन अर्पित है (२२३) । ८. स्नानीय—स्नान हेतु पूर्ववत् प्रोक्षित और चर्चित जल देवता के सामने रखकर कहे : 'यत्-तेजसा जगद् व्याप्तं यतो जातमिदं जगत्, तस्मै ते जगदाधार ! स्नानार्थं तोयमर्पये' अर्थात् जिनके तेज से जगत् व्याप्त है, जिनसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है, हे जगदाधार ! उन्हीं तुमको स्नान के लिए जल देता हूँ (२२४-२५) । स्नान, वस्त्र और नैवेद्य देने के बाद आचमन देना चाहिए । अन्य द्रव्यों के देने के बाद एक-एक बार जल छोड़ना चाहिए (२२६) । ६. वस्त्र—दो वस्त्र लेकर पूर्ववत् शोधित कर दोनों हाथों में उन्हें उठाकर कहे : सर्वावरण-हीनाय माया- प्रच्छन्न-तेजसे, वाससी परिधानाय कल्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् सब प्रकार के आवरणों से रहित, अविद्या से छिपे हुए तेजवाले तुम्हारे लिए उत्तरीय के साथ वस्त्र देता हूँ, तुम्हें नमस्कार (२२७-२८) । १०. आभूषण—स्वर्ण, रोप्य आदि के बने विविध आभूषणों का प्रोक्षण और अर्चन कर कहे : 'विश्वा- भरण-भूताय विश्व-शोभैक-योनये, माया-विग्रह-भूषार्थं भूषणानि समर्पये' अर्थात् विश्व के आभूषण-स्वरूप एवं विश्व को शोभा के एकमात्र कारण, तुम्हारे माया-मय शरीर के सजाने हेतु आभूषण देता हूँ (२२६-३०) । ११ गन्ध—'गन्ध-तन्मात्रया सृष्टा येन गन्ध-धरा धरा, तस्मै परात्मने तुभ्यं परमं गन्धमर्पये' अर्थात् जिनके द्वारा गन्ध-तन्मात्रा से गन्धवती पृथ्वी रची गई है, उन्हीं परात्मा-स्वरूप तुम्हें परम गन्ध देता हूँ (२३१) । १२ पुष्प—'पुष्पं मनोहरं रम्यं सुगन्ध देव-निर्मितं, मया निवेदितं भक्त्या पुष्पमेतत् प्रगृह्यताम्'