महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ उल्लास--शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण श्री देवी ने कहा- हे कृपा-नाथ ! आद्या शक्ति कालिका के प्रसंग में आपने कृपा कर बहुत से साधन बताए। मैं आपके भाव से तृप्त हूँ। आपने 'सचल शिव-लिंग' की प्रतिष्ठा-विधि बताई है किन्तु उसका फल क्या है और उसकी विधि किस प्रकार है ? उसे विशेष रूप से कहिए। हे जगतो-नाथ ! इस परम तत्त्व-जिज्ञासा के लिए मैं किसे वरण करूँ ? आपकी अपेक्षा दयालु, सर्वज्ञ, प्रभु, आशुतोष, दोनानाथ और मुझे आनन्द देनेवाला अन्य कौन है (१-४) ? श्री सदाशिव ने कहा--शिव-लिंग की स्थापना का माहात्म्य तुमसे क्या कहूँ ! उसकी स्थापना से मनुष्य महा-पाप से छूटकर परम पद को प्राप्त करता है (५)। स्वर्ण-पूर्ण पृथिवी का दान और दस सहस्र अश्वमेध यज्ञ करने, निर्जल प्रदेश में जलाशय बनवाने, दीन और आतुर लोगों को सन्तुष्ट करने से मनुष्य जो फल पाते हैं, उससे कोटि गुना अधिक फल शिव-लिंग की प्रतिष्ठा करने से मिलता है, इसमें सन्देह नहीं (६-७)। हे कालिके ! जिस स्थान में लिंग-रूपी महादेव रहते हैं, उसी स्थान में ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र-सहित अन्यान्य देव-गण वास करते हैं (८) । साढ़े तीन कोटि तीर्थ और गुप्त एवं अप्रकाशित सभी पुण्य-क्षेत्र शिव के निकट रहते हैं (६) । लिंग-रूपी शिव के सब ओर सौ हाथ तक 'शिव-क्षेत्र' कहा जाता है (१०) । यह 'शिव-क्षेत्र' महा-पुण्य-जनक और सब तीर्थों से श्रेष्ठ होता है, जिसमें देव-गण और सभी तीर्थ सदा विराजते हैं (११) । जो व्यक्ति क्षण भर भी शिव-भाव-परायण होकर 'शिव-क्षेत्र' में रहता है, वह सब पापों से छूटकर अन्त में शिव-लोक में जाता है (१२) । इस 'शिव-क्षेत्र' में अल्प या बहु मात्रा में जो कर्म किया जाता है, वह महादेव के प्रभाव से कोटि गुणा हो जाता है (१३) । शिव के सामीप्य से जहाँ-तहाँ किए पाप से तो मुक्ति मिल जाती है किन्तु 'शिव-क्षेत्र' में किया पाप वज्र-लेप के समान होता है अर्थात् उससे छुटकारा नहीं मिलता (१४) । पुरश्चरण, जप, दान, श्राद्ध एवं तर्पण आदि जो कोई कर्म 'शिव-क्षेत्र' में किया जाता है, उसका अनन्त फल होता है (१५) । चन्द्र या सूर्य- ग्रहण में सौ पुरश्चरण करने से जो फल होता है, वह शिव के पास एक बार ही जप करने से मिल जाता है (१६) । गया, गङ्गा और प्रयाग में कोटि पिण्ड-दान करने से जो फल मिलता है, वह 'शिव-क्षेत्र' में एक बार पिण्ड-दान करने से मिल जाता है (१७) । जो अति-पापी या महा-पापी थे, उनको भी इस 'शिव-क्षेत्र' में एक बार ही श्राद्ध करने से परम गति प्राप्त हो जाती है (१८) । लिंग-रूपी जगन्नाथ-श्रीदुर्गा के साथ जिस स्थान पर रहते हैं, उस स्थान में चौदहो भुवन वास करते हैं (१६) । स्थापित महादेव का यह कुछ माहात्म्य तुमसे कहा है। जो महादेव अनादि-लिंग हैं, उनकी महिमा वाक्य के भी परे है (२०) । हे सुव्रते ! 'महा-पीठ'-स्थानों में तुम्हारी पूजा में अस्पृश्य-स्पर्श का दोष है, किन्तु लिंग-रूपी महेश्वर में यह दोष नहीं है (२१) । हे देवि, हे कालिके ! चक्रार्चन-काल में जिस प्रकार कोई दोष नहीं होता, उसी प्रकार महा-तीर्थ-स्वरूप 'शिव-क्षेत्र' में स्पर्श-दोष न माने (२२) । इस विषय में अधिक क्या कहूँ; तुमसे सत्य कहता हूँ, शिव-लिंग के पूर्ण प्रभाव को व्यक्त करना मेरी शक्ति में नहीं है (२३) ! शिव-लिंग गौरी-पट्ट से संयुक्त हो या न हो, साधक अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करे (२४) । जो साधक देवता की प्रतिष्ठा के पूर्व-दिवस के सन्ध्या-काल में 'देवता का अधिवास' करता है, वह दश [ ११६ ]