महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । ११५ शरीर को छुये (२८७) । तब प्रतिमा के अंगों में षडंग और मातृका-न्यास कर आकारादि-षड्-दीर्घ स्वरों से युक्त मूल-मन्त्र द्वारा षडग-न्यास करे (२८८) । 'नमः' पदान्त, बिन्दु-युक्त, 'ॐ' कार, माया-बीज (ह्रीं) और रमा-बीज (श्रीं) को आदि में लगाकर अष्ट-वर्गों से वर्ण-न्यास करे (२८६) । मुख में सारे स्वर का, कण्ठ-देश में क-वर्ग का न्यास करे; उदर में च-वर्ग, दक्ष-बाहु में ट-वर्ग, बाम बाहु में त-वर्ग, दक्षिण और वाम दोनों उरुओं में क्रमशः प-वर्ग और य-वर्ग का तथा मस्तक में श-वर्ग का न्यास करे (२६०-६१) । इस प्रकार वर्ण-न्यास कर तत्त्व-न्यास करे (२६२)-दोनों पैरों में पृथिवी-तत्त्व, लिंग-देश में जल-तत्त्व, नाभि-देश में तेजस्तत्त्व, हृदय-कमल में वायु- तत्त्व, मुख में आकाश-तत्त्व, दोनों आँखों में रूप-तत्त्व, दोनों नाकों में गन्ध-तत्त्व, दोनों कानों में शब्द-तत्त्व, जिह्वा में रस-तत्त्व, त्वचा में स्पर्श-तत्त्व का न्यास करे । भ्रू-मध्य में, सहस्र-दल कमल में नमस्तत्त्व का न्यास करे । इसी प्रकार वक्षःस्थल में शिव-तत्त्व, ज्ञान-तत्त्व, पर-तत्त्व, जीव-तत्त्व और प्रकृति-तत्त्व का न्यास करे । सर्वाङ्ग में क्रमशः महत्-तत्त्व और अहङ्कार-तत्त्व का न्यास करे (२६३-६६) । आदि में प्रणव, माया और रमा- बीज, अन्त में चतुर्थी एक-वचन की विभक्ति और 'नमः' लगाकर इन सब तत्त्वों का न्यास करे, यथा- 'ॐ ह्रीं श्रीं पृथिवी-तत्त्वाय नमः' इत्यादि (२६७) । बिन्दु-युक्त मातृका-वर्णों से पुटित, 'नमः' पदान्त मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए मातृका-स्थानों में मन्त्र-न्यास करे (२६८) । तब प्रार्थना करे- सर्व-यज्ञ-मयं तेजः सर्व-भूत-मयं वपुः, इयं ते कल्पिता मूर्तिरत्र त्वां स्थापयाम्यहम् । अर्थात् तुम्हारा तेज सर्व-यज्ञ-मय है और शरीर सर्व-भूत-मय है । तुम्हारी यह मूर्ति कल्पित हुई है, इसमें तुम्हें मैं स्थापित करता हूँ (२६६)। तदनन्तर-पूजा विधि के अनुसार ध्यान, आवाहनादि प्राण-प्रतिष्ठा तक के कर्म कर देवता की पूजा करे (३००) । देव-गृह के दान में जो सब मन्त्र कहे हैं, उन्हीं सबका प्रयोग इस पूजा में करे (३०१) । विधिवत् संस्कृत अग्नि में सभी अर्चित देवताओं को आहुति देकर देवी का आवाहन कर जातकर्मादि करे (३०२) । १. जात- कर्म, २. नामकरण, ३. निष्क्रमण ४. अन्न-प्राशन, ५. चूड़ा और ६. उपनयन-ये छः संस्कार शिवोक्त हैं (३०३) । प्रणव (ॐ), व्याहृति ( भूर्भुवः स्वः ), गायत्री, मूल-मन्त्र, सम्बोधनान्त नाम ( हे आद्ये ! ) तुम्हारे जातकर्मादि अर्थात् संस्कार-विशेष का नामोल्लेख कर 'सम्पादयामि स्वाहा' अर्थात् सम्पादित करता हूँ-यह कह कर पाँच-पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (३०४) । पूर्वोक्त नामोल्लेख करते हुए मूल-मन्त्र उच्चारण कर देवी को सौ आहुतियाँ देकर आहुति का अंश प्रतिमा के मस्तक पर छोड़े (३०५-६) । प्रायश्चित्तादि द्वारा अवशिष्ट कर्म सम्पन्न कर साधकों को भोजन कराये और अनाथ एवं दीनों को सन्तुष्ट करे (३०७) । उक्त कर्म करने में यदि अशक्त हो, तो सात घड़े जल से प्रतिमा को स्नान कराकर यथा-शक्ति पूजापूर्वक देवता को नाम सुनाये (३०८) । हे प्रिये ! यही 'श्रीमदाद्या की प्रतिष्ठा-विधि' है । इसी प्रकार 'दुर्गादि सभी विद्याओं' और 'महेशादि सभी देवों' की प्रतिष्ठा करे (३०६) । 'सचल शिव-लिङ्ग' की प्रतिष्ठा में भी मन्त्र द्वारा इसी विधि का प्रयोग सन्देह- रहित होकर करे (३१०)।