महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् मनोहर, सुन्दर, सुगन्धित, देवों द्वारा बनाए इस पुष्प को भक्तिपूर्वक देता हूँ, इसे ग्रहण करो (२३२) । १३ धूप- 'वनस्पति-रसो दिव्यो गन्धाढ्यः सुमनोहरः आघ्रेयः सर्व-भूतानां धूपो घ्राणाय तेऽप्यंते' अर्थात् वनस्पति का दिव्य रस, गन्ध-युक्त, बहुत मनोहर, सभी प्राणियों के सूंघने योग्य धूप तुम्हारे सूंघने के लिए देता हूँ (२३३) । १४ दीप--'सुप्रकाशो महा-दीप्तः सर्वतस्तिमिरपहः, स-बाह्याभ्यन्तर-ज्योतिर्दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्' अर्थात् सुन्दर प्रकाशवाला, अति दीप्ति-शाली, सभी दिशाओं का अँधेरा दूर करनेवाला, बाह्य और अन्तर को ज्योतिर्मय करनेवाला यह दीपक ग्रहण करो (२३४) । १५ नैवेद्य - 'नैवेद्यं स्वादु-संयुक्तं नाना-भक्ष्य-समन्वितं, निवेदयामि भक्त्येदं जुषाण परमेश्वर' अर्थात् स्वादिष्ट, विविध खाने योग्य वस्तुओं से युक्त यह नैवेद्य भक्ति के साथ देता हूँ। हे परमेश्वर, इसे ग्रहण करो (२३५) । आचमन—'...र्थं सलिलं देव ! कर्पूरादि-सुवासितं, सर्व-तृप्ति-करं स्वच्छमर्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् हे देव ! क... से गन्धित, पूर्ण तृप्ति-दायक, निर्मल जल पीने के लिए देता हूँ। तुम्हें नमस्कार (२३६) । १६ ताम्बू—'कर्पूर- लवंगैलादिभिर्युतं ताम्बूलं निवेदयामि' अर्थात् कपूर, कत्था लौंग आदि से युक्त पान देता हूँ। अब पुनः आचमनीय देकर वन्दना करे (२३७) । उपचार का आधार देते समय 'साधारं' अर्थात् तेज- साधार-सहित इत्यादि यथा-सम्भव कहकर द्रव्य का नाम ले या उस आधार का नाम लेकर उसे अलग से प्रदान करे (२३८) । इस प्रकार पूजित देवता को तीन पुष्पाञ्जलियां देकर आच्छादन-युक्त गृह का प्रोक्षण कर हाथ जोड़कर निम्न मन्त्र पढ़े (२३६)- गेह ! त्वं सर्व-लोकानां पूज्यः पुण्य-यशः-प्रदः, देवता-स्थिति-दानेषु सुमेरु-सदृशो भव । त्वं कैलासश्च वैकुण्ठस्त्वं ब्रह्म-भवनं गृह । यत् त्वया विधृतो देवस्तस्मात् त्वं सुर-वन्दितः । यस्य कुक्षौ जगत् सर्वं वरीवर्ति चराचरम्, माया-विधृत-देहस्य तस्य मूर्तेर्विधारणात् । देव-मातृ-समस्त्वं हि सर्व-तीर्थ-मयस्तथा, सर्व-काम-प्रदो भूत्वा शान्ति मे कुरु ते नमः ॥ अर्थात् हे गृह ! तुम सब लोकों के पूज्य, पुण्य और यश-दाता देवता को स्थिति देकर सुमेरु के समान बनो (२४०)। हे गृह ! तुम कैलास हो, तुम वैकुण्ठ हो, तुम ब्रह्म-भवन हो; क्योंकि तुम देवता को धारण करते हो, इससे देवता तुम्हारी वन्दना करते हैं (२४१) । जिनके पेट में सारा जगत् है, माया से शरीर धारण करने- वाले उसी ब्रह्म की मूर्ति को धारण करने से तुम देव-माता के समान हो और सभी तीर्थों से युक्त हो। तुम सब कामनाओं की पूर्ति-कर्ता होकर मुझे शान्ति दो, तुम्हें नमस्कार है (२४२-४३) । गृह को तीन बार नमस्कार कर साधक अपनी अभिलाषा-पूर्ति के लिए चक्रादि-युक्त उस गृह को निवेदित करे (२४४) । विश्वावासाय विश्वाय गृहं ते विनिवेदितं, अङ्गीकुरु महेशान ! कृपया सन्निधीयताम् । अर्थात् विश्वावास-स्वरूप तुम्हें रहने के लिए यह गृह निवेदित करता हूँ। हे महेशान ! इसे गृहण करें और कृपया इसमें सन्निहित हों (२४५) । इस प्रकार गृह को अर्पण कर देवता के लिए दक्षिणा देकर शङ्ख, तूर्यादि की ध्वनि करते हुए वेदी के