भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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चौदहवां उल्लास : शिव-लिङ्ग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । ११७ सहस्र अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है (२५)। १ मही, २ गन्ध, ३ शिला, ४ धान्य, ५ दूर्वा, ६ पुष्प, ७ फल, ८ दधि, ६ घृत, १० स्वस्तिक, ११ सिन्दूर, १२ शंख, १३ कज्जल, १४ रोचना, १५ श्वेत सर्षप, १६, सुवर्ण, १७ रौप्य, १८ ताम्र, १६ दीप, २० दर्पण-ये बीस द्रव्य 'अधिवास' में लगाए (२६-२७)। इनमें से एक-एक द्रव्य को लेकर 'माया' (ह्रीं) और गायत्री का पाठ करते हुए कहे कि इस द्रव्य द्वारा इस देवता का शुभाधिवासन हो (२८)। 'ह्रीं गायत्र्यै अनेन द्रव्येणामुष्य दैवतस्य शुभमधि-वासनमस्तु।' उक्त मन्त्र द्वारा 'मही' आदि प्रत्येक वस्तु से देवता के ललाट को छुए। इसी प्रकार प्रशस्ति-पात्र द्वारा तीन बार अधिवास करे (२६)। इस विधि से देवता का अधिवास कर गृह-प्रतिष्ठा-विधि के अनुसार दुग्धादि द्वारा उस देवता को स्नान कराए (३०)। स्नान कराने के बाद वस्त्र से शिव-लिंग को मार्जित कर, आसन पर स्थापित कर, पूजानुष्ठान की विधि से गणेशादि देवताओं का अर्चन करे (३१)। प्रणव से करांग-न्यास और प्राणायाम कर कोटि-चन्द्र के समान प्रभाववाले, शान्त-स्वरूप सदाशिव का ध्यान करे (३२)- व्याघ्र-चर्म-परीधानं नाग-यज्ञोपवीतिनम्, विभूति-लिप्त-सर्वाङ्गं नागालङ्कार-भूषितम्। धूम्र-पीतारुण-श्वेत-रक्तैः पंचभिराननैः, युक्तं त्रि-नयनं विभ्रज्जटा-जूट-धरं विभुम्। गङ्गा-धरं दश-भुजं शशि-शोभित-मस्तकम्, कपालं पावकं पाशं पिनाकं परशुं करैः। वामैर्दधानं दक्षैश्च शूलं वज्रांकुशं शरम्, वरं च विभ्रतं सर्वैर्देवैर्मुनि-वरैः स्तुतम्। परमानन्द-सन्दोहोल्लसत्-कुटिल-लोचनम्, हिम-कुन्देन्दु-सङ्काशं वृषासन-विराजितम्। परितः सिद्ध-गन्धर्वरप्सरोभिरहनिशम्, गीयमानमुमा - कान्तमेकान्त - शरण - प्रियम् ॥ अर्थात् व्याघ्र-चर्म पहने, नाग का यज्ञोपवीत धारण किए, सारे शरीर में भस्म लगाए, नागों के आभू- षणों से शोभित, धूम्र-पीत-अरुण-श्वेत-रक्त इन पाँच वर्णवाले पाँच मुखों से युक्त, त्रिनेत्र, जटा-जूटधारी, प्रभु, गंगा-धर, दश-भुज, चन्द्र-कला से शोभित मस्तकवाले, बाएँ पाँच हाथों में कपाल, अग्नि, पाश, धनुष, परशु- धारी, दाएँ पाँच हाथों में शूल, वज्र, अंकुश, वाण, वर-धारी, सभी देवों और श्रेष्ठ मुनियों द्वारा वन्दित, परमानन्द से उल्लसित बाँके नेत्रोंवाले, हिम, कुन्द पुष्प और चन्द्र के समान श्वेत वर्णवाले बैल पर सवार, चारों दिशाओं में स्थित सिद्धों, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा स्तूयमान, उमा के पति, एकमात्र शरणागत भक्तों के प्रिय सदाशिव का ध्यान करता हूँ (३३-३८)। इस प्रकार महादेव का ध्यान कर मानसिक उपचारों से पूजा कर उसी लिंग पर उनका आवाहन कर यथा-शक्ति उनकी पूजा करे (३६)। आसनादि सभी उपचारों के मन्त्र पहले कहे हैं। अब महात्मा महेश्वर का मूल-मन्त्र बताता हूँ (४०)-माया (ह्रीं), प्रणव (ॐ), शब्द-बीज (ह), 'औ' और चन्द्र-बिन्दु अर्थात् 'ह्रीं ॐ ह्रौं' -यह 'शिव-बीज' कहा है (४१)। फिर सुगन्धित पुष्प-माला और वस्त्र से शिव को ढँककर दिव्य शय्या पर स्थापित कर 'गौरी-पट्ट' का शोधन करे (४२)। 'गौरी-पट्ट' के ऊपर देवी की इस विधि से पूजा करे। पहले 'ह्रीं' बीज से कर-न्यास और प्राणायाम करे (४३)। फिर देवी का ध्यान करे- उद्यद्-भानु-सहस्र-कान्तिममलां वह्न्यर्क-चन्द्रेक्षणाम्, मुक्ता-यन्त्रित-हेम-कुण्डल-लसत्-स्मेराननाम्भोरुहाम्। हस्ताब्जैरभयं वरं च दधतीं चक्रं तथाब्जं दधत्, पीनोत्तुङ्ग-पयोधरां भय-हरां पीताम्बरां चिन्तये ॥